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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 407 · आसा

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अंग
407
आसा
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  1. किछु किछु न चाही ॥2॥
  2. गुरहि दिखाइओ लोइना ॥1॥ रहाउ ॥
  3. हरि हरि नामु अमोला ॥
  4. आपुनी भगति निबाहि ॥
  5. ठाकुर चरण सुहावे ॥
  6. एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥
  7. हरि बिसरत सो मूआ ॥1॥ रहाउ ॥
  8. ओहु नेहु नवेला ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

किछु किछु न चाही ॥2॥

अंग 406 से चला आ रहा अंश

किछु किछु न चाही ॥2॥
चरनन सरनन संतन बंदन ॥
सुखो सुखु पाही ॥
नानक तपति हरी ॥
मिले प्रेम पिरी ॥3॥3॥143॥

हिन्दी अर्थ: मुझे किसी भी चीज की जरूरत नहीं। 2। हे भाई! संत-जनों के चरणों की शरणसंत-जनों के चरणों पे नमस्कार, मैं इसी में सुख ही सुख अनुभव करता हूँ। हे नानक! वह मन में से तृष्णा की जलन दूर कर देता है, अगर प्यारे प्रभू का प्रेम मिल जाए 3। 3। 143।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

गुरहि दिखाइओ लोइना ॥1॥ रहाउ ॥

आसा महला 5 ॥
गुरहि दिखाइओ लोइना ॥1॥ रहाउ ॥
ईतहि ऊतहि घटि घटि घटि घटि तूंही तूंही मोहिना ॥1॥
कारन करना धारन धरना एकै एकै सोहिना ॥2॥
संतन परसन बलिहारी दरसन नानक सुखि सुखि सोइना ॥3॥4॥144॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे मोहन प्रभू!) गुरू ने मुझे इन आँखो से आपके दर्शन करा दिए हैं। 1। रहाउ। (अब) हे मोहन! इस लोक में। परलोक में। हरेक शरीर में। हरेक हृदय में (मुझे) आप ही दिख रहे हैं। 1। (अब) हे सोहाने प्रभू! (मुझे यकीन हो गया है कि) एक आप ही सारे जगत का मूल रचने वाले हैं। एक आप ही सारी सृष्टि को सहारा देने वाले हैं। 2। हे नानक! (कहें,हे मोहन प्रभू!) मैं आपके संतों के चरण छूता हूँ उनके दर्शनों से सदके जाता हूँ। (संतों की कृपा से ही आपका मिलाप होता है। और) सदा के लिए आत्मिक आनंद में लीनता प्राप्त होती है। 3। 4। 144।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

हरि हरि नामु अमोला ॥

आसा महला 5 ॥
हरि हरि नामु अमोला ॥
ओहु सहजि सुहेला ॥1॥ रहाउ ॥
संगि सहाई छोडि न जाई ओहु अगह अतोला ॥1॥
प्रीतमु भाई बापु मोरो माई भगतन का ओल॑ा ॥2॥
अलखु लखाइआ गुर ते पाइआ नानक इहु हरि का चोल॑ा ॥3॥5॥145॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा का अमोलक नाम प्राप्त हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है वह मनुष्य आसान जीवन व्यतीत करता है। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा ही सदा साथ रहने वाला साथी है। वह कभी छोड़ के नहीं जाता। पर वह (किसी चतुराई-समझदारी से) वश में नहीं आता उसके बराबर और कोई नहीं। 1। हे भाई! वह परमात्मा ही मेरा प्रीतम है मेरा भाई है मेरा पिता है और मेरी माँ है। वह परमात्मा ही अपने भक्तों (की जिंदगी) का सहारा है। 2। हे नानक! (कहें, हे भाई!) उस परमात्मा का सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। गुरू ने मुझे उसकी समझ बख्श दी है। गुरू से मैंने उसका मिलाप हासिल किया है। ये उस परमात्मा का एक अजब तमाशा है (कि वह गुरू के द्वारा मिल जाता है)। 3। 5। 145।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

आपुनी भगति निबाहि ॥

आसा महला 5 ॥
आपुनी भगति निबाहि ॥
ठाकुर आइओ आहि ॥1॥ रहाउ ॥
नामु पदारथु होइ सकारथु हिरदै चरन बसाहि ॥1॥
एह मुकता एह जुगता राखहु संत संगाहि ॥2॥
नामु धिआवउ सहजि समावउ नानक हरि गुन गाहि ॥3॥6॥146॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ मुझे अपनी भक्ति सदा दिए रखें। हे मेरे मालिक! मैं तमन्ना करके (आपकी शरण) आया हूँ। 1। रहाउ। हे मेरे मालिक! अपने चरण मेरे दिल में बसाए रखें। मुझे अपना कीमती नाम दिये रखें। ता कि मेरा जीवन सफल हो जाए। 1। हे मेरे मालिक! मुझे अपने संतों की संगति में रखे रखें। यही मेरे वास्ते मुक्ति है। और यही मेरे वास्ते जीवन-युक्ति है। 2। हे नानक! (कहें) हे हरी! (मेहर करें) आपके गुणों में डुबकी लगा के मैं आपका नाम सिमरता रहूँ और आत्मिक अडोलता में टिका रहूँ। 3। 6। 146।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

