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अंग ४३१ · आसा

अंग
431
आसा
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  1. मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥
  2. पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥1॥

मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥

आसावरी महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन हरि सिउ लागी प्रीति ॥
साधसंगि हरि हरि जपत निरमल साची रीति ॥1॥ रहाउ ॥
दरसन की पिआस घणी चितवत अनिक प्रकार ॥
करहु अनुग्रहु पारब्रहम हरि किरपा धारि मुरारि ॥1॥
मनु परदेसी आइआ मिलिओ साध कै संगि ॥
जिसु वखर कउ चाहता सो पाइओ नामहि रंगि ॥2॥
जेते माइआ रंग रस बिनसि जाहि खिन माहि ॥
भगत रते तेरे नाम सिउ सुखु भुंचहि सभ ठाइ ॥3॥
सभु जगु चलतउ पेखीऐ निहचलु हरि को नाउ ॥
करि मित्राई साध सिउ निहचलु पावहि ठाउ ॥4॥
मीत साजन सुत बंधपा कोऊ होत न साथ ॥
एकु निवाहू राम नाम दीना का प्रभु नाथ ॥5॥
चरन कमल बोहिथ भए लगि सागरु तरिओ तेह ॥
भेटिओ पूरा सतिगुरू साचा प्रभ सिउ नेह ॥6॥
साध तेरे की जाचना विसरु न सासि गिरासि ॥
जो तुधु भावै सो भला तेरै भाणै कारज रासि ॥7॥
सुख सागर प्रीतम मिले उपजे महा अनंद ॥
कहु नानक सभ दुख मिटे प्रभ भेटे परमानंद ॥8॥1॥2॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य की प्रीति परमात्मा के साथ बन जाती है। गुरू की संगति में परमात्मा का नाम जपते हुए उसकी रोजाना यही कार बन जाती है कि सदा स्थिर प्रभू का नाम जपता रहता है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपके अनेकों किस्म के गुणों को याद करते हुए (मेरे अंदर) आपके दर्शनों की चाहत और भी प्रवीण हो गई है। हे पारब्रहम ! हे मुरारी ! मेहर कर।कृपा कर (दीदार बख्श)। 1। अनेकों जूनियों में भटकता जब कोई मन गुरू की संगति में आ मिलता है जिस (उच्च आत्मिक जीवन के) सौदे को वह सदा तरसता आ रहा था वह उस को परमात्मा के नाम के प्यार में जुड़ा मिल जाता है। 2। माया के जितने भी करिश्में व स्वादिष्ट पदार्थ दिखाई दे रहे हैं ये एक छिन में नाश हो जाते हैं (इनमें प्रर्वित्त होने वाले आखिर में पछताते हैं।पर। हे प्रभू !) आपके भगत आपके नाम-रंग में रंगे रहते हैं।वे हर जगह आनंद का रस लेते रहते हैं। 3। हे भाई ! सारा संसार नाशवंत दिख रहा है।सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक परमात्मा का नाम ही है। गुरू से प्यार डाल (उससे ये हरी-नाम मिलेगा।और) आप वह ठिकाना पा लेगा जो कभी भी नाश होने वाला नहीं। 4। हे भाई ! मित्र।सज्जन।पुत्र व रिश्तेदार - कोई भी सदा के साथी नहीं बन सकते। सदा साथ निभाने वाला सिर्फ उस परमात्मा का नाम ही है जो गरीबों का रक्षक है। 5। हे भाई ! जिस मनुष्य के वास्ते गुरू के सुंदर कोमल चरण जहाज बन गए वह इन चरनों में जुड़ के संसार समुंदर से पार लांघ गया। जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल गया।उसका परमात्मा से सदा के लिए पक्का प्यार बन गया। 6। हे प्रभू ! आपके सेवक की (आपके से सदा यही) मांग है कि सांस लेते रोटी खाते कभी भी ना विसर। जो कुछ आपको अच्छा लगता है आपके सेवक को भी वही अच्छा लगता है।आपकी रजा में चलने से आपके सेवक के सारे काम सिरे चढ़ जाते हैं। 7। हे नानक ! कह, सुखों के समुंद्र प्रीतम-प्रभू जी जिस मनुष्य को मिल जाते हैं उसके अंदर बड़ा आनंद पैदाहो जाता है। सबसे श्रेष्ठ आनंद के मालिक प्रभू जी जिसे मिलते हैं उसके सारे दुख-कलेश दूर हो जाते हैं। 8। 1। 2। 39।

पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥1॥

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आसा महला 5 बिरहड़े घरु 4 छंता की जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पारब्रहमु प्रभु सिमरीऐ पिआरे दरसन कउ बलि जाउ ॥1॥
जिसु सिमरत दुख बीसरहि पिआरे सो किउ तजणा जाइ ॥2॥
इहु तनु वेची संत पहि पिआरे प्रीतमु देइ मिलाइ ॥3॥
सुख सीगार बिखिआ के फीके तजि छोडे मेरी माइ ॥4॥
कामु क्रोधु लोभु तजि गए पिआरे सतिगुर चरनी पाइ ॥5॥
जो जन राते राम सिउ पिआरे अनत न काहू जाइ ॥6॥
हरि रसु जिन॑ी चाखिआ पिआरे त्रिपति रहे आघाइ ॥7॥
अंचलु गहिआ साध का नानक भै सागरु पारि पराइ ॥8॥1॥3॥
जनम मरण दुखु कटीऐ पिआरे जब भेटै हरि राइ ॥1॥
सुंदरु सुघरु सुजाणु प्रभु मेरा जीवनु दरसु दिखाइ ॥2॥
जो जीअ तुझ ते बीछुरे पिआरे जनमि मरहि बिखु खाइ ॥3॥
जिसु तूं मेलहि सो मिलै पिआरे तिस कै लागउ पाइ ॥4॥
जो सुखु दरसनु पेखते पिआरे मुख ते कहणु न जाइ ॥5॥
साची प्रीति न तुटई पिआरे जुगु जुगु रही समाइ ॥6॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 बिरहड़े घरु 4 छंता की जति ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्यारे ! सदा परमात्मा का सिमरन करना चाहिए।मैं उस परमात्मा के दर्शन से सदके जाता हूँ। 1। हे प्यारे ! जिस परमात्मा का सिमरन करने से सारे दुख भूल जाते हैं।उसे त्यागना नहीं चाहिए। 2। हे प्यारे ! मैं तो अपना ये शरीर उस गुरू के पास बेचने को तैयार हूँ जो प्रीतम-प्रभू से मिला देता है। 3। हे मेरी माँ ! मैंने माया के सुख माया के सुहज सभ त्याग दिए हैं (नाम-रस के मुकाबले में ये सारे) बेस्वादे हैं। 4। हे प्यारे ! जब से मैं गुरू के चरणों में जा लगा हूँ।काम।क्रोध।लोभ।मोह सारे मेरा पीछा छोड़ गए हैं। 5। हे प्यारे ! जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम रंग से रंगे जाते हैं (परमात्मा को छोड़ के उनमें से कोई भी) किसी और जगह नहीं जाता। 6। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम का स्वाद चख लेते हैं वह (मायावी पदार्थों से) तृप्त हो जाते हैं।अघा जाते हैं। 7। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू का पल्ला पकड़ लिया वह इस भयानक संसार-समुंदर से पार लंघ जाता है। 8। 1। 3। हे प्यारे ! जब प्रभू-पातशाह मिल जाता है तब जनम-मरण के चक्कर का दुख काटा जाता है। 1। हे भाई ! (मेरा) प्रभू (-पातशाह) सुंदर है सुचॅजा है सियाना है।जब वह मुझे दीदार देता है तो मेरे अंदर जान पड़ जाती है (प्रभू का दीदार ही मेरी जिंदगी है)। 2। हे प्यारे प्रभू ! जो जीव आपसे विछुड़ जाते हैं वे (माया के मोह का) जहर खा के मानस जनम में आए हुए भी आत्मिक मौत मर जाते हैं। 3। (पर) हे प्यारे प्रभु ! (जीवों के भी क्या वश।) जिस जीव को आप स्वयं (अपने साथ) मिलाते हैं वही आपको मिलता है।मैं उस (भाग्यशाली) के चरणों में लगता हूँ। 4। हे प्यारे (प्रभू) ! आपके दर्शन करके जो आनंद (अनुभव होता है) वह मुंह से बयान नहीं किया जा सकता। 5। हे प्यारे ! जिसने सदा-स्थिर प्रभू के साथ पक्का प्यार डाल लिया।उसका वह प्यार कभी टूट नहीं सकता।वह प्यार तो युगों-युगों तक उसके हृदय में टिका रहता है। 6।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४३१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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