जोगी भोगी कापड़ी किआ भवहि दिसंतर ॥ गुर का सबदु न चीन॑ही ततु सारु निरंतर ॥3॥ पंडित पाधे जोइसी नित पड़्हहि पुराणा ॥ अंतरि वसतु न जाणन॑ी घटि ब्रहमु लुकाणा ॥4॥ इकि तपसी बन महि तपु करहि नित तीरथ वासा ॥ आपु न चीनहि तामसी काहे भए उदासा ॥5॥ इकि बिंदु जतन करि राखदे से जती कहावहि ॥ बिनु गुर सबद न छूटही भ्रमि आवहि जावहि ॥6॥ इकि गिरही सेवक साधिका गुरमती लागे ॥ नामु दानु इसनानु द्रिड़ु हरि भगति सु जागे ॥7॥ गुर ते दरु घरु जाणीऐ सो जाइ सिञाणै ॥ नानक नामु न वीसरै साचे मनु मानै ॥8॥14॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: जोगी और लीरें पहनने वाले फकीर बेकार में ही देश-देशांतरों का रटन करते हैं। वे सतिगुरू के शबद को नहीं खोजते।वे एक रस श्रेष्ठ अस्लियत को नहीं खोजते। 3। पण्डित पांधे (शिक्षक) और ज्योतिषी नित्य पुराण आदि पुस्तकें ही पढ़ते रहते हैं। परमात्मा हृदय में छुपा हुआ है।ये लोग अंदर बसती नाम-वस्तु को नहीं पहचानते। 4। अनेकों लोग तपी बने हुए हैं।जंगलों में (जा के) तप साध रहे हैं।और सदा तीर्थों पर निवास रखते हैं। (तपों के कारण वे) क्रोध से भरे रहते हैं।अपने आत्मिक जीवन को नहीं खोजते।त्यागी बनने का उनहें कोई लाभ नहीं होता। 5। अनेकों लोग ऐसे हैं जो यतन करके वीर्य को रोक के रखते हैं।और अपने आप को जती कहलाते हैं। पर गुरू के शबद के बिना वे भी (क्रोधादिक तामसी स्वभाव से) निजात नहीं पाते।(जती होने की ही) भटकना में पड़ कर जनम-मरन के चक्कर में पड़े रहते हैं। 6। (पर) अनेकों गृहस्ती ऐसे हैं जो सेवा करते हैं सेवा के साधन करते हैं।और गुरू की दी हुई मति पर चलते हैं वे नाम जपते हैं। औरों को नाम जपने के लिए प्रेरित करते हैं।अपना आचरण पवित्र रखते हैं।वे परमात्मा की भक्ति में अपने आप को द्ढ़ करके (विकारों के हमलों की ओर से) सुचेत रहते हैं। 7। हे नानक ! परमात्मा का दर परमात्मा का घर गुरू के द्वारा (गुरू की शरण पड़ के ही) पहचाना जा सकता है।वही मनुष्य पहचानता है जो गुरू के पास जाता है। उसे परमात्मा का नाम नहीं बिसरता।उसका मन सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में रम जाता है। 8। 14।
आसा महला 1 ॥ मनसा मनहि समाइले भउजलु सचि तरणा ॥ आदि जुगादि दइआलु तू ठाकुर तेरी सरणा ॥1॥ तू दातौ हम जाचिका हरि दरसनु दीजै ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ मन मंदरु भीजै ॥1॥ रहाउ ॥ कूड़ा लालचु छोडीऐ तउ साचु पछाणै ॥ गुर कै सबदि समाईऐ परमारथु जाणै ॥2॥ इहु मनु राजा लोभीआ लुभतउ लोभाई ॥ गुरमुखि लोभु निवारीऐ हरि सिउ बणि आई ॥3॥ कलरि खेती बीजीऐ किउ लाहा पावै ॥ मनमुखु सचि न भीजई कूड़ु कूड़ि गडावै ॥4॥ लालचु छोडहु अंधिहो लालचि दुखु भारी ॥ साचौ साहिबु मनि वसै हउमै बिखु मारी ॥5॥ दुबिधा छोडि कुवाटड़ी मूसहुगे भाई ॥ अहिनिसि नामु सलाहीऐ सतिगुर सरणाई ॥6॥ मनमुख पथरु सैलु है ध्रिगु जीवणु फीका ॥ जल महि केता राखीऐ अभ अंतरि सूका ॥7॥ हरि का नामु निधानु है पूरै गुरि दीआ ॥ नानक नामु न वीसरै मथि अंम्रितु पीआ ॥8॥15॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे भाई ! अपने मन में से उठता) मायावी विचार मन में ही लीन कर दे (मन के पीछे लगने से संसार समुंद्र से पार नहीं लांघ सकते)।सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में जुड़ के ही संसार समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। हे सृष्टि के आदि प्रभू ! हे युगों से भी पहले के प्रभू ! हे सबके पालने वाले प्रभू ! आप सब जीवों पे दया करने वाला है।मैं आपकी शरण आया हूँ (मुझे मन की प्रेरणा से बचा)। 1। हे हरी ! आप सब जीवों को दातें देने वाला है।हम जीव (आपके दर पर) मंगते हैं।