ठाकुर चरण सुहावे ॥

आसा महला 5 ॥
ठाकुर चरण सुहावे ॥
हरि संतन पावे ॥1॥ रहाउ ॥
आपु गवाइआ सेव कमाइआ गुन रसि रसि गावे ॥1॥
एकहि आसा दरस पिआसा आन न भावे ॥2॥
दइआ तुहारी किआ जंत विचारी नानक बलि बलि जावे ॥3॥7॥147॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई!) मालिक प्रभू के चरण सोहणे हैं। पर प्रभू के संतों को (इनका मिलाप) प्राप्त होता है। 1। रहाउ। (हे भाई! परमात्मा के संत) स्वैभाव दूर करके परमातमा की सेवा-भक्ति करते हैं और उसके गुण बड़े आनंद से गाते रहते हैं। 1। (हे भाई! परमात्मा के संतों को) एक परमात्मा की (सहायता की) ही आशा टिकी रहती है। उन्हें परमात्मा के दर्शनों की चाहत लगी रहती है (इसके बिना) कोई और (दुनियावी आशाएं) अच्छी नहीं लगती। 2। हे नानक! (कहें, हे प्रभू! आपके संतों के हृदय में आपके चरणों का प्रेम होना-ये) आपकी ही मेहर है (नहीं तो) बिचारे जीवों का क्या जोर है। हे प्रभू! मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ। 3। 7। 147।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥

आसा महला 5 ॥
एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥
नामु धिआवहु रिदै बसावहु तिसु बिनु को नाही ॥1॥
प्रभ सरनी आईऐ सरब फल पाईऐ सगले दुख जाही ॥2॥
जीअन को दाता पुरखु बिधाता नानक घटि घटि आही ॥3॥8॥148॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई! अपने) मन में एक परमात्मा को सिमरते रहें। 1। रहाउ। (हे भाई!) परमात्मा का नाम सिमरा करें। हरि-नाम अपने दिल में बसाए रखें। परमात्मा के बिना और कोई (सहायता करने वाला) नहीं। 1। (हे भाई!) आएँ। परमात्मा की शरण पड़े रहें (और परमात्मा से) सारे फल हासिल करें। (परमात्मा की शरण पड़ने से) सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2। हे नानक! (कहें) सृजनहार अकाल-पुरख सब जीवों को दातें देने वाला है। वह हरेक शरीर में मौजूद है। 3। 8। 148।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

हरि बिसरत सो मूआ ॥1॥ रहाउ ॥

आसा महला 5 ॥
हरि बिसरत सो मूआ ॥1॥ रहाउ ॥
नामु धिआवै सरब फल पावै सो जनु सुखीआ हूआ ॥1॥
राजु कहावै हउ करम कमावै बाधिओ नलिनी भ्रमि सूआ ॥2॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु भेटिआ सो जनु निहचलु थीआ ॥3॥9॥149॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा की याद भूल गई वह आत्मिक मौत मर गया। 1। रहाउ। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। वह सारे (मन-इच्छित) फल हासिल कर लेता है और आसान जीवन गुजारता है। 1। (पर, हे भाई! परमात्मा का नाम बिसार के जो मनुष्य अपने आप को) राजा (भी) कहलवाता है वह अहंकार पैदा करने वाले काम (ही) करता है वह (राज के गुरूर में ऐसे) बंधा रहता है जैसे (डूबने से बचे रहने के) वहम में तोता नलकी से चिपका रहता है। 2। हे नानक! कहें, जिस मनुष्य को सतिगुरू मिल जाता है वह मनुष्य अॅटल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 3। 9। 149।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

ओहु नेहु नवेला ॥

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आसा महला 5 घरु 14
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओहु नेहु नवेला ॥
अपुने प्रीतम सिउ लागि रहै ॥1॥ रहाउ ॥
जो प्रभ भावै जनमि न आवै ॥
हरि प्रेम भगति हरि प्रीति रचै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 घरु 14 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वह प्यार सदा नया बना रहता है (दुनिया वाले प्यार जल्दी ही फीके पड़ जाते हैं)। हे भाई! जो प्यार प्यारे प्रीतम प्रभू से बना रहता है। 1। रहाउ। हे भाई! जो मनुष्य प्रभू को प्यारा लगने लग जाता है (वह उस प्यार की बरकति से बार-बार) जनम में नहीं आता। जिस मनुष्य को हरी का प्रेम प्राप्त हो जाता है हरी की भक्ति प्राप्त हो जाती है वह (सदा) हरी की प्रीति में मस्त रहता है। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 407 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।