जो तिसु भावै सो फुनि होइ ॥ सुणि भरथरि नानकु कहै बीचारु ॥ निरमल नामु मेरा आधारु ॥8॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: जगत में वही कुछ हो रहा है जो उसको अच्छा लगता है। हे भरथरी जोगी ! सुन।नानक आपको विचार की बात बताता है कि उस (सर्व-व्यापक) परमात्मा का पवित्र नाम मेरी जिंदगी का आसरा है। 8। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जो मनुष्य सारे जप करता है सारे तपसाधता है (शास्त्र आदि को समझने के लिए) हरेक किस्म की समझदारी व बुद्धि का प्रदर्शन भी करता है।पर यदि वह (परमात्मा का दास बनने की युक्ति) नहीं समझता।तो उसके (जप-तप आदि का) कोई उद्यम (प्रभू की हजूरी में) परवान नहीं चढ़ता। वह गलत रास्ते पर भटक रहा है। वह सही रास्ते पर नहीं जा रहा। परमात्मा के नाम से वंचित मनुष्य के सिर पर राख ही पड़ती है। 1। जगत पैदा होता मरता रहता है।(पर) जगत का मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है। जो प्राणी गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का दास (भगत) बन जाता है वह (जनम-मरन के चक्कर से) बच जाता है। 1।रहाउ। जगत माया के मोह में बंधा हुआ बहुती आशाओं में बंधा हुआ (पैदा होता-मरता रहता) है। पर कई (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की शिक्षा पर चल के मोह से निर्लिप रहते हैं। उनके अंदर परमात्मा का नाम बसता है (जिसकी बरकति से उनका हृदय-) कमल खिला रहता है। ऐसे लोगों को जनम-मरण के चक्कार का डर नहीं रहता। 2। (गुरू की शरण से टूट के) जगत कामातुर हो रहा है।स्त्री के मोह में फसा हुआ है; पुत्र-पत्नी के मोह में पड़ के परमात्मा के नाम को भुला रहा है। इस तरह अपना जीवन व्यर्थ गवाता है और मानस जन्म की खेल हार के जाता है। पर जो मनुष्य गुरू की (बताई हुई) सेवा करता है उसका नित्य कर्म श्रेष्ठ हो जाता है। 3। वैसे दुनिया की किरत-कार करता वह स्वै को जताता है। वह अंतरात्मे माया के मोह से आजाद रहता है।माया का प्रभाव उसके ऊपर कभी नहीं पड़ता। जो मनुष्य गुरू के शबद में (जुड़ के अपने अंदर से) माया का मोह जला देता है। परमात्मा के पवित्र नाम को सदा अपने हृदय में याद रखता है। 4। वह अपने भटकते मन की रक्षा करता है (माया के मोह से) रोक के रखता है। (गुरू के जिस) सिख को (परमात्मा) अपनी मेहर से।संगति में मिलाता है। गुरू की शरण आए बिना मनुष्य (जिंदगी के सही रास्ते से) भटक जाता है।और जनम-मरन के चक्कर में पड़ जाता है। जब प्रभू मेहर की निगाह करता है।तो उसे भी संगति में मिला के अपने चरणों में जोड़ लेता है। 5। (हे प्रभू !) आप सुंदर है।पर यदि मैं बताने का प्रयत्न करूँ कि आप कैसा सुंदर है तो बताया नहीं जा सकता। हे प्रभू ! आपके गुण बयान नहीं किए जा सकते।अगर मैं बयान करने का यतन करूँ।तो भी आपके गुणों का मूल्य नहीं पाया जा सकता। (आपसे विछुड़ के दुख आने है।पर) आपकी रजा में चल के सारे दुख सुख बन जाते हैं। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करने से सारे ही दुख मिट जाते हैं। 6। उस मनुष्य के अंदर ऐसी आत्मिक अवस्था बन जाती है कि।जैसे बिना हाथ से बजाए बाजा बजता है और पैरों से नाचे ताल पूरी होती है। अगर मनुष्य (गुरू के) शबद को समझ ले।तो वह अपने अंदर सदा-सिथर प्रभू का दीदार कर लेता है।