गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद के विचार की बरकति से ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की भक्ति अनोखी ही बरकति देने वाली है। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू का नाम आ बसता है।प्रभू की भक्ति उसको प्रभू के डर-अदब में रख के प्रभू के नाम में जोड़े रख के उसके आत्मिक जीवन को सुंदर बना देती है। 9। 14। 36।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ मनुष्य अन्य पदार्थों के स्वादों में फस के गलत राह पर पड़ा रहता है।नाम से टूट के दुख सहता रहता है। उसे महापुरुख गुरू नहीं मिलता जो उसे सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की समझ दे। 1। हे मेरे पगले मन ! परमात्मा के नाम का रस चख।परमात्मा के नाम का स्वाद ले। आप अपना जीवन व्यर्थ गवा-गवा के अन्य पदार्थों कें स्वाद में फंसा हुआ भटक रहा है। 1।रहाउ। (हे भाई !) दुनिया में वही मनुष्य पवित्र जीवन वाले होते हैं जो गुरू की शरण पड़े रहते हैं।उस सदा स्थिर हरी में सुरति जोड़ के उसके नाम में लीन रहते हैं। पर क्या कहा जाय।प्रभू की बख्शिश के बिना कुछ नहीं मिलता। 2। (जिनपे बख्शिश होती है वह) अपना जीवन खोजते हैं।गुरू शबद के द्वारा मन में से विकार दूर कर के अन-रसों से निर्लिप हो जाते हैं। वे गुरू की शरण ही पड़े रहते हैं।बख्शिशें करने वाला बख्शिंद हरी उनपे बख्शिश करता है। 3। (हे भाई !) हरि-नाम के बिना सुख नहीं मिलता।अंदर से दुख-कलेश दूर नहीं होता। पर ये जगत माया के मोह में फसा रहता है (नाम भूल के) माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। 4। (नाम-हीन जीव-सि्त्रयां ऐसे ही हैं जैसे) छुटॅड़ें अपने पति के मिलाप की कद्र नहीं जानतीं।व्यर्थ ही शारि रिक श्रृंगार करती हैं। हर वक्त सदा ही (अंदर-अंदर से) जलती फिरती हैं।पति कभी सेज पर आता ही नहीं। 5। भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां (अपने) अंदर से स्वै भाव दूर करके प्रभू पति के चरणों में जगह ढूँढ लेती हैं। गुरू के शबद की बरकति से वे अपना जीवन सुंदर बनाती हैं।पति प्रभू ने उनको अपने साथ मिला लिया है। 6। हे भाई ! माया का मोह घोर अंधकार है (इसमें फस के) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य मौत को मन से भुला देते हैं। आत्मिक मौत मर के पैदा होने-मरने के चक्कर में पड़े रहते हैं।जम के दरवाजे पर ख्वार होते हैं। 7। जिनको परमात्मा ने स्वयं अपने चरणों में जोड़ लिया वे गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के गुणों की विचार करके प्रभू-चरणों में लीन हो गए। हे नानक ! जो मनुष्य हरि-नाम में रमे रहते हैं वह सदा-स्थिर परमात्मा के दरबार में सुर्खरूह हो जाते हैं। 8। 22। 15। 37।
