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अंग 42

अंग
42
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥
गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥2॥
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥
हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥
अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥3॥
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥
तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥
नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥4॥33॥31॥6॥70॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: उन मनुष्यों ने (जगत से आखिर) चले जाने को सदा (सामने) देखा है, उन्होंने परमात्मा का नाम (जीवन के सफर वास्ते) खर्च एकत्र किया है और (लोक परलोक में) इज्जत पाई है। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य प्रभु की हजूरी में सत्कारे जाते हैं, परमात्मा स्वयं उन्हें अपने गले से लगा लेता है।2। गुरू के सन्मुख रहने वाले लोगों को (जीवन का) रास्ता साफ साफ दिखाई देता है। परमात्मा के दर पे उनके पहुँचने के राह में कोई रुकावट नहीं पड़ती। वह परमात्मा की सिफत सलाह करते रहते हैं। परमात्मा का नाम उनके मन में बसा रहता है, वह सदा प्रभु नाम में सुरति जोड़ के रखते हैं। उनके अंदर एक रस सुर से प्रभु की सिफति के (मानो, बाजे) बजते रहते हैं। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पे उनको शोभा मिलती है।3। जिन मनुष्यों ने गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा के नाम की सिफत सलाह की है, हर कोई उनकी वाह वाह करता है। हे प्रभु! मैं मंगते की आपके आगे अरजोई है कि मुझे उन की संगति बख्श। हे नानक! गुरू के सन्मुख रहने वाले उन मनुष्यों के अहो भाग्य जाग पड़ते है, जिनके हृदय में परमात्मा का नाम (आत्मिक) प्रकाश पैदा कर देता है।4।33।31।6।70।
सिरीरागु महला 5 घरु 1 ॥
किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥
रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥
बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥
करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥1॥
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥
गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥1॥ रहाउ ॥
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥
हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥
किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥
सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥2॥
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥
जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥
अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥
तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥3॥
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥
हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥
जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥
नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥4॥1॥71॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 घरु 1 ॥ हे अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ! हे (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य! हे मूर्ख! आप (अपने) पुत्रों को देख के, (अपनी) स्त्री के हाव-भाव को देख के क्यूँ मस्त हो रहा है? आप (दुनिया के कई) रस भोगता है, आप (कई तरह की) खुशियों का आनन्द लेता है, आप अनेकों (किस्म की) मौजें करता है। आप बड़े हुकम (भी) देता है, आप अहंकारी हैं के (लोगों के साथ अहंकारी) बरताव करता है। आपको करतार याद ही नहीं रहा।1। हे मेरे मन ! वह परमात्मा स्वयं ही सुख देने वाला है। (वह परमात्मा) गुरू की कृपा से मिलता है (अपनी ही) मेहर से मिलता है।1।रहाउ। (हे मूर्ख!) आप खाने में, पहनने में मस्त हो रहा है, आप सोना, चांदी धरती एकत्र कर रहा है। तूने कई किस्मों के बढ़ीया घोड़े, बढ़ीया हाथी और कभी ना थकने वाले रॅथ इकट्ठे कर लिए हैं। (माया की मस्ती में) आप अपने साक संबंधियों को भी भुला बैठा है, किसी को आप अपने चित्त में नहीं लाता। परमात्मा के नाम के बिना आप (आत्मिक जीवन में) गंदा है। सृजनहार प्रभु ने आपको अपने मन से उतार दिया है।2। (हे मूर्ख!) आप (धक्केशाही करके) संपक्ति एकत्र करता है (जिस करके लोगों की) बद्-दुआएं लेता है। (पर) जिस (परिवार) को आप (इस सम्पदा से) खुश करता है वह आपके समेत ही नाशवंत है। हे अहंकारी ! आप अपने मन की मति के दबाव में आया हुआ है और (धन-सम्पक्ति) का गुमान करता है। जिस (दुर्भाग्य वाले जीव) को उस प्रभु ने स्वयं ही गुमराह किया हैं (प्रभु की हजूरी में) ना उसकी (ऊँची) जाति (किसी काम की) ना (दुनिया वाली कोई) इज्जत।3। अकाल-पुरख के रूप सतिगुरू ने जिस मनुष्य को वह प्रभु सज्जन ही मिला दिया है, प्रभु के उस सेवक का रखवाला (हर जगह) प्रभु खुद ही बनता ळै। दुनिया के लोग उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। (पर अपनी) अहम् में (फंसा मनुष्य) दुखी (ही) रहता है। परमात्मा के सेवक को जो अच्छा लगता है, परमात्मा वही करता है। परमात्मा के दर पे उसकी बात कोई काट नहीं सकता। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के प्यार रंग में रंगा रहता है, वह सारे जगत में प्रकाश (मीनार) बन जाता है।4।1।71।
सिरीरागु महला 5 ॥
मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥
छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥1॥
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥
लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥1॥ रहाउ ॥
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥
धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥2॥
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥
सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥3॥
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥
गिरंबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥4॥2॥72॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 5 ॥ अगर किसी मनुष्य के मन में कई किस्म की बहुत सी चाव-उमंगें हों, अगर उसकी निगाह (दुनियां की) खुशियों में ही भूली रहें, अगर ऐसी बादशाहियां मिलती हों कि सिर पर छत्र टिके रहें, तो भी (साध-संगति के बिना ये सभ मौजें) सहम में डाल के रखती हैं।1। हे भाई ! साध-संगति में ही सुख मिलता है। उस अकाल-पुरख सृजनहार ने (जिसके माथे पर अच्छे भाग्यों का) लेख लिख दिया (उस को सत्संग मिलता है तथा उसका) दुख सहम दूर हो जाता है।1।रहाउ। धरती पे जितनी भी सुंदर सुंदर जगहें हैं (अगर कोई मनुष्य) वह सारे ही स्थल घूम घूम के देख आया हो, अगर कोई बहुत धनवान हो, बहुत सारी धरती का मालिक हो, तो भी (साध-संगति के बिना) “मेरा पैसा” “मेरी जमीन” कह कह के दुखी रहता है।2। अगर कोई मनुष्य डर-खतरा-झिझक उतार के (लोगों पे) अपना हुकम चलाए, लोगों से बड़ी अकड़ वाला सलूक करे, अगर उसने हरेक को अपने वस में कर लिया हैं तो भी (साध-संगति से वंचित रह के परमात्मा के) नाम के बगैर (सुख नहीं मिलता, और आखिर) मिट्टी में मिल जाता है।3। अगर कोई इतनी बड़ी हकूमत का मालिक बन जाए, कि भारी जिंमेवारी भी मिल जाए, और तेतीस करोड़ देवते उसके सेवक बन जाएं, सिद्ध और साधक उसके दर पर खड़े रहें, तो भी, हे नानक! (साध-संगति के बिना सुख नहीं मिलता, और) ये सभ कुछ आखिर सपना बन के रह जाता है।4।2।72।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उन मनुष्यों ने (जगत से आखिर) चले जाने को सदा (सामने) देखा है, उन्होंने परमात्मा का नाम (जीवन के सफर वास्ते) खर्च एकत्र किया है और (लोक परलोक में) इज्जत पाई है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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