(हमें) दर्शन दे। गुरू की शरण पड़ के ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है।(जो सिमरता है।उसके) मन का मन्दिर (हरि-नाम से) भीग जाता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! माया का) बुरा लालच छोड़ देना चाहिए (मनुष्य जब लालच छोड़ देता है) तब सदा स्थिर प्रभू से सांझ पा लेता है। गुरू के शबद द्वारा ही (परमात्मा के नाम में) लीन हो सकते हैं (जो लीन होता है) वह जीवन के सबसे ऊँचे मनोरथ को समझ लेता है। 2। ये (माया का) लोभी मन (शरीर नगर का) राजा (बन बैठता है) लोभ में फसा हुआ (सदा) माया का लोभ करता रहता है। गुरू की शरण पड़ के ही ये लोभ दूर किया जा सकता है (जो मनुष्य लोभ दूर कर लेता है।उसकी) परमात्मा से प्रीत बन जाती है। 3। अगर कॅलर में खेती बीजी जाए।तो बीजने वाला उसमें से कोई लाभ नहीं कमा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में रच-मिच नहीं सकता।झूठ झूठ में ही मिलता है। 4। हे माया-मोह में अंधे हुए जीवो ! माया का लालच छोड़ दो ! लालच में (फसने से) भारी दुख सहना पड़ता है। जिस मनुष्य के मन में (लालच की जगह) सदा-स्थिर मालिक बस जाता है।वह अहंकार के जहर को मार लेता है (उस अहंकार को मार देता है जो आत्मिक मौत का कारण बनती है)। 5। हे भाई ! दुविधा त्याग दो।ये गलत रास्ता है (इस रास्ते पर चल के) लूटे जाएँगे। (माया-मोह के रास्ते की जगह) सतिगुरू की शरण पड़ कर दिन रात परमात्मा के नाम की सिफत सालाह करनी चाहिए। 6। मन के मुरीद मनुष्य (का हृदय) पत्थर है चट्टान है (पत्थर व चट्टान की तरह सख़्त है)।उसका जीवन बेस्वाद रहता है धिक्कारयोग्य है। पत्थर को जितनी भी देर पानी में रखो।तो भी वह अंदर से सूखा ही रहता है (मनमुख का हृदय सत्संग में आ के भी द्रवित नहीं होता)। 7। परमात्मा का नाम (सारे आत्मिक गुणों का) खजाना है।जिस मनुष्य को पूरे गुरू ने नाम दे दिया।वह। हे नानक ! सदा जप-जप के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है।उसे परमात्मा का नाम कभी भूलता नहीं। 8। 15।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (पर जिन्हें परमात्मा का नाम ठीक नहीं लगता वह) परदेसी जीव जीवन के सही रास्ते से भटक के चले जा रहे हैं। (माया के मोह में फसा) जगत वही काम दुखी हो-हो के करता है जो गले में माया के जंजाल डाले जाता है।(माया-मोहे) जगत को सदा स्थिर प्रभू का नाम प्यारा नहीं लगता। 1। (जिसको परमात्मा ने) गुरू के शबद द्वारा (अपना आप) दिखा दिया।उसकी भटकना समाप्त हैं जाती है।उसे किसी और जगह सुख तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती। उसने अपने अंदर से माया की ममता दूर कर दी।माया का मोह त्याग दिया।वह उस घर में आ टिका जो सदा के लिए उसका अपना बन गया (प्रभू चरणों में लीन हो गया)। 1।रहाउ। सच का व्यापारी जीव सदा-सिथर प्रभू में जुड़ के (प्रभू को) मिल जाता है।झूठे पदार्थों के मोह में लगने से प्रभू नहीं मिलता। सदा-स्थिर परमात्मा में चित्त जोड़ने से बार-बार जनम में नहीं आते। 2। हे भाई ! आप मरे सम्बंधियों को रोते हैं (उनकी खातिर वैराग करते हो) ये व्यर्थ कर्म है।दरअसल आपको वैराग में आने की समझ ही नहीं। परमात्मा की सिफत सालाह करो।(ये बात) समझो (कि पैदा होना मरना) परमात्मा का हुकम है (इस तरह दुनिया की ओर से) वैराग करने की जाच सीखो। ये बात समझनी चाहिए कि हरेक जीव परमात्मा की रजा में ही रोजी लिखा के जगत में आता है।उसकी रजा को पहचानना चाहिए। इस तरह जीवन लाभ मिलता है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जोगी और लीरें पहनने वाले फकीर बेकार में ही देश-देशांतरों का रटन करते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।