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अंग 408

अंग
408
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
प्रभ संगि मिलीजै इहु मनु दीजै ॥
नानक नामु मिलै अपनी दइआ करहु ॥2॥1॥150॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (पर।हे भाई ! इस प्यार का मूल्य भी देना पड़ता है) प्रभू (के चरणों) में (तभी) मिल सकते हैं अगर (अपना) ये मन उसके हवाले कर दें। (ये बात परमात्मा की मेहर से ही हो सकती है।इस वास्ते) हे नानक ! (अरदास कर और कह, हे प्रभू !) अपनी मेहर कर (ता कि आपके दास) नानक को आपका नाम (आपके नाम का प्यार) प्राप्त हैं जाए। 2। 1। 150।
आसा महला 5 ॥
मिलु राम पिआरे तुम बिनु धीरजु को न करै ॥1॥ रहाउ ॥
सिंम्रिति सासत्र बहु करम कमाए प्रभ तुमरे दरस बिनु सुखु नाही ॥1॥
वरत नेम संजम करि थाके नानक साध सरनि प्रभ संगि वसै ॥2॥2॥151॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मेरे प्यारे राम ! (मुझे) मिल।आपके मिलाप के बिना और कोई भी (उद्यम) मेरे मन में शांति पैदा नहीं कर सकता। 1।रहाउ। हे प्यारे राम ! अनेकों लोगों ने शास्त्रों-स्मृतियों के लिखे अनुसार (निहित धार्मिक) कर्म किए।पर।हे प्रभू ! (इन कर्मों से आपके दर्शन नसीब ना हुए।और) आपके दर्शन के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 1। हे प्रभू ! (शास्त्रों के कहे अनुसार) अनेकों लोग वर्त रखते रहे।कई नेम निभाते रहे।इन्द्रियों को वश करने के यत्न करते रहे।पर ये सब कुछ करके वे थक गए (आपके दर्शन प्राप्त ना हुए)। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से (मनुष्य का मन) परमात्मा (के चरणों) में लीन हो जाता है (और मन को शांति प्राप्त हो जाती है)। 2।2। 151।
आसा महला 5 घरु 15 पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिकार माइआ मादि सोइओ सूझ बूझ न आवै ॥
पकरि केस जमि उठारिओ तद ही घरि जावै ॥1॥
लोभ बिखिआ बिखै लागे हिरि वित चित दुखाही ॥
खिन भंगुना कै मानि माते असुर जाणहि नाही ॥1॥ रहाउ ॥
बेद सासत्र जन पुकारहि सुनै नाही डोरा ॥
निपटि बाजी हारि मूका पछुताइओ मनि भोरा ॥2॥
डानु सगल गैर वजहि भरिआ दीवान लेखै न परिआ ॥
जेंह कारजि रहै ओल॑ा सोइ कामु न करिआ ॥3॥
ऐसो जगु मोहि गुरि दिखाइओ तउ एक कीरति गाइआ ॥
मानु तानु तजि सिआनप सरणि नानकु आइआ ॥4॥1॥152॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 घरु 15 पड़ताल ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) विकारों में माया के नशे में मनुष्य सोया रहता है।इसे (सही जीवन-राह की) समझ नहीं आती। (जब अंत समय में) यम ने इसे केसों से पकड़ के उठाया (जब मौत सिर पर आ पहुँची) तब ही इसे होश आती है (कि सारी उम्र गलत रास्ते पर ही पड़ा रहा)। 1। (हे भाई !) माया के लोभ और विषियों में खचित (पराया) धन चुरा के (दूसरों के) दिल दुखाते हैं। पल में साथ छोड़ जाने वाली माया के गुमान में मस्त निर्दयी मनुष्य समझते नहीं (कि ये गलत जीवन-रास्ता है)। 1।रहाउ। (हे भाई !) वेद-शास्त्र (आदि धर्म-पुस्तकें उपदेश करती हैं) संत-जन भी पुकार-पुकार के कहते हैं पर (माया के नशे के कारण) बहरा हो चुका मनुष्य (उनके उपदेश को) सुनता नहीं। जब बिल्कुल ही जीवन बाजी हार के आखिर समय पर आ पहुँचता है तब ये मूर्ख अपने मन में पछताता है। 2। (हे भाई ! माया के नशे में मस्त मनुष्य विकारों में लगा हुआ) व्यर्थ ही दण्ड भोगता है (आत्मिक सजा भुगतता रहता है।ऐसे काम ही करता है जिनके कारण) परमात्मा की हजूरी में परवान नहीं होता। जिस काम के करने से परमात्मा के दर पर इज्जत बने वह काम ये कभी भी नहीं करता। 3। (हे भाई ! जब) गुरू ने मुझे ऐसा (माया से ग्रसित) जगत दिखा दिया तब मैंने एक परमात्मा की सिफत सालाह करनी आरम्भ कर दी। तब गुमान त्याग के (और) आसरे छोड़ के।चतुराईयां छोड़ के (मैं दास) नानक परमात्मा की शरण आ पड़ा। 4। 1। 152।
