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अंग 436

अंग
436
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धन पिरहि मेला होइ सुआमी आपि प्रभु किरपा करे ॥
सेजा सुहावी संगि पिर कै सात सर अंम्रित भरे ॥
करि दइआ मइआ दइआल साचे सबदि मिलि गुण गावओ ॥
नानका हरि वरु देखि बिगसी मुंध मनि ओमाहओ ॥1॥
मुंध सहजि सलोनड़ीए इक प्रेम बिनंती राम ॥
मै मनि तनि हरि भावै प्रभ संगमि राती राम ॥
प्रभ प्रेमि राती हरि बिनंती नामि हरि कै सुखि वसै ॥
तउ गुण पछाणहि ता प्रभु जाणहि गुणह वसि अवगण नसै ॥
तुधु बाझु इकु तिलु रहि न साका कहणि सुनणि न धीजए ॥
नानका प्रिउ प्रिउ करि पुकारे रसन रसि मनु भीजए ॥2॥
सखीहो सहेलड़ीहो मेरा पिरु वणजारा राम ॥
हरि नामोु वणंजड़िआ रसि मोलि अपारा राम ॥
मोलि अमोलो सच घरि ढोलो प्रभ भावै ता मुंध भली ॥
इकि संगि हरि कै करहि रलीआ हउ पुकारी दरि खली ॥
करण कारण समरथ स्रीधर आपि कारजु सारए ॥
नानक नदरी धन सोहागणि सबदु अभ साधारए ॥3॥
हम घरि साचा सोहिलड़ा प्रभ आइअड़े मीता राम ॥
रावे रंगि रातड़िआ मनु लीअड़ा दीता राम ॥
आपणा मनु दीआ हरि वरु लीआ जिउ भावै तिउ रावए ॥
तनु मनु पिर आगै सबदि सभागै घरि अंम्रित फलु पावए ॥
बुधि पाठि न पाईऐ बहु चतुराईऐ भाइ मिलै मनि भाणे ॥
नानक ठाकुर मीत हमारे हम नाही लोकाणे ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वामी स्वयं कृपा करते हैं तब ही जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप होता है। पति प्रभू की संगति में उसकी हृदय-सेज सुंदर बन जाती है।उसके पाँचों ज्ञानेद्रियां।उसका मन और उसकी बुद्धि ये सारे नाम-अमृत से भरपूर हो जाते हैं। हे सदा-स्थिर रहने वाले दयालु प्रभू ! मेरे पर मेहर कर।कृपा कर।मैं गुरू के शबद में जुड़ के आपके गुण गाऊँ। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री के मन में प्रभू-पति के मिलाप का चाव पैदा होता है वह हरी पति का दीदार करके (अंतरात्मा में) प्रसन्न होती है। 1। हे आत्मिक अडोलता में टिकी सुंदर नेंत्रों वाली जीव-स्त्री ! मेरी एक प्यार भरी विनती सुन। (मुझे भी रास्ता दिखा ता कि) मुझे भक्ति में प्रभू प्यारा लगे और मैं प्रभू के साथ घुल मिल जाऊँ। जो जीव-स्त्री प्रभू के प्यार में रंगी रहती है और उसके दर पर विनतियां करती रहती है उस प्रभू के नाम में जुड़ के आत्मिक आनंद में जीवन व्यतीत करती है। हे प्रभू ! जो जीव-सि्त्रयां जब आपके गुण पहचानती हैं तब वे आपके साथ गहरी जान-पहचान डाल लेती हैं।उनके हृदय में गुण आ टिकते हैं और अवगुण उनके अंदर से दूर हो जाते हैं। हे प्रभू ! मैं आपके बिना एक तिल जितना समय भी जी नहीं सकती (मेरी जीवात्मा व्याकुल हैं उठती है)।(आपके नाम के बिना कुछ और) कहने या सुनने से मेरे मन को धीरज नहीं आता। हे नानक ! जो जीव-स्त्री प्रभू को ‘हे प्यारे ! हे प्यारे !’ कह कह के याद करती रहती है उसकी जीभ उसका मन परमात्मा के नाम-रस में भीग जाता है। 2। हे (सत्संगी) सहेलियो ! परमात्मा प्रेम का व्यापारी है। जिसने उसका नाम विहाजा है वह उसके नाम-रस में भीग के इतने ऊँचे आत्मिक जीवन वाली हो जाती है कि वह अमूल्य हो जाती है। वह जीव-सखी बहुमूल्य हो जाती है।प्यारे प्रभू के सदा-स्थिर चरणों में वह जुड़ी रहती है।वही जीव-स्त्री ठीक समझो जो पति-प्रभू को प्यारी लगती है। अनेकों ही हैं जो प्रभू की याद में जुड़ के आत्मिक आनंद पाती हैं।मैं उनके दर पे खड़े हो के विनती करती हूँ (कि मेरी सहायता करो मैं भी प्रभू को याद कर सकूँ)। हे नानक ! जिस जीव स्त्री पे प्रभू की मेहर की निगाह होती है वह भाग्यशाली है।गुरू का शबद उसके हृदय को सहारा दिए रखता है; वह परमात्मा जो सारे जगत का मूल है जो सब कुछ करने योग्य है जो माया का पति है उस जीव-स्त्री के मानस जनम के मनोरथ को सफल करता है। 3। हे सहेलियो ! मेरे हृदय-घर में।जैसे।अटॅल खुशियों भरा गीत गाया जा रहा है।क्योंकि मित्र प्रभू मेरे अंदर आ बसा है। वह प्रभू उन जीवों को मिल जाता है जो उसके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।