Lulla Family

अंग 417

अंग
417
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु आसा महला 1 असटपदीआ घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिन सिरि सोहनि पटीआ मांगी पाइ संधूरु ॥
से सिर काती मुंनीअनि॑ गल विचि आवै धूड़ि ॥
महला अंदरि होदीआ हुणि बहणि न मिलनि॑ हदूरि ॥1॥
आदेसु बाबा आदेसु ॥
आदि पुरख तेरा अंतु न पाइआ करि करि देखहि वेस ॥1॥ रहाउ ॥
जदहु सीआ वीआहीआ लाड़े सोहनि पासि ॥
हीडोली चड़ि आईआ दंद खंड कीते रासि ॥
उपरहु पाणी वारीऐ झले झिमकनि पासि ॥2॥
इकु लखु लहनि॑ बहिठीआ लखु लहनि॑ खड़ीआ ॥
गरी छुहारे खांदीआ माणनि॑ सेजड़ीआ ॥
तिन॑ गलि सिलका पाईआ तुटनि॑ मोतसरीआ ॥3॥
धनु जोबनु दुइ वैरी होए जिन॑ी रखे रंगु लाइ ॥
दूता नो फुरमाइआ लै चले पति गवाइ ॥
जे तिसु भावै दे वडिआई जे भावै देइ सजाइ ॥4॥
अगो दे जे चेतीऐ तां काइतु मिलै सजाइ ॥
साहां सुरति गवाईआ रंगि तमासै चाइ ॥
बाबरवाणी फिरि गई कुइरु न रोटी खाइ ॥5॥
इकना वखत खुआईअहि इकन॑ा पूजा जाइ ॥
चउके विणु हिंदवाणीआ किउ टिके कढहि नाइ ॥
रामु न कबहू चेतिओ हुणि कहणि न मिलै खुदाइ ॥6॥
इकि घरि आवहि आपणै इकि मिलि मिलि पुछहि सुख ॥
इकन॑ा एहो लिखिआ बहि बहि रोवहि दुख ॥
जो तिसु भावै सो थीऐ नानक किआ मानुख ॥7॥11॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 असटपदीआ घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिन (सुंदरियों) के सिर पर केसों के बीच के चीर में सिंधूर डाल के (काले केसों की) पट्टियां (अब तक) शोभती आ रही हैं। वह सिर कैंची से मुंने जा रहे हैं (उनके) मुंह में मिट्टी पड़ रही है। जो पहले अपने महलों में बसती थीं।अब उन्हें उन महलों के नजदीक कहीं फटकने भी नहीं दिया जाता। 1। हे अकाल पुरख ! (बिपता के समय हम जीवों की आपको ही) नमस्कार है (और कौन सा आसरा हैं सकता है।) हे आदि पुरख ! (आपकी रजाओं का हमें) भेद नहीं मिलता।आप ये रजा स्वयं ही कर के स्वयं ही देख रहा है। 1।रहाउ। जब वे सुंदरियां बयाह के आई थीं।उनके पास उनके दूल्हे सुन्दर लग रहे थे। वे पालकी में चढ़ के आई थीं।(उनकी बाँहों पे) हाथी दांत के चूड़े (शगनों के) सजे हुए थे। (ससुराल-घर में आने पर) ऊपर से (शगनों का) पानी वारा जाता था।(शीशे जड़े हुए) पंखे उनके पास (उनके हाथों में) झिलमिला रहे थे। 2। (ससुराल घर आ के) बैठी वे एक-एक लाख रुपए (शगनों का) लेती थीं।खड़ी भी लेती थीं। गरी-छुहारे खाती थीं।और सुंदर सेजों का आनंद लेती थीं। (आज) उनके गलों में (जालिमों ने) रस्सियां डाली हुई हैं।उनके (गले में पड़े हुए) मोतियों के हार टूट रहे हैं। 3। (उनका) धन-जोबन। जिसके नशे में कभी ये सुंदरियां मग़रूर थीं।आज यही दोनों धन-जोबन उन के वैरी बने हुए हैं। (बाबर ने) जालिम सिपाहियों को हुकम दे रखा है।वह उनकी इज्जत गवा के उनको साथ ले के जा रहे हैं। (जीवों के कुछ भी वश में नहीं) अगर उस परमात्मा को अच्छा लगे तो (अपने पैदा किए जीवों को) आदर-सत्कार देता है।अगर उसकी मर्जी हो तो सजा देता है। 4। यदि पहले ही (अपने-अपने फर्ज को) याद करते रहें (चेते रखें) तो (ऐसी) सजा कयूँ मिले। (यहाँ के) हाकिमों ने ऐश में।तमाशों के चाव में अपने फर्ज भुला दिए थे। (अब जब) बाबर की (दुहाई) फिरी है तो (और परजा कह तो बिसात ही क्या।कोई) पठान-शहिजादा भी (कहीं से मांग-मूंग के) रोटी नहीं खा सकता। 