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अंग 420

अंग
420
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हुकमी पैधा जाइ दरगह भाणीऐ ॥
हुकमे ही सिरि मार बंदि रबाणीऐ ॥5॥
लाहा सचु निआउ मनि वसाईऐ ॥
लिखिआ पलै पाइ गरबु वञाईऐ ॥6॥
मनमुखीआ सिरि मार वादि खपाईऐ ॥
ठगि मुठी कूड़िआर बंनि॑ चलाईऐ ॥7॥
साहिबु रिदै वसाइ न पछोतावही ॥
गुनहां बखसणहारु सबदु कमावही ॥8॥
नानकु मंगै सचु गुरमुखि घालीऐ ॥
मै तुझ बिनु अवरु न कोइ नदरि निहालीऐ ॥9॥16॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा की रजा में ही (ममता-मोह विसार के) जीव यहाँ से इज्जत कमा के जाता है और प्रभू की दरगाह में भी आदर पाता है। प्रभू की रजा में ही (ममता-मोह में फसने के कारण) जीवों को सिर पर मार पड़ती है और (जनम-मरण की) ईश्वरीय कैद में जीव पड़ते हैं। 3। 4। 5। अगर ये बात मन में बसा लें कि (हर जगह) परमात्मा का न्याय बरत रहा है।तो सदा-स्थिर प्रभू का नाम-लाभ कमा लेते हैं। (पर किसी अपनी चतुराई के उद्यम का) गुमान दूर कर देना चाहिए।(प्रभू की रजा में ही) हरेक जीव अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार प्राप्ति करता है। 6। जो जीव-स्त्री अपने मन की अगुवाई में चलती है उसके सिर पर (जनम-मरण के चक्कर की) मार है।वह (ममता मोह के) झगड़े में ख्वार होती है। झूठ की व्यापारिन जीव-स्त्री (ममता-मोह में ही) ठॅगी जाती है लुटी जाती है।(मोह की फाही में बंधी हुई ही यहाँ से परलोक की तरफ भेज दी जाती है)। 7। हे भाई ! मालिक प्रभू को अपने हृदय में बसा।(अंत में) पछताना नहीं पड़ेगा। उस प्रभू की सिफत सालाह कर।वह सारे गुनाह बख्शने वाला है। 8। हे प्रभू ! नानक आपका सदा-स्थिर नाम मांगता है।(आपकी मेहर हैं तो) गुरू की शरण पड़ के मैं ये घाल-कमाई करूँ। आपके बिना मेरा कोई और आसरा नहीं।मेरी तरफ अपनी मेहर भरी निगाह से देख। 9। 16।
आसा महला 1 ॥
किआ जंगलु ढूढी जाइ मै घरि बनु हरीआवला ॥
सचि टिकै घरि आइ सबदि उतावला ॥1॥
जह देखा तह सोइ अवरु न जाणीऐ ॥
गुर की कार कमाइ महलु पछाणीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
आपि मिलावै सचु ता मनि भावई ॥
चलै सदा रजाइ अंकि समावई ॥2॥
सचा साहिबु मनि वसै वसिआ मनि सोई ॥
आपे दे वडिआईआ दे तोटि न होई ॥3॥
अबे तबे की चाकरी किउ दरगह पावै ॥
पथर की बेड़ी जे चड़ै भर नालि बुडावै ॥4॥
आपनड़ा मनु वेचीऐ सिरु दीजै नाले ॥
गुरमुखि वसतु पछाणीऐ अपना घरु भाले ॥5॥
जंमण मरणा आखीऐ तिनि करतै कीआ ॥
आपु गवाइआ मरि रहे फिरि मरणु न थीआ ॥6॥
साई कार कमावणी धुर की फुरमाई ॥
जे मनु सतिगुर दे मिलै किनि कीमति पाई ॥7॥
रतना पारखु सो धणी तिनि कीमति पाई ॥
नानक साहिबु मनि वसै सची वडिआई ॥8॥17॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (जब गुरू की कार कमा के गुरू द्वारा बताए रास्ते पर चल केहर जगह प्रभू का निवास पहचान सकते हैं तो) मैं जंगलों में जा के क्यों (परमात्मा को मिलने के लिए) ढूँढू।जिस मनुष्य को परमात्मा हर जगह दिखाई दे जाए उसे घर में हरा-भरा जंगल (दिखता है।उसे घर में जंगल में हर जगह प्रभू ही नजर आता है)। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू में टिकता है।परमात्मा तुरंत उसके हृदय-घर में आ बसता है। 1। मैं जिधर भी देखता हूँ।मुझे उधरवह (परमात्मा) ही दिखता है।(ये कभी) नहीं समझना चाहिए (कि उस प्रभू के बिना) कोई और (भी उस जैसा जगत में मौजूद) है। गुरू की बताई कार कमा के (हर जगह परमात्मा का) ठिकाना (निवास) पहचान लेते हैं। 1।रहाउ। जब सदा-स्थिर प्रभू स्वयं (किसी जीव को अपने चरणों में) मिलाता है तबवह उस जीव के मन में प्यारा लगने लगता है। वह जीव सदा उसकी रजा में चलता है।और उसकी गोद में लीन हो जाता है। 2। सदा-स्थिर मालिक जिस मनुष्य के मन में बस जाता है।उस मनुष्य को अपने मन में बसा हुआ वही प्रभू (हर जगह दिखता है)। (उसको ये निश्चय हो जाता है कि) प्रभू खुद ही आदर-सत्कार व गुण (वडिआईआं) देता है (और उसके खजाने में इतनी वडिआईयां है कि) देते हुए वह कम नहीं होतीं। 3। (गुरू की बताई कार-कमाई छोड़ के) धड़े-धड़े की खुशामद करने से परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं हो सकती। (धिर-धिर की खुशामद करना यूँ है।जैसे पत्थर की बेड़ी में सवार होना।और जो मनुष्य इस) पत्थर की बेड़ी में सवार होता है।वह (संसार-) समुंद्र में डूब जाता है। 