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अंग ४१० · आसा

अंग
410
आसा
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  1. अलख अभेवीऐ हां ॥
  2. एका ओट गहु हां ॥
  3. मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥
  4. कारन करन तूं हां ॥
  5. ओइ परदेसीआ हां ॥

अलख अभेवीऐ हां ॥

अंग ४०९ से चला आ रहा अंश

अलख अभेवीऐ हां ॥
तां सिउ प्रीति करि हां ॥
बिनसि न जाइ मरि हां ॥
गुर ते जानिआ हां ॥
नानक मनु मानिआ मेरे मना ॥2॥3॥159॥

हिन्दी अर्थ: जिसका सही स्वरूप बताया नहीं जा सकता।जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। हे मेरे मन ! उस परमात्मा से प्यार डाल। जो कभी नाश नहीं होता जो ना पैदा होता है ना मरता है। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने गुरू के जरिएउस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली। उसका मन सदा (उसकी याद में) रमा रहता है। 2। 3। 159।

एका ओट गहु हां ॥

आसावरी महला 5 ॥
एका ओट गहु हां ॥
गुर का सबदु कहु हां ॥
आगिआ सति सहु हां ॥
मनहि निधानु लहु हां ॥
सुखहि समाईऐ मेरे मना ॥1॥ रहाउ ॥
जीवत जो मरै हां ॥
दुतरु सो तरै हां ॥
सभ की रेनु होइ हां ॥
निरभउ कहउ सोइ हां ॥
मिटे अंदेसिआ हां ॥
संत उपदेसिआ मेरे मना ॥1॥
जिसु जन नाम सुखु हां ॥
तिसु निकटि न कदे दुखु हां ॥
जो हरि हरि जसु सुने हां ॥
सभु को तिसु मंने हां ॥
सफलु सु आइआ हां ॥
नानक प्रभ भाइआ मेरे मना ॥2॥4॥160॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 ॥ हे मेरे मन ! एक परमात्मा का ही पल्ला पकड़। सदा गुरू की बाणी उचारता रह। हे मेरे मन ! परमात्मा की रजा को मीठी करके मान। (हे भाई !) अपने मन में बसते सारे गुणों के खजाने प्रभू को पा ले। हे मेरे मन ! (इस तरह सदा) आत्मिक आनंद में लीन रहना है। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! जो मनुष्य काम-काज करता हुआ माया के मोह से अछोह रहता है। वह मनुष्य इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। वह मनुष्य सभी के चरणों की धूल हुआ रहता है। (हे मेरे मन ! अगर गुरू की कृपा हो तो) मैं भी उस निरभय परमात्मा की सिफत सालाह करता रहूँ। उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं- हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को सतिगुरू की शिक्षा प्राप्त हो जाती है 1। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का अनंद प्राप्त हो जाता है। कभी कोई दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। हे मेरे मन ! जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह सदा सुनता रहता है (दुनिया में) हरेक मनुष्य उसका आदर-सत्कार करता है। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! जगत में पैदा हुआ वही मनुष्य कामयाब जीवन वाला है जो परमात्मा को प्यारा लग गया है। 2। 4। 160।

मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥

आसावरी महला 5 ॥
मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥
परम पदु पाईऐ हां ॥
उआ रस जो बिधे हां ॥
ता कउ सगल सिधे हां ॥
अनदिनु जागिआ हां ॥
नानक बडभागिआ मेरे मना ॥1॥ रहाउ ॥
संत पग धोईऐ हां ॥
दुरमति खोईऐ हां ॥
दासह रेनु होइ हां ॥
बिआपै दुखु न कोइ हां ॥
भगतां सरनि परु हां ॥
जनमि न कदे मरु हां ॥
असथिरु से भए हां ॥
हरि हरि जिन॑ जपि लए मेरे मना ॥1॥
साजनु मीतु तूं हां ॥
नामु द्रिड़ाइ मूं हां ॥
तिसु बिनु नाहि कोइ हां ॥
मनहि अराधि सोइ हां ॥
निमख न वीसरै हां ॥
तिसु बिनु किउ सरै हां ॥
गुर कउ कुरबानु जाउ हां ॥
नानकु जपे नाउ मेरे मना ॥2॥5॥161॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 ॥ हे भाई ! (साध-संगति में) मिल के परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए। (इस तरह) आत्मिक जीवन का सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हो जाता है। जो मनुष्य (सिफत सालाह के) उस स्वाद में रम जाता है। उसे (मानो) सारी ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। वह हर समय (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! (जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है।वह मनुष्य) बहुत बड़ा भाग्यशाली हो जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! संत जनों के चरण धोने चाहिए (स्वैभाव त्याग के संतों के चरण पड़ना चाहिए। इस तरह मन की) खोटी मति दूर हो जाती है। हे भाई ! प्रभू के सेवकों की चरण धूड़ बना रह (इस तरह) कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। हे भाई ! संत जनों की शरण पड़ा रह। जनम-मरण का चक्कर नहीं रहेगा। वे अडोल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। हे मेरे मन ! जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं। 1। (हे मेरे प्रभू !) आप ही (मेरे) सज्जन हैं।आप ही (मेरे) मित्र हैं। मुझे (मेरे दिल में अपना) नाम पक्का करके टिका दे। (हे भाई !) उस परमात्मा के बिना और कोई (असल सज्जन-मित्र) नहीं। सदा उस (प्रभू) को ही सिमरता रह। (वह परमात्मा) आँख झपकने जितने समय के लिए भी भूलना नहीं चाहिए (क्योंकि) उस (की याद) के बिना जीवन सुखी नहीं गुजरता। हे मेरे मन ! मैं (नानक) गुरू से सदके जाता हूँ (क्योंकि गुरू की कृपा से ही) नानक (परमात्मा का) नाम जपता है। 2। 5। 161।

