सभ कउ तजि गए हां ॥ सुपना जिउ भए हां ॥ हरि नामु जिनि॑ लए ॥1॥ हरि तजि अन लगे हां ॥ जनमहि मरि भगे हां ॥ हरि हरि जनि लहे हां ॥ जीवत से रहे हां ॥ जिसहि क्रिपालु होइ हां ॥ नानक भगतु सोइ ॥2॥7॥163॥232॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आखिर उस सारी को छोड़ के यहाँ से चले गए। (अब वह) सपने की तरह हो गए हैं (कोई उन्हें याद भी नहीं करता)। (फिर) आप क्यों (माया का मोह छोड़ के) परमात्मा का नाम नहीं याद करता। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा को भुला के अन्य पदार्थों के मोह में फसे रहते हैं वह जनम-मरण के चक्कर में भटकते फिरते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा को पा लिया है वे आत्मिक जीवन के मालिक बन गए। (पर) हे नानक ! (जीव के अपने वश के बात नहीं) जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है वही उसका भक्त बनता है। 2। 7। 163। 232।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु आसा महला 9 ॥ बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥ लोभि ग्रसिओ दस हू दिस धावत आसा लागिओ धन की ॥1॥ रहाउ ॥ सुख कै हेति बहुतु दुखु पावत सेव करत जन जन की ॥ दुआरहि दुआरि सुआन जिउ डोलत नह सुध राम भजन की ॥1॥ मानस जनम अकारथ खोवत लाज न लोक हसन की ॥ नानक हरि जसु किउ नही गावत कुमति बिनासै तन की ॥2॥1॥233॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला 9 ॥ (हे भाई !) मैं इस (मानस) मन की बुरी हालत किसे बताऊँ।(हरेक मनुष्य का यही हाल है)। लोभ में फसा हुआ ये मन दसों दिशाओं में दौड़ता है।इसे धन जोड़ने की तृष्णा लगी रहती है। 1।रहाउ। (हे भाई !) सुख हासिल करने के लिए (ये मन) जगह जगह की खुशामद करता फिरता है (और इस तरह सुख की जगह बल्कि) दुख सहता है। कुत्ते की तरह हरेक के दर पर भटकता फिरता है।इसे परमात्मा का भजन करने की कभी नहीं सूझती। 1। (हे भाई ! लोभ में फसा हुआ जीव) अपना मानस जनम व्यर्थ ही गवा लेता है।(इसके लालच के कारण) लोगों द्वारा किए जा रहे हँसी-मजाक से भी इसे शर्म नहीं आती। हे नानक ! (कह,हे जीव !) आप परमात्मा की सिफत सालाह क्यूँ नही करता।(सिफतसालाह की बरकति से ही) आपकी ये खोटी मति दूर हैं सकेगी। 2। 1। 233।
रागु आसा महला 1 असटपदीआ घरु 2 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ उतरि अवघटि सरवरि न॑ावै ॥ बकै न बोलै हरि गुण गावै ॥ जलु आकासी सुंनि समावै ॥ रसु सतु झोलि महा रसु पावै ॥1॥ ऐसा गिआनु सुनहु अभ मोरे ॥ भरिपुरि धारि रहिआ सभ ठउरे ॥1॥ रहाउ ॥ सचु ब्रतु नेमु न कालु संतावै ॥ सतिगुर सबदि करोधु जलावै ॥ गगनि निवासि समाधि लगावै ॥ पारसु परसि परम पदु पावै ॥2॥ सचु मन कारणि ततु बिलोवै ॥ सुभर सरवरि मैलु न धोवै ॥ जै सिउ राता तैसो होवै ॥ आपे करता करे सु होवै ॥3॥ गुर हिव सीतलु अगनि बुझावै ॥ सेवा सुरति बिभूत चड़ावै ॥ दरसनु आपि सहज घरि आवै ॥ निरमल बाणी नादु वजावै ॥4॥ अंतरि गिआनु महा रसु सारा ॥ तीरथ मजनु गुर वीचारा ॥ अंतरि पूजा थानु मुरारा ॥ जोती जोति मिलावणहारा ॥5॥ रसि रसिआ मति एकै भाइ ॥ तखत निवासी पंच समाइ ॥ कार कमाई खसम रजाइ ॥ अविगत नाथु न लखिआ जाइ ॥6॥ जल महि उपजै जल ते दूरि ॥ जल महि जोति रहिआ भरपूरि ॥ किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥ निधि गुण गावा देखि हदूरि ॥7॥ अंतरि बाहरि अवरु न कोइ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 असटपदीआ घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भरथरी जोगी ! जोगी किसी टीले से पहाड़ से उतर के किसी तीर्थ-सरोवर में स्नान करता है।तो इसे पुंन्य-कर्म समझता है।