4। (परमात्मा के नाम का सौदा करने के वास्ते) अगर अपना मन (गुरू के आगे) बेच दें।और अपना सिर भी दे दें (भाव।अपने मन के पीछे चलने की जगह।गुरू की मति पर चलें और अपनी बुद्धि का गुमान भी छोड़ दें) तो गुरू के द्वारा अपना हृदय-घर तलाश के (अपने अंदर ही) नाम पदार्थ पहचान लेते हैं। 5। हर कोई जनम-मरन के चक्कर का जिक्र करता है (और इससे डरता भी है कि ये जनम-मरन का चक्कर) ईश्वर ने खुद ही बनाया है। जो जीव स्वै भाव गवा के (माया के मोह की ओर से) मर जाते हैं।उन्हें ये जनम-मरन का चक्कर नहीं व्यापता। 6। (पर। जीव के भी क्या वश।पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) धुर से ही जीव को जिस तरह के कर्म करने का हुकम होता है जीव वही कर्म करता है। पर अगर जीव अपना मन गुरू के हवाले करके प्रभू-चरनों में टिक जाए (तो इसका इतना ऊँचा आत्मिक जीवन बन जाता है कि) कोई भी उसका मूल्य नहीं डाल सकता (वह अनमोल हो जाता है)। 7। (ये सारे जीव उस जौहरी परमात्मा के अपने ही बनाए हुए रत्न हैं) वह मालिक खुद ही इन रत्नों की परख करता है और (परख-परख के) स्वयं ही इनका मूल्य निर्धारित करता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में मालिक प्रभू बस जाता है।उसको सदा स्थिर रहने वाली इज्जत बख्शता है। 8। 17।
आसा महला 1 ॥
जिन॑ी नामु विसारिआ दूजै भरमि भुलाई ॥
मूलु छोडि डाली लगे किआ पावहि छाई ॥1॥
बिनु नावै किउ छूटीऐ जे जाणै कोई ॥
गुरमुखि होइ त छूटीऐ मनमुखि पति खोई ॥1॥ रहाउ ॥
जिन॑ी एको सेविआ पूरी मति भाई ॥
आदि जुगादि निरंजना जन हरि सरणाई ॥2॥
साहिबु मेरा एकु है अवरु नही भाई ॥
किरपा ते सुखु पाइआ साचे परथाई ॥3॥
गुर बिनु किनै न पाइओ केती कहै कहाए ॥
आपि दिखावै वाटड़ीं सची भगति द्रिड़ाए ॥4॥
मनमुखु जे समझाईऐ भी उझड़ि जाए ॥
बिनु हरि नाम न छूटसी मरि नरक समाए ॥5॥
जनमि मरै भरमाईऐ हरि नामु न लेवै ॥
ता की कीमति ना पवै बिनु गुर की सेवै ॥6॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जिन लोगों ने और भटकनों में पड़ के (सही जीवन राह से) टूट के परमात्मा का नाम भुला दिया। जो लोग (संसार-वृक्ष के) मूल (-प्रभू) को छोड़ के (संसार-वृक्ष की) डालियों (माया के पसारे) में लग गए उनको (आत्मिक जीवन में से) कुछ भी ना मिला। 1। (गुरू के द्वारा) यदि कोई मनुष्य ये समझ ले (तो उसे ये समझ आ जाती है कि) परमात्मा के नाम (में जुड़े) बिना (माया के मोह से) बच नहीं सकते। गुरू के बताए हुए रास्ते पर चले तब ही (माया के मोह से) मनुष्य को निजात मिलती है।अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया मोह में फस के) अपनी इज्जत (परमात्मा की नजरों में) गवा लेता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने एक परमात्मा का सिमरन किया।उनकी बुद्धि (माया के मोह में) मार नहीं खाती। प्रभू के वह सेवक उस प्रभू की शरण में ही टिके रहते हैं जो सारे जगत का मूल है और युगों के भी आरम्भ से है और जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। 2। हे भाई ! हमारा मालिक-प्रभू बेमिसाल है।उस जैसा और कोई नही। अगर उस सदा-स्थिर प्रभू के ओट-आसरे टिके रहें।तो उसकी मेहर से आत्मिक आनंद मिलता है। 3। बहुती दुनिया अनेकों रास्ते बताती है।पर गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा (अपने मिलाप का) सही रास्ता स्वयं ही दिखा देता है।(जीव के हृदय में) सदा-स्थिर रहने वाली भक्ति कर देता है। 4। पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसे अगर (सही रास्ता) समझाने की कोशिश भी करें।तो भी वह गलत रास्ते पर ही जाता है। परमात्मा के नाम के बिना वह इस (गलत रास्ते से) बच नहीं सकता।(कुमार्ग पर पड़ा हुआ) वह आत्मिक मौत सहेड़ लेता है।(मानो) नर्क में पड़ा रहता है। 5। जो मनुष्य हरी का नाम नहीं सिमरता वह पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है।इसी चक्कर में पड़ा रहता है। (इससे बचने के लिए एक ही तरीका है कि परमात्मा का नाम जपो।पर) गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा के नाम की कद्र नहीं पड़ सकती। 6।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा की रजा में ही (ममता-मोह विसार के) जीव यहाँ से इज्जत कमा के जाता है और प्रभू की दरगाह में भी आदर पाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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