छछै छाइआ वरती सभ अंतरि तेरा कीआ भरमु होआ ॥ भरमु उपाइ भुलाईअनु आपे तेरा करमु होआ तिन॑ गुरू मिलिआ ॥10॥ जजै जानु मंगत जनु जाचै लख चउरासीह भीख भविआ ॥ एको लेवै एको देवै अवरु न दूजा मै सुणिआ ॥11॥ झझै झूरि मरहु किआ प्राणी जो किछु देणा सु दे रहिआ ॥ दे दे वेखै हुकमु चलाए जिउ जीआ का रिजकु पइआ ॥12॥ ञंञै नदरि करे जा देखा दूजा कोई नाही ॥ एको रवि रहिआ सभ थाई एकु वसिआ मन माही ॥13॥ टटै टंचु करहु किआ प्राणी घड़ी कि मुहति कि उठि चलणा ॥ जूऐ जनमु न हारहु अपणा भाजि पड़हु तुम हरि सरणा ॥14॥ ठठै ठाढि वरती तिन अंतरि हरि चरणी जिन॑ का चितु लागा ॥ चितु लागा सेई जन निसतरे तउ परसादी सुखु पाइआ ॥15॥ डडै डंफु करहु किआ प्राणी जो किछु होआ सु सभु चलणा ॥ तिसै सरेवहु ता सुखु पावहु सरब निरंतरि रवि रहिआ ॥16॥ ढढै ढाहि उसारै आपे जिउ तिसु भावै तिवै करे ॥ करि करि वेखै हुकमु चलाए तिसु निसतारे जा कउ नदरि करे ॥17॥ णाणै रवतु रहै घट अंतरि हरि गुण गावै सोई ॥ आपे आपि मिलाए करता पुनरपि जनमु न होई ॥18॥ ततै तारू भवजलु होआ ता का अंतु न पाइआ ॥ ना तर ना तुलहा हम बूडसि तारि लेहि तारण राइआ ॥19॥ थथै थानि थानंतरि सोई जा का कीआ सभु होआ ॥ किआ भरमु किआ माइआ कहीऐ जो तिसु भावै सोई भला ॥20॥ ददै दोसु न देऊ किसै दोसु करंमा आपणिआ ॥ जो मै कीआ सो मै पाइआ दोसु न दीजै अवर जना ॥21॥ धधै धारि कला जिनि छोडी हरि चीजी जिनि रंग कीआ ॥ तिस दा दीआ सभनी लीआ करमी करमी हुकमु पइआ ॥22॥ नंनै नाह भोग नित भोगै ना डीठा ना संम्हलिआ ॥ गली हउ सोहागणि भैणे कंतु न कबहूं मै मिलिआ ॥23॥ पपै पातिसाहु परमेसरु वेखण कउ परपंचु कीआ ॥ देखै बूझै सभु किछु जाणै अंतरि बाहरि रवि रहिआ ॥24॥ फफै फाही सभु जगु फासा जम कै संगलि बंधि लइआ ॥ गुर परसादी से नर उबरे जि हरि सरणागति भजि पइआ ॥25॥ बबै बाजी खेलण लागा चउपड़ि कीते चारि जुगा ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू ! जीव भी क्या करे।आपकी ही पैदा की हुई) अविद्या सब जीवों के अंदर प्रबल हैं रही है। (जीवों के मन की) भटकना आपकी ही बनाई हुई है।(हे मन !) प्रभू ने खुद ही भटकना पैदा करके सृष्टि को गलत राह पर डाला हुआ है (अगर तूने बचना है तो अपनी विद्या का अहंकार त्याग के कह) हे प्रभू ! जिन पर आपकी बख्शिश होती है उन्हें गुरू मिल जाता है (मेरे पर भी मेहर करके गुरू मिला)। 10। (हे मन ! अपने पण्डित होने का मान त्याग के) उस प्रभू के साथ सांझ डाल (जिसके दर से) हरेक जीव मंगता बन के दान मांगता है। वह प्रभू चौरासी लाख जूनियों में खुद ही मौजूद है।(सब जीवों में व्यापक हो के) वह खुद ही भिक्षा लेने वाला है।और वह खुद ही देता है। 11। हे प्राणी ! (रोटी की खातिर) चिंता कर-करके क्यूँ आत्मिक मौत सहेड़ता है।जो कुछ प्रभू ने आपको देने का फैसला किया हुआ है।