Lulla Family

अंग 432

अंग
432
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जो तुधु भावै सो भला पिआरे तेरी अमरु रजाइ ॥7॥
नानक रंगि रते नाराइणै पिआरे माते सहजि सुभाइ ॥8॥2॥4॥
सभ बिधि तुम ही जानते पिआरे किसु पहि कहउ सुनाइ ॥1॥
तूं दाता जीआ सभना का तेरा दिता पहिरहि खाइ ॥2॥
सुखु दुखु तेरी आगिआ पिआरे दूजी नाही जाइ ॥3॥
जो तूं करावहि सो करी पिआरे अवरु किछु करणु न जाइ ॥4॥
दिनु रैणि सभ सुहावणे पिआरे जितु जपीऐ हरि नाउ ॥5॥
साई कार कमावणी पिआरे धुरि मसतकि लेखु लिखाइ ॥6॥
एको आपि वरतदा पिआरे घटि घटि रहिआ समाइ ॥7॥
संसार कूप ते उधरि लै पिआरे नानक हरि सरणाइ ॥8॥3॥22॥15॥2॥42॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हे प्यारे (प्रभू) ! आपका हुकम अमिट है।जीवों के वास्ते वही काम भलाई वाला है जो आपको अच्छा लगता है। 7। हे नानक ! (कह) हे प्यारे ! जो मनुष्य नारायण के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं वे आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं वे उसके प्रेम में मस्त रहते हैं। 8। 2। 4। हे प्यारे प्रभू ! (आप अपने पैदा किए हुए जीवों को दातें देने के) सारे तरीकों को स्वयं ही जानता है।मैं और किसे सुना के कहूँ। 1। हे प्रभू ! सारे जीवों को दातें देने वाला आप स्वयं ही है।(सारे जीव आपके ही दिए वस्त्र) पहनते हैं।(हरेक जीव आपका ही दिया अन्न) खाता है। 2। हे प्यारे प्रभू ! आपके हुकम में ही (जीव को) कभी सुख मिलता है कभी दुख।(आपके बिना जीव के वास्ते) कोई और (आसरे की) जगह नहीं। 3। हे प्यारे प्रभू ! मैं वही कुछ कर सकता हूँ जो आप मुझसे करवाता है (आपसे आक़ी हैं के) और कुछ भी किया नहीं जा सकता। 4। हे प्यारे हरी ! वे हरेक दिन-रात सारे सुहाने लगते हैं जब आपका नाम सिमरा जाता है। 5। हे प्यारे प्रभू ! आपकी धुर-दरगाह से (खुद अपने) माथे पर (कर्मों का जो) लेख लिखा के (हम जीव आए हैं।उस लेख के अनुसार) वही काम (हम जीव) कर सकते हैं। 6। हे प्यारे प्रभू ! आप एक खुद ही (सारे जगत में) मौजूद है।हरेक शरीर में आप खुद ही टिका हुआ है। 7। हे नानक ! (कह) हे हरी ! मैं आपकी शरण आया हूँ मुझे (माया के मोह भरे) संसार कूँएं में से निकाल ले। 8। 3। 22। 15। 2। 42।
रागु आसा महला 1 पटी लिखी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ससै सोइ स्रिसटि जिनि साजी सभना साहिबु एकु भइआ ॥
सेवत रहे चितु जिन॑ का लागा आइआ तिन॑ का सफलु भइआ ॥1॥
मन काहे भूले मूड़ मना ॥
जब लेखा देवहि बीरा तउ पड़िआ ॥1॥ रहाउ ॥
ईवड़ी आदि पुरखु है दाता आपे सचा सोई ॥
एना अखरा महि जो गुरमुखि बूझै तिसु सिरि लेखु न होई ॥2॥
ऊड़ै उपमा ता की कीजै जा का अंतु न पाइआ ॥
सेवा करहि सेई फलु पावहि जिन॑ी सचु कमाइआ ॥3॥
ङंङै ङिआनु बूझै जे कोई पड़िआ पंडितु सोई ॥
सरब जीआ महि एको जाणै ता हउमै कहै न कोई ॥4॥
ककै केस पुंडर जब हूए विणु साबूणै उजलिआ ॥
जम राजे के हेरू आए माइआ कै संगलि बंधि लइआ ॥5॥
खखै खुंदकारु साह आलमु करि खरीदि जिनि खरचु दीआ ॥
बंधनि जा कै सभु जगु बाधिआ अवरी का नही हुकमु पइआ ॥6॥
गगै गोइ गाइ जिनि छोडी गली गोबिदु गरबि भइआ ॥
घड़ि भांडे जिनि आवी साजी चाड़ण वाहै तई कीआ ॥7॥
घघै घाल सेवकु जे घालै सबदि गुरू कै लागि रहै ॥
बुरा भला जे सम करि जाणै इन बिधि साहिबु रमतु रहै ॥8॥
चचै चारि वेद जिनि साजे चारे खाणी चारि जुगा ॥