आसा महला 5 ॥
बापारि गोविंद नाए ॥
साध संत मनाए प्रिअ पाए गुन गाए पंच नाद तूर बजाए ॥1॥ रहाउ ॥
किरपा पाए सहजाए दरसाए अब रातिआ गोविंद सिउ ॥
संत सेवि प्रीति नाथ रंगु लालन लाए ॥1॥
गुर गिआनु मनि द्रिड़ाए रहसाए नही आए सहजाए मनि निधानु पाए ॥
सभ तजी मनै की काम करा ॥
चिरु चिरु चिरु चिरु भइआ मनि बहुतु पिआस लागी ॥
हरि दरसनो दिखावहु मोहि तुम बतावहु ॥
नानक दीन सरणि आए गलि लाए ॥2॥2॥153॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के व्यापार में लग जाता है।परमात्मा के गुण गाता है। संत-जनों की प्रसन्नता हासिल कर लेता है।उसे प्यारे प्रभू का मिलाप प्राप्त हो जाता है।उसके अंदर जैसे।पाँचों किस्मों के साज बजने लग जाते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की किरपा से जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता हासिल हो जाती है।परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं वह सदा के लिए परमात्मा के प्यार रंग में रंगा जाता है। गुरू की बताई सेवा की बरकति से उसको पति-प्रभू की प्रीति प्राप्त हो जाती है; लाल प्यारे का प्यार रंग चढ़ जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य अपने मन में गुरू के दिए ज्ञान को पक्का कर लेता है।उसके अंदर खिलाव पैदा हो जाता है वह जनम-मरन के चक्कर में भी नहीं पड़ता।उसके अंदर आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है।वह अपने मन में नाम-खजाना पा लेता है। वह अपने मन की सारी वासनाएं त्याग देता है। (आपका दर्शन करके मुझे) बहुत चिर हैं चुका है।मेरे मन में आपके दर्शनों की तड़प पैदा हैं रही है। हे हरी ! मुझे अपने दर्शन दे।आप स्वयं ही मुझे बता (कि मैं कैसे आपके दर्शन करूँ)। हे नानक ! (आप भी अर्ज कर।और कह, हे प्रभू !) मैं दीन आपकी शरण आया हूँ।मुझे अपने गले से लगा ले।2। 2। 153।
आसा महला 5 ॥
कोऊ बिखम गार तोरै ॥
आस पिआस धोह मोह भरम ही ते होरै ॥1॥ रहाउ ॥
काम क्रोध लोभ मान इह बिआधि छोरै ॥1॥
संतसंगि नाम रंगि गुन गोविंद गावउ ॥
अनदिनो प्रभ धिआवउ ॥
भ्रम भीति जीति मिटावउ ॥
निधि नामु नानक मोरै ॥2॥3॥154॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जगत में) कोई विरला मनुष्य ही है।जो सख्त किले को तोड़ता है (जिसमें जिंद कैद की हुई है।कोई विरला है। जो अपने मन को) दुनिया की आशाओं।माया की तृष्णा।ठॅगी-फरेब।मोह और भटकना से रोकता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! जगत में कोई दुर्लभ मनुष्य है जो) काम-क्रोध-लोभ-अहंकार आदि बिमारियों को (अपने अंदर से) दूर करता है। 1। हे नानक ! (कह,हे भाई ! इन रोगों से बचने के लिए) मैं तो संत-जनों की संगति में रह के परमात्मा के नाम-रंग में लीन हो के परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ। मैं तो हर वक्त परमात्मा का ध्यान धरता हूँ। और इस तरह भटकना की दीवार को जीत के (परमात्मा से बनी हुई दूरी) मिटाता हूँ। (हे भाई !) मेरे पास परमात्मा का नाम-खजाना ही है (जो मुझे विकारों से बचाए रखता है)। 2। 3। 154।
आसा महला 5 ॥
कामु क्रोधु लोभु तिआगु ॥
मनि सिमरि गोबिंद नाम ॥
हरि भजन सफल काम ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (नाम की बरकति से अपने अंदर से) काम-क्रोध और लोभ दूर कर ले। (हे भाई ! अपने) मन में परमात्मा का नाम सिमरता रह परमात्मा के सिमरन से सारे काम सफल हो जाते हैं। 1।रहाउ।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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