अंग
41
सिरी राग
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हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥
सिरीरागु महला 4 ॥
हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥
जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥
करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥1॥
मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥
हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥1॥ रहाउ ॥
होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥
निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥
हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥2॥
सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥
बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥
जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥3॥
आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥
आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥
सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥4॥4॥68॥
हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥
जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥
करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥1॥
मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥
हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥1॥ रहाउ ॥
होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥
निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥
हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥2॥
सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥
बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥
जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥3॥
आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥
आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥
सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥4॥4॥68॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ॥ मै सदा (चाह में) खड़ी हुई (परमात्मा के देश का) राह पूछती हूँ (मैं सदा लोचती रहती हूँ कि) कोई मुझे प्रभु के बारे में बताए, और उस के द्वारा (उसकी सहायता से प्रभु के चरणों में) पहुँचू। जिन (सत्संगी सहेलियों) ने प्यारे प्रभु का मिलाप हासिल किया है मैं उनके आगे तरला विनती करूँ, उनकी सेवा करके उनके पीछे लगी फिरूँ। क्योंकि, मेरे अंदर प्रभु मिलन की चाह है।1। हे मेरे भाईओ! कोई मुझे परमात्मा से मिला दे। (पर गुरू के बिना और कौन मिला सकता है?) मैं सतिगुरू से सदके जाता हूँ, जिसने परमात्मा दिखा दिया (जो दिखा देता है)।1।रहाउ। (मेरा मन चाहता है कि) मैं और मान-सम्मान आसरे छोड़ के पूरे सतिगुरू के चरणों पे गिर जाऊँ। गुरू उनका मान आसरा है, जिनका और कोई आसरा नहीं होता। (निमाणियों को) गुरू दिलासा देता है। गुरू की महानताओं का बयान कर कर के मेरा मन नहीं भरता। गुरू मुझे मेरे पास ही बसते परमात्मा को मिलाने के समर्थ है।2। जितना ये सारा जगत है हरेक जीव सत्गुरू को मिलने की चाह रखता है, पर खुश-किस्मती के बगैर सतिगुरू के दर्शन नहीं होते (गुरू की कद्र नहीं पड़ती)। (गुरू से विछुड़ के) दुर्भाग्यवान जीव स्त्री बैठी दुखी होती है। (पर, जीवों के भी क्या बस?) जो कुछ परमात्मा को ठीक लगता है वही होता है। धुर से प्रभु की दरगाह से लिखे हुकम को कोई मिटा नहीं सकता।3। परमात्मा खुद ही सतिगुरू मिलाता है (और गुरू के द्वारा) अपने चरणों में मिलाता है। प्रभु (जीवों को) स्वयं ही सतिगुरू से जोड़ के मेहर करके अपने साथ मिलाने के स्मर्थ है। हे नानक! जगत (के जीवों) का सहारा परमात्मा जगत में हर जगह खुद ही खुद है (जिस जीव को वह अपने चरणों से जोड़ता है वह उस से इस प्रकार घुल-मिल के एक हो जाता है जैसे) पानी पानी में एक रूप हो जाता है।4।4।68।
रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥
सिरीरागु महला 4 ॥
रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥
जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥
ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥1॥
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥
सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥
सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥
से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥2॥
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥
बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥
ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥3॥
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥
आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अंम्रितु चोइ ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥4॥5॥69॥
रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥
जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥
ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥1॥
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥
सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥
सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥
से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥2॥
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥
बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥
ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥3॥
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥
आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अंम्रितु चोइ ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥4॥5॥69॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ॥ परमात्मा का नाम बड़ा श्रेष्ठ रस है, आत्मिक जीवन देने वाला है। ये रस किस तरह मिल सकता है? कैसे कोई मनुष्य यह रस खा सकता है? (अगर यह भेद समझना है तो हे भाई!) उन जीव सि्त्रयों को जा के पूछो, जिन्होंने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है। (उनको पूछो कि आपको) प्रभु कैसे आ के मिला है। (जिन जीव सि्त्रयों ने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है) वह (दुनियां की शोभा आदि से) बेमुहताज हो जाती हैं (इस वास्ते वह ज्यादा) नहीं बोलतीं। मैं उनके पैर मल मल के धोती हूँ।1। हे भाई! (गुरू) सज्जन को मिल के परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभाल। सज्जन गुरू अकाल-पुरख का रूप है, वह (शरण आए मनुष्य के हृदय में से) अहंकार का दुख मार के निकाल देता है।1।रहाउ। जे जीव सि्त्रयां गुरू के सन्मुख रहती हैं, वही सुहाग भाग वाली हो जाती हैं। (उनसे जीनव युक्ति पूछने से) उनके मन में तरस आ जाता है (और वह बताती हैं कि) सतिगुरू के वचन एक कीमती रतन है, जो जीव (गुरू के बचनों पर) श्रद्धा बना लेता है वह परमात्मा का रस चख लेता है। जिन मनुष्यों ने गुरू के अनुसार रहके परमात्मा का नाम रस चखा है वह बड़े भाग्यशाली समझे जीते हैं।2। (जैसे जल सारी बनस्पति को हरा भरा कर देने वाला है, वैसे ही) परमात्मा का यह नाम-रस वन-तृण में हर जगह मौजूद है (और सारी सृष्टि की जीवात्मा का आसरा है) पर दुर्भाग्यपूर्ण जीव स्त्री इस नाम रस को नहीं चखती। गुरू की शरण पड़े बिना ये नाम-रस नहीं प्राप्त होता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (नाम रस से वंचित रह कर) बिलकते ही रहते हैं। उनके अंदर क्रोध की आफ़त टिकी रहती है, वे सतिगुरू के आगे सिर नहीं झुकाते।3। (परमात्मा व परमात्मा के नाम रस में कोई फर्क नहीं है) परमात्मा खुद ही (सब जीवों की जीवात्मा का सहारा) रस है। परमात्मा खुद ही मेहर करके यह नाम रस देता है (जैसे शहद के छत्ते में से शहद चूता है, वैसे ही) गुरू की शरण पड़ने से आत्मिक जीवन देने वाला रस (जीव के अंदर से) टपकता है। हे नानक! जिस मनुष्य के मन में वह परमात्मा आ बसता है (नाम आ बसता है) उसका सारा शरीर, उसका मन हरा हो जाता है (खिल पड़ता है)।4।5।69।
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥
सिरीरागु महला 4 ॥
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥
आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥
गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥1॥
भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥
पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥
दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥
आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥
गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥1॥
भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥
पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥
हिन्दी अर्थ: श्री राग महला ॥ दिन चढ़ता है फिर डूब जाता है, सारी रात भी गुजर जाती है (इस तरह सहजे सहजे) वह घटती जाती है पर मनुष्य समझता नहीं (गुजरता समय मनुष्य की उम्र को इस तरह काटता जा रहा है, जैसे) चूहा सदा रॅस्सी को कुतरता जाता है। (जैसे) गुड़ (जीवों को) मीठा (लगता है, तैसे ही) माया का मीठा मोह प्रभाव डाल रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया की मिठास में फंस के खुआर होता है जैसे मक्खी गुड़ पर चिपक कर मर जाती है।1। हे भाई! मेरे वास्ते तो वह परमात्मा ही मित्र है, साथी है। पुत्र का, स्त्री का मोह जहर है। (जो आत्मिक जीवन को खत्म कर देता है, और पुत्र स्त्री में से) अंत में कोई भी साथी नहीं बनता।1।रहाउ। (जो मनुष्य गुरू की मति ले के परमात्मा में सुरति जोड़ते हैं) वह (इस मौत से) बच जाते हैं, प्रभु की शरण पड़ के वह निर्लिप रहते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।