वह (आपकी चिंता-फिक्र के बिना भी) स्वयं ही दे रहा है। जैसे-जैसे जीवों का रिजक मुकरर (निहित) है।वह सब को दे रहा है।संभाल भी कर रहा है।और (रिजक बाँटने वाला अपना) हुकम चला रहा है (हे मन ! आपका पण्डित होने के क्याअगर आपको इतनी भी समझ नहीं।)। 12। (हे मन ! चिंता-फिक्र छोड़।क्योंकि) मैं जब भी ध्यान से देखता हूँ।मुझे प्रभू के बिना कोई और (कहीं भी) नहीं दिखता। प्रभू स्वयं ही हर जगह मौजूद है।हरेक के मन में प्रभू खुद ही बस रहा है। 13। (प्रभू की याद भुला के सिर्फ दुनियावी काम ही करने व्यर्थ के धंधे है।क्योंकि मौत आने से इनसे साथ समाप्त हो जाएगा) हे प्राणी ! व्यर्थ के धंधे करने का कोई लाभ नहीं।(क्योंकि इस जगत से) थोड़े ही समय में उठ के चले जाना है। हे प्राणी ! (प्रभू की याद भुला के) अपना मानस जनम जूए में क्यूँ हारते हैं।हे भाई ! आप जल्दी ही परमात्मा की शरण पड़ जा। 14। जिन मनुष्यों का मन परमात्मा के चरणों में टिका रहता है।उनके मन में ठंढ शांति बनी रहती है। हे प्रभू ! दुनियां के टंटों में शांत-चित्त रहके वहीपार गुजरते हैं जिनका मन (आपके चरणों में) जुड़ा रहता है।आपकी मेहर से उनको आत्मिक सुख प्राप्त हुआ रहता है। 15। हे जीव ! जगत में जो कुछ पैदा हुआ है सब यहाँ से चले जाने वाला है (नाशवंत है)। किसी तरह का कोई दिखावा करने का कोई लाभ नहीं होंगे (आत्मिक सुख विद्या आदि के दिखावे में नहीं है)।आत्मिक आनंद तभी मिलेगा अगर उस परमात्मा का सिमरन करेंगे जो सब जीवों के अंदर एक-रस व्यापक है। 16। परमात्मा स्वयं ही जगत रचना को नाश करता है।स्वयं ही बनाता है।जैसे उसे अच्छा लगता है वैसे करता है। प्रभू जीव पैदा करके (सबकी) संभाल करता है।(हर जगह) अपना हुकम चला रहा है।(जीव सृजनहार को भुला के नाशवंत संसार में मगन रहता है।पर) जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है।उसे (नाशवंत संसार के मोह में से) पार लंघा लेता है। 17। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा अपना आप प्रगट कर दे।वह मनुष्य उसकी सिफत सालाह करने लग पड़ता है। (उसकी प्रीति पे रीझ के) ईश्वर स्वयं ही उसे अपने साथ मिला लेता है (उसकी सुरति अपनी याद में जोड़े रखता है) उस मनुष्य को बार-बार जनम नहीं मिलता (वह दुबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।पर हे मन ! सिर्फ पढ़ लेने से।पण्डित बन जाने से ये दाति नसीब नहीं होती)। 18। ये संसार समुंद्र (जिसमें विकारों की बाढ़ जोर पकड़ती जा रही है) बहुत ही गहरा है।इसका दूसरा छोर नहीं मिलता। (इस में से पार लांघने के लिए) हमारे पास ना कोई बेड़ी है ना ही कोई तुलहा।बेड़ी तुलहे के बिना हम डूब जाएंगे।हे तैराने के समर्थ प्रभू ! हमें पार लंघा ले। 19। जिस परमात्मा का बनाया हुआ ये सारा जगत है।