नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सारे जीव-जंतु नर्दें बनीं हुई हैं।प्रभू खुद पासे फेंकता है (कई नरदें पुगती जाती हैं।कई उन चारों खानों के चक्कर में ही पड़ी रहती हैं।)। 26। गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा का डर टिक जाता है (भाव।जिन्हें ये समझ आ जाती है कि परमात्मा हमारे अंग-संग बसता है और हमारे हरेक काम को देखता है) वह मनुष्य उसका दर्शन करने का यत्न करते हैं।और (अपने यत्नों का) फल हासिल कर लेते हैं। पर (पढ़ी हुई विद्या के आसरे अपने आप को समझदार समझने वाले) जो मूर्ख लोग अपने मन के पीछे चलते हैं।वे और ही तरफ भटकते हैं।परमात्मा को याद नहीं करते।उन्हें चौरासी लाख जूनियों का चक्कर नसीब होता है। 27। माया का मोह मनुष्य की आत्मिक मौत (का मूल होता) है (मनुष्य सारी उम्र इस मोह में फंसा रहता है) जब मौत सिर पर आती है।तब परमात्मा को याद करने का ख्याल आता है । जब तक जीवित रहा (पढ़ी हुई विद्या के आसरे) और ही बातें पढ़ता रहा।ना मौत याद आई ना मधुसूदन (परमात्मा) याद आया। 28। (हे मन ! अपनी विद्या का आसरा लेने की जगह) अगर मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को हर जगह देखे। परमात्मा की सिफत सालाह करता रहे।परमात्मा को सर्व-व्यापक समझे।और परमात्मा के साथ गहरी जान-पहचान बनाए।तो उसे दुबारा कभी जनम-मरण का चक्कर नहीं मिलता। 29। जितने भी जीव (सृष्टि में परमात्मा ने) पैदा किए हुए हैं।उन सबके अंदर प्रभू स्वयं मौजूद है। जीव पैदा करके सबको परमात्मा ने माया की किरत-कार में लगाया हुआ है।जिन पे उसकी मेहर होती है।वही उसका नाम सिमरते हैं (हे मन ! विद्या भी दाति है।पर प्रभू का नाम सबसे ऊँची दाति है।पढ़ा होने का गुमान ना किए जा)। 30। जिस परमात्मा ने (अपनी रची सृष्टि) माया की किरत-कार में लगाई हुई है।जिस ने (जीवों के वास्ते) माया का मोह मीठा बना दिया है। उसी की ही रजा में उसका हुकम चलता है।और जीवों को खाने-पीने के पदार्थ (भाव।सुख) और उसी तरह दुख भी सहने को मिलते हैं (मालिक की रजा को समझना सबसे ऊँची विद्या है)। 31। परमात्मा परमेश्वर खुद ही है जिसने तमाशा देखने के लिए ये जगत रचा है। हरेक जीव की अच्छी संभाल करता है (हरेक के दिल की) सब बातें जानता है।और अंदर-बाहर हर जगह व्यापक है (हे मन ! अगर आप पढ़ा हुआ है।तो भेद समझ)। 32। हे प्राणी ! (अगर आप पढ़-लिख गया है तो इस विद्या के आसरे) झगड़े आदि करने से कोई (आत्मिक) लाभ नहीं होंगे।उस परमात्मा को सिमरो जो सदा कायम रहने वाला है।उसे सिमरो। उस सदा स्थिर प्रभू में लीन हुए रहो।(वही मनुष्य असली पढ़ा पण्डित है जिसने) उस परमात्मा (की याद) से (अपने अहंकार को) वार दिया है। 33। जिस परमात्मा ने (सृष्टि के) जीव पैदा करके सबको रिजक पहुँचाया हुआ है।(उसके बिना) कोई और दातें देने वाला नहीं। (हे मन !) उसी हरी का नाम सिमरते रहो।उस हरी के नाम में सदा टिके रहो।(वही है पढ़ा पण्डित जिस ने) हर समय हरी-नाम सिमरन का लाभ कमाया है। 34। जिस परमात्मा ने (ये सारी सृष्टि) खुद पैदा की हुई है।वह जो कुछ करना ठीक समझता है वही कुछ किए जा रहा है। परमात्मा खुद सब कुछ करता है।खुद ही सब कुछ जीवों से करवाता है।(हरेक के दिल की भावना) खुद ही जानता है। हे कवि नानक ! (कह, जो मनुष्य सच-मुच पढ़ा हुआ है जो सच-मुच पण्डित है।उसने परमात्मा के बारे में यूँ ही समझा है और) यूँ ही कहा है (वह अपनी विद्या का अहंकार करने की जगह इसको परमात्मा द्वारा मिली दाति समझता है)। 35। 1।