5। (सैदपुर की सि्त्रयों का ये हाल हो रहा है कि जालिमों के पँजों में आ के) मुसलमानियों के निमाज के वक्त टूटते जा रहे हैं।हिन्दवाणियों की पूजा का समय जा रहा है। (जो पहले नहा के।टीके लगा के स्वच्छ चौकों में बैठती थीं।अब) ना वे स्नान कर के तिलक लगा सकती हैं।ना ही उन के स्वच्छ चौके रह गए हैं। (जिन्होंने पहले धन-जोबन के नशे में) कभी राम को याद तक नहीं किया।अब (जालिम बाबर के सिपाहियों को खुश करने के लिए) उन्हें खुदा-खुदा कहना भी नसीब नहीं। 6। (बाबर की कत्लेआम की कैद में से) जो कोई एक-आध लोग (बच के) अपने-अपने घर में आते हें।वे एक-दूसरे को मिल-मिल के एक-दूसरे की सुख-शांति (हालचाल) पूछते हैं। (अनेकों साक-संबंधी मार दिए गये या कैद किए जा चुके हैं) उनकी किस्मत में यही बिपता लिखी हुई थी।वे एक-दूसरे के पास बैठ-बैठ के अपने-अपने दुख रोते हैं (रो-रो के अपने दुख बताते हैं)। (पर) हे नानक ! मनुष्य बिचारे क्या करने के लायक हैं।वही कुछ घटित होता है जो उस (सृजनहार करतार) को भाता है। 7। 11।
आसा महला 1 ॥
कहा सु खेल तबेला घोड़े कहा भेरी सहनाई ॥
कहा सु तेगबंद गाडेरड़ि कहा सु लाल कवाई ॥
कहा सु आरसीआ मुह बंके ऐथै दिसहि नाही ॥1॥
इहु जगु तेरा तू गोसाई ॥
एक घड़ी महि थापि उथापे जरु वंडि देवै भांई ॥1॥ रहाउ ॥
कहां सु घर दर मंडप महला कहा सु बंक सराई ॥
कहां सु सेज सुखाली कामणि जिसु वेखि नीद न पाई ॥
कहा सु पान तंबोली हरमा होईआ छाई माई ॥2॥
इसु जर कारणि घणी विगुती इनि जर घणी खुआई ॥
पापा बाझहु होवै नाही मुइआ साथि न जाई ॥
जिस नो आपि खुआए करता खुसि लए चंगिआई ॥3॥
कोटी हू पीर वरजि रहाए जा मीरु सुणिआ धाइआ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (अभी कल की बात है कि सैदपुर में रौनक ही रौनक थी।पर अब) कहाँ हैं (सैनिकों के) खेल तमाशे।कहाँ हैं घोड़े और (घोड़ों के) तबेले।कहाँ गए वो नगारे और शहनाईयां। कहाँ गए पश्मीने के गातरे।और कहाँ हैं वह (सैनिकों की) लाल वर्दियां। कहाँ है शीशे।और (शीशों में देखे जाने वाले) सुंदर मुखड़े।(आज) यहाँ (सैदपुर में कहीं) नहीं दिखते। 1। हे प्रभू ! ये जगत आपका (बनाया हुआ) है।आप इस जगत का मालिक है। (उस मालिक की आश्चर्यजनक खेल है) जगत रच के एक घड़ी में ही तबाह भी कर देता है।और धन दौलत बाँट के औरों को दे देता है। 1।रहाउ। कहाँ हैं वह सुंदर घर-महल-माढ़ियां और सुंदर सराएं। कहाँ है वह सुख देने वाली स्त्री और उसकी सेज।जिसे देख के (आँखों में से) नींद समाप्त हो जाती थी। कहाँ हैं वे पान और पान बेचने वालियां।और कहाँ हैं वो पहरेदार औरतें।सब गुम हो चुकी हैं। 2। इस धन की खातिर बहुत दुनिया ख्वार हुई है इस धन ने बहुत दुनिया को ख्वार किया है। पाप जुल्म किए बिना।ये दौलत इकट्ठी नहीं हो सकती।और मरने के वक्त ये (इकट्ठी करने वाले के) साथ नहीं जाती।(पर।जीव के भी क्या वश।) परमात्मा जिसे स्वयं गलत रास्ते पर डालता है (पहले उससे उसके) शुभ गुण छीन लेता है। 3। जब पठान हाकिमों ने सुना कि मीर बाबर हमला करके (धावा बोल के) ।तो उन्होंने अनेकों पीरों को (जादू-टूणे करने के लिए) रोक के रखा।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु आसा महला 1 असटपदीआ घरु 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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