वह अपना मन उसके हवाले करते हैं और वह नाम हासिल करते हैं। जो जीव-स्त्री अपना मन प्रभू-पति के हवाले करती है वह प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लेती है फिर अपनी रजा के अनुसार प्रभू उस जीव-स्त्री के साथ मिला रहता है। जो जीवात्मा-वधू गुरू के शबद में जुड़ के अपना मन अपना हृदय प्रभू-पति को भेट करती है वह अपने भाग्यों वाले हृदय-घर में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल पा लेती है। प्रभू किसी समझदारी से किसी बुद्धिमानी से किसी (धार्मिक पुस्तकों के) पाठ से नहीं मिलता।वह तो प्रेम से ही मिलता है।उसे मिलता है जिसके मन में वह प्यारा लगता है। हे नानक ! (कह) हे मेरे ठाकुर ! हे मेरे मित्र ! (मेहर कर मुझे अपना बनाए रख) मैं (आपके बिना) किसी और का ना बनूँ। 4। 1।
आसा महला 1 ॥
अनहदो अनहदु वाजै रुण झुणकारे राम ॥
मेरा मनो मेरा मनु राता लाल पिआरे राम ॥
अनदिनु राता मनु बैरागी सुंन मंडलि घरु पाइआ ॥
आदि पुरखु अपरंपरु पिआरा सतिगुरि अलखु लखाइआ ॥
आसणि बैसणि थिरु नाराइणु तितु मनु राता वीचारे ॥
नानक नामि रते बैरागी अनहद रुण झुणकारे ॥1॥
तितु अगम तितु अगम पुरे कहु कितु बिधि जाईऐ राम ॥
सचु संजमो सारि गुणा गुर सबदु कमाईऐ राम ॥
सचु सबदु कमाईऐ निज घरि जाईऐ पाईऐ गुणी निधाना ॥
तितु साखा मूलु पतु नही डाली सिरि सभना परधाना ॥
जपु तपु करि करि संजम थाकी हठि निग्रहि नही पाईऐ ॥
नानक सहजि मिले जगजीवन सतिगुर बूझ बुझाईऐ ॥2॥
गुरु सागरो रतनागरु तितु रतन घणेरे राम ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ मेरा मन प्यारे प्रभू (के प्रेम रंग) में रंगा गया है।अब मेरे अंदर (जैसे) घुँघरूओं-झांझरों की झनकार देने वाला (बाजा) एक रस बज रहा है। मेरा मन हर समय (प्रभू की याद में) मतवाला रहता है।मस्त रहता है। मैंने अब ऐसे ऊँचे मण्डल में ठिकाना पा लिया है जहाँ कोई मायावी फुरना नहीं उठता। सतिगुरू ने मुझे वह अदृश्य प्रभू दिखा दिया है जो सबका आदि है और सब में व्यापक है जो सब का प्यारा है और जिससे परे और कोई हस्ती नहीं। मेरा मन गुरू के शबद के विचार की बरकति सेउस नारायण में मस्त रहता है जो अपने आसन पर अपने तख़्त पर सदा अडोल रहता है। हे नानक ! जिन लोगों के मन प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं (प्रभू-नाम के) मतवाले हो जाते हैं।उनके अंदर।(जैसे) झांझर-घुंघरू की झनकार देने वाला (बाजा) एक-रस बजता है। 1। (हे सहेलिए !) बता।उस अपहुँच परमात्मा के शहर में किस ढंग से जाते हैं। (सहेली उत्तर देती है, हे बहिन ! उस शहर में पहुँचने के लिए) सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमर के।(सिमरन की बरकति से) इन्द्रियों को विकारों की ओर से रोक के।प्रभू के गुण (हृदय में) संभाल के सतिगुरू का शबद कमाना चाहिए (भाव।गुरू के शबद के अनुसार जीवन बनाना चाहिए)। सदा-स्थिर प्रभू से मिलाने वाला गुर-शबद कमाने से अपने घर में (स्वै-स्वरूप में) पहुँच जाते हैं।और गुणों का खजाना परमात्मा मिल जाता है। उस प्रभू का आसरा ले के उसकी टहनियां-डालियां-जड़-पत्तियां (आदि।भाव।उसके रचे हुए जगत) का आसरा लेने की जरूरत नहीं रहती (क्योंकि) वह परमात्मा सबक सिर पर प्रधान है। ये दुनिया जप करके तप साध के इन्द्रियों को रोकने का यत्न करके हार गई है।(इस किस्म के) हठ से इन्द्रियों को वश में करने के प्रयत्न करने से परमात्मा नहीं मिलता। हे नानक ! वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के जगत के आसरे प्रभू को मिल जाते हैं जिन्हें सतिगुरू की (दी हुई) मति ने (सही जीवन-राह) समझा दी है। 2। गुरू (एक) समुन्द्र है।गुरू रत्नों की खान है।उसमें (सु-जीवन शिक्षा के) अनेकों रत्न हैं।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “प्रभू स्वामी स्वयं कृपा करते हैं तब ही जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप होता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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