आसा महला 5 असटपदीआ घरु 2 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥1॥ इन॑ बिधि नगरु वुठा मेरे भाई ॥ दुरतु गइआ गुरि गिआनु द्रिड़ाई ॥1॥ रहाउ ॥ साच धरम की करि दीनी वारि ॥ फरहे मुहकम गुर गिआनु बीचारि ॥2॥ नामु खेती बीजहु भाई मीत ॥ सउदा करहु गुरु सेवहु नीत ॥3॥ सांति सहज सुख के सभि हाट ॥ साह वापारी एकै थाट ॥4॥ जेजीआ डंनु को लए न जगाति ॥ सतिगुरि करि दीनी धुर की छाप ॥5॥ वखरु नामु लदि खेप चलावहु ॥ लै लाहा गुरमुखि घरि आवहु ॥6॥ सतिगुरु साहु सिख वणजारे ॥ पूंजी नामु लेखा साचु सम्हारे ॥7॥ सो वसै इतु घरि जिसु गुरु पूरा सेव ॥ अबिचल नगरी नानक देव ॥8॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 असटपदीआ घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने ज्ञान की दाति दी उस मनुष्य ने अपने शरीर-नगर में सत-संतोष-दया-धर्म-धैर्य -ये) पाँचों प्रफुल्लित कर लिए।और कामादिक (विकार) पाँचों नाराज कर लिए। (सत्य-संतोष आदि) पाँचों (अपने शरीर रूपी नगर में) बसा लिए।और कामादिक पाँचों (नगर में से) निकाल बाहर किए। 1। हे मेरे भाई ! इस तरह उस मनुष्य का शरीर-नगर बस गयाऔर गुरू ने (जिस मनुष्य को) आत्मिक जीवन की सूझ पक्की तरह से दे दी (उसके अंदर से) विकार-पाप दूर हो गए। 1।रहाउ। (हे भाई ! जिस गुरू ने ज्ञान बख्शा।उसने अपने शरीर नगरी की रक्षा के लिए) सदा-स्थिर प्रभू के नित्य की सिमरन की वाड़ दे ली। गुरू के दिए ज्ञान को सोच-मण्डल में टिका के उसने अपनी खिडकियां (ज्ञानेन्द्रियां) पक्की कर लीं। 2। हे मेरे मित्र ! हे मेरे भाई ! शरीर-खेती में परमात्मा का नाम बीजा करो। आप भी सदा गुरू की शरण लो।शरीर नगर में परमात्मा के नाम का सौदा करते रहो। 3। उनकी सारे हाट (दुकानें।ज्ञानेन्द्रियां) शांति।आत्मिक अडोलता और आत्मिक आनंद के हाट बन जाते हैं। हे भाई ! जो (सिख-) वणजारे (गुरू-) शाह के साथ एक रूप हो जाते हैं4। कोई (पाप-विकार उनके हरि-नाम के सौदे पर) जजीआ दण्ड महिसूल नहीं लगा सकता (कोई विकार उनके आत्मिक जीवन में कोई खराबी पैदा नहीं कर सकता) (हे भाई ! जिन्हें गुरू ने ज्ञान की दाति दी उनके शरीर-नगर के वास्ते) गुरू के प्रभू-दर से परवान हुई माफी की मोहर की मोहर बख्श दी। 5। हे मेरे मित्र ! हे मेरे भाई ! गुरू की शरण पड़ के आप भी हरि-नाम सिमरन का सौदा लाद के (आत्मिक जीवन का) व्यापार करो। (ऊँचे आत्मिक जीवन का) लाभ कमाओ और प्रभू के चरणों में ठिकाना प्राप्त करो। 6। (हे भाई ! नाम का सरमाया गुरू के पास है) गुरू (ही इस सरमाए का) शाहूकार है (जिस से आत्मिक जीवन का) व्यापार करने वाले सिखहरि-नाम का सरमाया हासिल करते हैं (जिस सिख को गुरू ने ज्ञान की दाति दी है वह) सदा-स्थिर प्रभू को अपने हृदय में संभाल के रखता है (यही है) लेखा-हिसाब (जो वह नाम-वणज में करता रहता है)। 7। हे नानक ! (कह, हे भाई !) पूरा गुरू जिस मनुष्य को प्रभू की सेवा-भक्ति की दाति बख्शता है वह इस (ऐसे हृदय-) घर में बसता रहता है जो परमात्मा के रहने के लिए (विकारों में) कभी ना डोलने वाली नगरी बन जाता है। 8। 1।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू के शबद के विचार की बरकति से ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की भक्ति अनोखी ही बरकति देने वाली है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।