उसके अंदरवह सदा स्थिर प्रभू प्रगट हो जाता है। उसको अपने अंतरात्मा में सुख ही सुख प्रतीत होते हैं। जिस मनुष्य को रखवाला प्रभू मेहर की नजर करके (माया के मोह से) बचाता है। 7। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का दास बन कर) स्वै भाव दूर करता है।उसको परमात्मा तीनों भवनों में बसता दिखाई पड़ता है। गुरू की बाणी के द्वारा उसको सही ज्ञान हो जाता है।वह सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। वह मनुष्य गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाए रखता है।एक-रस सुरति प्रभू में जोड़ता है। हे नानक ! उस मनुष्य का मानस जनम मुबारक है वह औरों का जीवन भी सोहना बना देता है। 8। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (परमात्मा के स्वरूप बारे) अनगिनत (विचार भरे) लेख लिख-लिख के (लिखने वालों के मन में अपनी विद्या और विचार-शक्ति का) गुमान ही (पैदा होता है)। बेशक अनगिनत लेख लिखे जाएं।परमात्मा का स्वरूप बयान से।लेख से परे है।उसके गुणों का परला छोर नहीं पाया जा सकता। उसके गुण कहने पर।बोलने पर।बारंबार पढ़-पढ़ के भी (मन पर अहंकार का) भार (ही बढ़ता) है। (पर हाँ) यदि मनुष्य का मन परमातमा की याद में रम जाए।यदि (मनुष्य की) सुरति में सदा स्थिर प्रभू (टिक जाए) तो बस ! यही है असल लेख (जो उसको परवान है)। 1। (हे भाई !) इस तरह का (अलेख) और सदा कायम रहने वाला आप सिर्फ एक प्रभू को ही जान (बाकी सारा जगत जनम मरन के ही चक्कर में है। और ये) पैदा होना-मरना भी आप उस परमात्मा का हुकम ही समझ। 1।रहाउ। (हे भाई ! उस सदा-स्थिर प्रभू को बिसार के) माया के मोह के कारण जगत मौत के सहम में बंधा पड़ा है। परमात्मा के नाम को ही संभाल के बंधन टूट सकते हैं। (पर ये नाम गुरू के द्वारा ही मिल सकता है) गुरू ही (नाम की दाति दे के) आत्मिक सुख देने वाला है।(गुरू के बिना ये दाति देने वाला) कोई और ना तलाशता फिर। ये नाम ही (हे भाई !) इस लोक और परलोक में आपके साथ निभ सकता है।2। (पर जगत तो माया के मोह में फसा हुआ है।नाम में जुड़े भी कैसे।जीव) तब ही एक परमात्मा में सुरति जोड़ सकता है।जब गुरू के शबद द्वारा (मोह की ओर से) मन जाए (मोह का प्रभाव अपने ऊपर पड़ने ही ना दे)। तब ही जीव माया की ओर मन की भटकना को दूर कर सकता है।जब (गुरू के शबद के द्वारा कामादिक पाँचों के) ना खत्म किए जा सकने वाले टोले (के प्रभाव को) समाप्त कर दे। जो मनुष्य अपने मन में परमात्मा का नाम बसा लेता है वह इसी जिंदगी में ही (इन पाँचों के प्रभाव से) आजाद हो जाता है; पर सदा स्थिर प्रभू (के नाम) में वही मनुष्य लीन होता है जो गुरू के सन्मुख रहे। 3। (हे भाई ! ऐसा सदा स्थिर सिर्फ एक परमात्मा ही है) जिसने ये धरती।आकाश आदि रचे हैं।जिसने सारी सृष्टि रची है। जो रच के नाश करने के भी समर्थ है। फिर वह स्वयं ही स्वयं सबके अंदर एक-रस मौजूद है। खुद ही (सब जीवों पर) बख्शिश करता है (इस बख्शिश के लिए) किसी और की सालाह नहीं लेता। 4। हे प्रभू ! आप खुद ही भरा हुआ ये (संसार-) समुंद्र है आप स्वयं ही इसमें माणिक हीरा है। आप पवित्र स्वरूप है।सदा स्थिर रहने वाला है।और सारे गुणों का खजाना है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जगत में वही कुछ हो रहा है जो उसको अच्छा लगता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।