गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥2॥
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥
हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥
अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥3॥
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥
तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥
नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥4॥33॥31॥6॥70॥
किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥
रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥
बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥
करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥1॥
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥
गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥1॥ रहाउ ॥
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥
हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥
किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥
सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥2॥
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥
जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥
अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥
तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥3॥
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥
हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥
जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥
नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥4॥1॥71॥
मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥
छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥1॥
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥
लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥1॥ रहाउ ॥
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥
धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥2॥
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥
सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥3॥
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥
गिरंबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥4॥2॥72॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उन मनुष्यों ने (जगत से आखिर) चले जाने को सदा (सामने) देखा है, उन्होंने परमात्मा का नाम (जीवन के सफर वास्ते) खर्च एकत्र किया है और (लोक परलोक में) इज्जत पाई है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।