पर) जो मनुष्य अहंकार आदि की मुश्किल घाटी से उतर के (सत्संग के) सरोवर में (आत्मिक) स्नान करता है। जो बहुत व्यर्थ नहीं बोलता और परमात्मा के गुण गाता है। वह मनुष्य ऐसे उस आत्मिक अवस्था में टिका रहता है जहाँ कोई मायावी फुरना नहीं उठता जैसे (समुंद्र का) जल (सूरज की मदद से ऊँचा उठ के भाप बन के) आकाशों में (बादल बन के उड़ानें भरता) है। वह मनुष्य शांति रस को हिला के (ले के) नाम-महा-रस पीता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने वाली ये बात सुन। (कि) परमात्मा हर जगह भरपूर है।और हर ज्रगह सहारा दे रहा है। 1।रहाउ। (हे जोगी !) जिस मनुष्य ने सदा स्थिर प्रभू (के नाम) को अपना नित्य प्रण बना लिया है।नित्य की कार बना ली है।उसे मौत का सहम नहीं सताता (आत्मिक मौत का खतरा नहीं रहता)। गुरू के शबद में जुड़ के वह (अपने अंदर से) क्रोध को जला लेता है। उच्च आत्मिक मण्डल में निवास करके वह प्रभू चरणों से जुड़ा रहता है (समाधि लगाए रखता है)। (हे जोगी ! गुरू) पारस (के चरणों) को छू के वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 2। (हे जोगी ! जो मनुष्य) अपने मन को वश करने के लिए सदा-स्थिर प्रभू को (याद रखता है) बार बार चेते करता है (जैसे दूध रिड़कते।बिलोते हैं) और अपने मूल।प्रभू की तलाश करता है। जो मनुष्य (नाम अमृत से) नाको नाक भरे हुए सरोवर में से (जिसमें कोई विकारों आदि की) मैल नहीं है अपने आप को धोता है। वह मनुष्य वैसा ही हैं जाता है जैसे प्रभू के साथ वह प्यार डालता है। (उसे फिर ये समझ आ जाती है कि) जगत में वही कुछ होता है जो करतार आप ही कर रहा है। 3। (हे जोगी ! आप बर्फानी पहाड़ों की गुफाओं में रहते हैं।शरीर पे विभूति मलते हैं।सिंञीं बजाते हैं।पर) बर्फ जैसें ठण्डे-ठार जिगरे वाले गुरू को मिल के जो मनुष्य (अपने अंदर की तृष्णा की) आग बुझाता है। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा में अपनी सुरति रखता है।जो।मानो।ये राख विभूति शरीर पे मलता है। जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह से भरपूरगुरू की पवित्र बाणी सदा अपने अंदर बसाता है।जो मानो।ये नाद बजाता है। उसने (असल) भेष धारण कर लिया है।वह सदा अडोल आत्मिक अवस्था में टिका रहता है। 4। (हे जोगी !) जिस मनुष्य ने अपने अंदर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली है।जो सदा श्रेष्ठ नाम महा रस पी रहा है। जिसने सतिगुरू की बाणी की विचार को (अठारह) तीर्थों का स्नान बना लिया है। जिसने अपने हृदय को परमात्मा के रहने के लिए मंदिर बनाया है।और अंतरात्मे उसकी पूजा करता है। वह अपनी ज्योति को परमात्मा की ज्सोति में मिला लेता है। 5। (हे जोगी !) जिस मनुष्य का मन नाम-रस में भीग जाता है; जिसकी मति एक प्रभू के प्रेम में पसीज जाती है। वह कामादिक पाँचों को समाप्त करके अंदरात्मे अडोल हो जाता है। पति-प्रभू की रजा में चलना उसकी नित्य की कार।नित्य की कमाई हो जाती है। वह मनुष्य उस ‘नाथ’ का रूप हो जाता है जो अदृश्य है और जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 6। (हे जोगी ! सूर्य व चंद्रमा सरोवर आदि के) पानी में चमकता है।पर उस पानी से वह बहुत ही दूर है। पानी में उसकी ज्योति चमक मारती है।इसी तरह परमात्मा की ज्योति सब जीवों में हर जगह व्यापक है (पर वह परमात्मा निर्लिप भी है।सबके नजदीक भी है और दूर भी है)। मैं ये नहीं बता सकता कि वह किसके नजदीक है किसके दूर है। उसको हर जगह मौजूद देख के मैं उस गुणों के खजाने प्रभू के गुण गाता हूँ। 7। हर जगह जीवों के अंदर और बाहर सारी सृष्टि में परमात्मा के बिना और कोई नहीं।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आखिर उस सारी को छोड़ के यहाँ से चले गए।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।