तजि मान मोह विकार मिथिआ जपि राम राम राम ॥ मन संतना कै चरनि लागु ॥1॥ प्रभ गोपाल दीन दइआल पतित पावन पारब्रहम हरि चरण सिमरि जागु ॥ करि भगति नानक पूरन भागु ॥2॥4॥155॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे मन ! अहंकार-मोह-विकार-झूठ त्याग दे।सदा परमात्मा का सिमरन किया कर। और संत-जनों की शरण पड़ा रह। 1। हे भाई ! उस हरी-प्रभू के चरणों का ध्यान धर के (माया के हमलों से) सचेत रह।जो धरती का रखवाला है जो दीनों पे दया करने वाला है और जो विकारों में गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाला है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा की भक्ति कर।आपके भाग्य जाग जाएंगे। 2। 4। 155।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सहेली ! (हे सत्संगी !) आनंद-रूप परमात्मा ने मुझे ये जगत-तमाशा दिखा दिया है (इस जगत-तमाशे की अस्लियत दिखा दी है)।(इसमें कहीं) खुशी है (कहीं) ग़म है (कहीं) वैराग है। 1।रहाउ। (हे सत्संगी ! इस जगत-तमाशे में कहीं) एक पल में अनेकों डर (आ घेरते हैं।कहीं) निडरता है (कहीं कोई दुनियावी पदार्थों की ओर) उठ के भागता है। कहीं एक पल में स्वादिष्ट पदार्थ भोगे जा रहे हैं कहीं कोई एक पल में इन भोगों को त्याग जाता है। 1। (हे सखी ! इस जगत-तमाशे में कहीं) जोग-साधना की जा रही है।कहीं धूणियां तपाई जा रही हैं।कहीं अनेकों देव-पूजा हो रहीं हैं।कहीं और की ओर भटकनें भटकी जा रही हैं। हे नानक ! (कह,हे सखी !) कहीं साध-संगति में रख के एक पल में परमात्मा की मेहर हो रही है।और परमात्मा का प्रेम रंग बख्शा जा रहा है। 2। 4। 156।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 5 घरु 17 आसावरी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे सखी !) सदा परमात्मा का सिमरन करती रह। (इस तरह अपने) मन में परमात्मा से प्यार बना। जो कुछ गुरू ने बताया वह अपने चित्त में बसा। परमात्मा के बिना औरों के साथ बनाई प्रीति तोड़ दे।औरों से अपने मन को फेर ले। हे सहेली ! (जिसने भी) परमात्मा को (पाया है) इस तरीके से ही पाया है। 1।रहाउ। हे सहेली ! संसार समुंद्र में मोह का कीचड़ है (इसमें फसा हुआ) पैर परमात्मा की ओर नहीं चल सकता। मूर्ख मनुष्य ने (अपना पैर मोह के कीचड़ में) फंसाया हुआ है। हे सखी ! केवल एक परमात्मा के सिमरन का ही आहर कर। और परमात्मा की शरण पड़।तभी (मोह के कीचड़ में फंसा हुआ पैर) निकल सकता है। 1। हे सहेली ! अपने चित्त को (माया के मोह से) अडोल बना ले (इतना स्थिर कि) जंगल और घर एक समान प्रतीत हों। अपने दिल में एक परमात्मा की याद टिकाए रख। औरजगत में बेशक कई तरह के काम-काज किए जा (इस तरह) राज भी कर और जोग भी कमा। (पर) हे नानक ! कह, हे सखी ! (काम-काज करते हुए ही निर्लिप रहना-ये) संसार से निराला रास्ता है। 2। 1। 157।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 ॥ (हे मेरे मन !) एक (परमात्मा के मिलाप) की तमन्ना (अपने अंदर) कायम कर। गुरू के चरणों में जुड़ के सदा (परमात्मा के) ध्यान में टिका रह। गुरू के उपदेश की जान-पहिचान में मजबूत-चित्त हो। गुरू चरणों में (रहके) सेवा-भक्ति कर। हे मेरे मन ! तब ही गुरू की कृपा से (परमात्मा को) मिल सकते हैं। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! जब और भटकनें खत्म हो जाती हैं। तब हरेक जगह में परमात्मा ही व्यापक दिखता है। तब डरावने जम का सहम उतर जाता है। संसार-वृक्ष के आदि-हरी के चरणों में ठिकाना मिल जाता है। तब हरेक किस्म की मुहताजी खत्म हो जाती है। 1। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागते हैं वह विकारों की आग के खतरे से पार लांघ जाता है। उसको अपने असल घर (प्रभू चरणों में) जगह मिल जाती है। वह रसों में श्रेष्ठ हरि-नाम रस को हमेशा भोगता है। उसकी (माया की) प्यास भूख दूर हो जाती है। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! वह सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 2। 2। 158।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 5 ॥ जो सारे गुणों का मालिक है- हे मेरे मन ! आत्मिक अडोलता की लहर में लीन हो के उस परमात्मा का नाम सदा जपना चाहिए (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुण उचार।हे मेरे मन ! सुन। यही है विकारों से बचने का तरीका। पर ये बडे़ भाग्यों से प्राप्त होता है। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! सारे ऋषि मुनि उस परमात्मा को खोजते आ रहे हैं। जो सारे जीवों का मालिक है जो इस माया-ग्रसित दुनिया में ढूँढना मुश्किल है। जो सारे दुखों का नाश करने वाला है। और जो सबकी आशाएं पूरी करने वाला है। 1। हे (मेरे) मन ! उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करनी चाहिए।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! अहंकार-मोह-विकार-झूठ त्याग दे।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।