कारन करन तूं हां ॥

आसावरी महला 5 ॥
कारन करन तूं हां ॥
अवरु ना सुझै मूं हां ॥
करहि सु होईऐ हां ॥
सहजि सुखि सोईऐ हां ॥
धीरज मनि भए हां ॥
प्रभ कै दरि पए मेरे मना ॥1॥ रहाउ ॥
साधू संगमे हां ॥
पूरन संजमे हां ॥
जब ते छुटे आप हां ॥
तब ते मिटे ताप हां ॥
किरपा धारीआ हां ॥
पति रखु बनवारीआ मेरे मना ॥1॥
इहु सुखु जानीऐ हां ॥
हरि करे सु मानीऐ हां ॥
मंदा नाहि कोइ हां ॥
संत की रेन होइ हां ॥
आपे जिसु रखै हां ॥
हरि अंम्रितु सो चखै मेरे मना ॥2॥
जिस का नाहि कोइ हां ॥
तिस का प्रभू सोइ हां ॥
अंतरगति बुझै हां ॥
सभु किछु तिसु सुझै हां ॥
पतित उधारि लेहु हां ॥
नानक अरदासि एहु मेरे मना ॥3॥6॥162॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 ॥ हे मेरे मन ! (प्रभू दर पर ऐसे अरदास कर- हे प्रभू !) आप सारे जगत के रचनहार हैं (आपके बिना) मुझे कोई और नहीं सूझता (जो ये ताकत रखता हो)। हे प्रभू ! जो कुछ आप करते हैं वही (जगत में) वरतता है। आत्मिक अडोलता में, आनंद में लीन रह सकते हैं। मन में हौसला बंध जाता है- हे मेरे मन ! (अगर अपनी चतुराईआं छोड़ के) परमात्मा के दर पर गिर पड़ें तो 1। हे मेरे मन ! गुरू की संगति में रहने से वह जुगति पूरी तरह से आ जाती है जिससे ज्ञानेन्द्रियां वश में आ जाती हैं। हे मन ! जिस वक्त (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है (और गुरू की ओट ठीक लगने लगती है) उस वक्त से (मन के) सारे दुख कलेश दूर हो जाते हैं। सो हे मेरे मन ! (गुरू की संगति में रहके प्रभू-दर पर अरदास कर।कह) हे जगत के मालिक प्रभू ! मेरे पर मेहर कर। मेरी (शरण पड़े की) इज्जत रख। 1। इसे ही सुख (का मूल) समझना चाहिए। हे मेरे मन ! जो कुछ परमात्मा करता है उसे (मीठा करके) मानना चाहिए। उसको (जगत में) कोई बुरा नहीं दिखता- हे मन ! जो मनुष्य संत जनों की चरण-धूड़ बनता है हे मेरे मन ! परमात्मा स्वयं ही जिस मनुष्य को (विकारों से) बचाता है वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल पीता है। 2। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य का कोई भी सहाई नहीं बनता (अगर वह प्रभू की शरण में आ पड़े तो) वह प्रभू उसका रखवाला बन जाता है। वह परमात्मा हरेक के दिल की बात जान लेता है। उसको हरेक जीव की हरेक मनोकामना की समझ आ जाती है। (इस वास्ते) हे मेरे मन ! परमात्मा के दर पर यूँ अरजोई कर- हे प्रभू ! (हमें विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचा ले। (आपके दर पर।मेरी) नानक की यही अरदास है। 3। 6। 162।

ओइ परदेसीआ हां ॥

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आसावरी महला 5 इकतुका ॥
ओइ परदेसीआ हां ॥
सुनत संदेसिआ हां ॥1॥ रहाउ ॥
जा सिउ रचि रहे हां ॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 इकतुका ॥ जगत में चार दिनों के लिए आए हे जीव ! ये संदेश ध्यान से सुन। 1।रहाउ। (हे भाई ! आपसे पहले यहाँ पर आए हुए जीव) जिस माया के मोह में फंसे रहे।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४१० खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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