वही (इस जगत के) हरेक जगह में मौजूद है। (जीवों को मोहने वाली ये) माया और (माया का बिखरा हुआ) मोह भी सर्व-व्यापक प्रभू से अलग नहीं।जो उस प्रभू को अच्छा लगता है वही (जगत में हो रहा है।और जीवों के वास्ते) ठीक हो रहा है (सो।हे मन ! विद्या का मान करने की जगह उसकी रजा को समझ)। 20। (हे मन ! ये याद रख कि) मैं किसी और के माथे दोष मढ़ूँ (अपनी विद्या के बल के आसरे किसी और को दोषी ठहराने की जगह।हे मन ! अपनी ही करनी को सुधारने की जरूरत है) (हे मन ! अगर आप पढ़ के सच-मुच पण्डित हैं गया है।तो ये याद रख कि) जैसे काम मैं करता हूँ।वैसा ही फल मैं पा लेता हूँ। (अपने किये कर्मों के अनुसार अपने ऊपर आए दुख-कलेशों के बारे में) और लोगों को दोष नहीं देना चाहिए।बुराई अपने कर्मों में ही होती है । 21। जिस हरी ने (सारी सृष्टि में) अपनी सक्ता टिका रखी है।जिस चमत्कारी प्रभू ने इस रंगा-रंग की रचना की हुई है।सारे जीव उसी की बख्शिशों की दातें बरत रहे हैं। पर (इन दातों के बख्शने में) हरेक जीव के अपने-अपने किए कर्मों के अनुसार ही प्रभू का हुकम बरत रहा है (इस वास्ते हे मन ! सिर्फ विद्या वाली चोंच-ज्ञान चर्चा कुछ नहीं सँवारती।अपनी करणी ठीक करने की जरूरत है)। 22। हे सत्संगी सहेलीए ! (देख ! सिर्फ विद्या को ही असल मनुष्यता समझ रखने का नतीजा !) जिस परमात्मा के दिए हुए पदार्थ हरेक जीव बरत रहा है।उसके अभी तक मैंने कभी दर्शन नहीं किए।उसे कभी हृदय में नहीं टिकाया। (विद्या के आसरे) मैं सिर्फ बातों से ही अपने आपको सोहागनि कहती रही।पर कंत प्रभू मुझे अभी तक कहीं नहीं मिला। 23। परमेश्वर (इस बारे में संसार का) बादशाह है।उसने खुद यह संसार रचा है।कि जीव इसमें उसका दीदार करें। रचनहार प्रभू हरेक जीव की संभाल करता है।हरेक दिल की समझता जानता है।वह सारे संसार में हर जगह व्यापक है।(पर हे मन ! आप उस प्रभू के दर्शन करने की जगह अपनी विद्या में ही अहंकारी हुआ बैठा है।)। 24। (हे मन !) सारा संसार (माया की किसी ना किसी) बंधन में बँधा हुआ है।जम के रस्से ने बाँध रखा है (भाव।माया के प्रभाव में आ के संसार ऐसे कर्म करता जा रहा है कि जम के काबू में आता जाता है)। (हे मन ! पण्डित होने का गुमान करके आप भी उसी जंजीर में बँधा हुआ है)।इस रस्से से गुरू की कृपा से सिर्फ वही लोग बचे हैं।जो दौड़ के परमात्मा की शरण जा पड़े हैं। 25। हे मन ! (अगर आप पढ़ा-लिखा पंडित है तो संसार को चौपड़ की खेल समझ।विद्या पर गुमान करने की जगह एक सुचॅजी नर्द बन के प्रभू की रजा-रूपी हाथों में चल।ता कि पुग जाए सफल हो जाए।देख !) परमात्मा स्वयं (चौपड़ की) खेल खेल रहा है।चार युगों को उसने (चौपड़ के) चार पल्ले बनाया है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।