जुगु जुगु जोगी खाणी भोगी पड़िआ पंडितु आपि थीआ ॥9॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 पटी लिखी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वही एक प्रभू सब जीवों का मालिक है जिसने ये जगत रचना की है। जो लोग उस प्रभू को सदा सिमरते रहे।जिनका मन (उसके चरणों में) जुड़ा रहा।उनका जगत में आना सफल हो गया (भाव।उन्होंने जगत में जनम ले के मानस जनम का असल मनोरथ हासिल कर लिया)। 1। हे (मेरे) मन ! हे मूर्ख मन ! असल जीवन-राह से क्यूँ विछुड़ता जा रहा है। हे वीर ! जब आप अपने किए कर्मों का हिसाब देगा (और हिसाब में सुर्खरू माना जाएगा) तब ही आप पढ़ा-लिखा (विद्वान) समझा जा सकेगा। 1।रहाउ। जो व्यापक प्रभू सारी रचना का मूल है जो सब जीवों को रिजक देने वाला है।वह स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। (विद्वान वही मनुष्य है) जो गुरू की शरण पड़ कर अपनी विद्या से उस (प्रभू के असल को) समझ लेता है (और जीवन-राह से भटकता नहीं)।उस मनुष्य के सिर पर (विकारों का कोई) करजा नहीं चढ़ता। 2। जिस परमात्मा के गुणों का आखिरी छोर नहीं ढूँढा जा सकता।(मनुष्य जनम पा के) उसकी सिफत सालाह करनी चाहिए (ये एक कमाई है जो मनुष्य के सदा साथ निभ सकती है)। जिन लोगों ने ये सदा साथ निभने वाली कमाई की है।जो (सदा प्रभू का) सिमरन करते हैं।वही मनुष्य जीवन का मनोरथ हासिल करते हैं। 3। वही मनुष्य पढ़ा हुआ वही पण्डित है।जो परमात्मा के साथ जान-पहचान (डालना) समझ ले। जो ये समझ ले कि परमात्मा ही सारे जीवों में मौजूद है।(जो आदमी ये भेद समझ लेता है।उसकी पहचान ये है कि) वह फिर कभी ये नहीं कहता कि मैं ही होऊँ (वह आदमी फिर स्वार्थी नहीं रह सकता)। 4। (पर ये कैसी पण्डिताई है कि) जब (उधर तो) सिर के बाल सफेद फूल जैसे हो जाएं।साबन बरते बिना ही सफेद हो जाएं। (सिर पर ये सफेद केस बाल) यमराज के भेजे हुए (मौत के समय) की ताक वाले (दूत) आ तैनात हो जाएं।और इधर अभी इसे माया के (मोह की) जंजीरों ने बाँध रखा हो।(ये पढ़े हुए विद्वान का रवईआ नहीं।ये तो मूरख का रवईआ है)। 5। जो खुदा सारी दुनिया का बादशाह है;और जिसने (सारे जगत को) रोजी दी हुई है। जिसके हुकम में सारा जगत नाथा हुआ है और (जिसके बिना) किसी और का हुकम नहीं चल सकता।(हे भाई ! अगर आप सचमुच पण्डित है।तो) उसकी सिफत सालाह का सौदा कर। 6। जिस (गोबिंद) ने (ये सारी) कुदरति (स्वयं ही) रची है।(कुदरति रच के) जिस (गोबिंद) ने जीव-बर्तन बना के संसार-रूपी आवी (भट्ठी) तैयार की है। उस गोबिंद को जो (अपने आप को पढ़ा हुआ पण्डित समझने वाला) मनुष्य निरी (विद्वता की) बातों से (समझ चुका फर्ज करके) अहंकारी बनता है उस (तथाकथित पण्डित) के वास्ते उस गोविंद ने जनम-मरन (का चक्कर) अहंकारी बनाता है।उस (तथाकथित पण्डित) के वास्ते उस गोबिंद ने जनम मरन (का चक्र) तैयार किया हुआ है। 7। (हे मन ! विद्या पर गुमान करने की जगह) अगर मनुष्य सेवक (-स्वभाव) बन के (सेवकों वाली) कड़ी मेहनत करे।अगर अपनी सुरति गुरू के शबद में जोड़े रखे (अपनी विद्या का आसरा लेने की जगह गुरू के शबद में भरोसा बनाए)। यदि (घटित होते) दुख-सुख को एक-समान ही समझे।(बस !) यही तरीका है जिस से प्रभू को (सही मायने में) सिमर सकता है। 8। जिस परमात्मा ने (अंडज।जेरज।सेतज।उतभुज) चारों खाणियों के जीव स्वयं ही पैदा किए हैं।जिस प्रभू ने (जगत रचना करके।सूरज-चाँद आदि बना के।समय का वजूद करके) चारों युग खुद ही बनाएं हैं।जिस प्रभू ने (अपने पैदा किए हुए ऋषियों से) चार वेद रचे हैं। जो हरेक युग में मौजूद है।जो चारों खाणियों के जीवों में व्यापक हो के खुद ही रचे सारे पदार्थ खुद ही भोग रहा है।फिर भी निर्लिप है।वह स्वयं ही (विद्या की उत्पत्ति का मूल है।और) पढ़ा हुआ (ज्ञाता) है।खुद ही पण्डित है (हे मन ! सब जीवों को पैदा करने वाला प्रभू स्वयं ही है।विद्या का गुण पैदा करने वाला भी वह स्वयं ही है।फिर अगर आप पढ़ गया है।तो इसमें भी गुमान कैसा।ये विद्या उसी की दाति है।विनम्र भाव में रहके उसी को याद रख)। 9।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्यारे (प्रभू) ! आपका हुकम अमिट है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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