रागु आसा महला 3 पटी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ अयो अंङै सभु जगु आइआ काखै घंङै कालु भइआ ॥ रीरी लली पाप कमाणे पड़ि अवगण गुण वीसरिआ ॥1॥ मन ऐसा लेखा तूं की पड़िआ ॥ लेखा देणा तेरै सिरि रहिआ ॥1॥ रहाउ ॥ सिधंङाइऐ सिमरहि नाही नंनै ना तुधु नामु लइआ ॥ छछै छीजहि अहिनिसि मूड़े किउ छूटहि जमि पाकड़िआ ॥2॥ बबै बूझहि नाही मूड़े भरमि भुले तेरा जनमु गइआ ॥ अणहोदा नाउ धराइओ पाधा अवरा का भारु तुधु लइआ ॥3॥ जजै जोति हिरि लई तेरी मूड़े अंति गइआ पछुतावहिगा ॥ एकु सबदु तूं चीनहि नाही फिरि फिरि जूनी आवहिगा ॥4॥ तुधु सिरि लिखिआ सो पड़ु पंडित अवरा नो न सिखालि बिखिआ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 3 पटी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (ये) सारा जगत (जो) अस्तित्व में आया हुआ है।(इसके सिर पर) मौत (भी) मौजूद है (पर जीव मौत को भुला के) अवगुण पैदा करने वाली बातें पढ़ के गुण विसार देते हैं।और पाप कमाते रहते हैं। 1। हे मन ! (सिर्फ) ऐसा लेखा पढ़ने का आपको कोई लाभ नहीं हैं सकता (जिसमें उलझ के आप जीवन का सही रास्ता ना सीख सका। गलत रास्ते पर ही पड़ा रहा) और अपने किए कर्मों का हिसाब आपके सिर पे टिका ही रहा।रहाउ। (हे मन ! सिर्फ दुनियावी लेखे सीखने की कोशिशें करने से) आप (परमात्मा को) याद नहीं करता।आप परमात्मा का नाम याद नहीं करता। हे मूर्ख ! (प्रभू को भुला के) दिन रात आपका (आत्मिक जीवन) कमजोर हैं रहा है।जब जम ने (इस खुनामी के कारण) पकड़ लिया।तो उससे खलासी कैसे होगी। 2। हे मूर्ख ! (सिर्फ दुनियावी लेखे पढ़ने-पढ़ाने में उलझ के) आप (जीवन का सही रास्ता) नहीं समझता।इसी भुलेखे में गलत रास्ते पर पड़ के आप अपना मानस जीवन व्यर्थ गवा रहा है। (आत्मिक जीवन का रास्ता बताने वाले शिक्षक के) गुण आपके में नहीं हैं।(फिर भी) तूने अपना नाम शिक्षक।पण्डित रखाया हुआ है।तूने अपने चेलों को जीवन-राह सिखाने की जिंमेवारी का भार अपने ऊपर उठाया हुआ है। 3। हेमूर्ख ! (निरे मायावी लेखे वाले पत्रों ने आत्मिक जीवन सिखाने वाली) आपकी बुद्धि छीन ली है।आखिरी समय जब आप यहाँ से जाने लगेगा तब आप पछताएगा। (अब इस समय) आप प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के साथ सांझ नहीं डालता।(नतीजा ये निकलेगा कि) बार-बार जूनियों में पड़ा रहेगा। 4। हे पण्डित ! आपके अपने माथे पे जो (माया का) लेख लिखा हुआ है।पहले आप उस लेख को पढ़ (भाव।पिछले किए कर्मों के अनुसार जो संसकार आपके अंदर इकट्ठे हुए पड़े हैं।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सारे जीव-जंतु नर्दें बनीं हुई हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।