अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: मुझे किसी भी चीज की जरूरत नहीं। 2। हे भाई ! संत-जनों के चरणों की शरणसंत-जनों के चरणों पे नमस्कार- मैं इसी में सुख ही सुख अनुभव करता हूँ। हे नानक !वह मन में से तृष्णा की जलन दूर कर देता है- अगर प्यारे प्रभू का प्रेम मिल जाए 3। 3। 143।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे मोहन प्रभू !) गुरू ने मुझे इन आँखो से आपके दर्शन करा दिए हैं। 1।रहाउ। (अब) हे मोहन ! इस लोक में।परलोक में।हरेक शरीर में।हरेक हृदय में (मुझे) आप ही दिख रहा है। 1। (अब) हे सोहाने प्रभू ! (मुझे यकीन हो गया है कि) एक आप ही सारे जगत का मूल रचने वाला है।एक आप ही सारी सृष्टि को सहारा देने वाला है। 2। हे नानक ! (कह,हे मोहन प्रभू !) मैं आपके संतों के चरण छूता हूँ उनके दर्शनों से सदके जाता हूँ।(संतों की कृपा से ही आपका मिलाप होता है।और) सदा के लिए आत्मिक आनंद में लीनता प्राप्त होती है। 3। 4। 144।
आसा महला 5 ॥ हरि हरि नामु अमोला ॥ ओहु सहजि सुहेला ॥1॥ रहाउ ॥ संगि सहाई छोडि न जाई ओहु अगह अतोला ॥1॥ प्रीतमु भाई बापु मोरो माई भगतन का ओल॑ा ॥2॥ अलखु लखाइआ गुर ते पाइआ नानक इहु हरि का चोल॑ा ॥3॥5॥145॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का अमोलक नाम प्राप्त हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है वह मनुष्य आसान जीवन व्यतीत करता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ही सदा साथ रहने वाला साथी है।वह कभी छोड़ के नहीं जाता।पर वह (किसी चतुराई-समझदारी से) वश में नहीं आता उसके बराबर और कोई नहीं। 1। हे भाई ! वह परमात्मा ही मेरा प्रीतम है मेरा भाई है मेरा पिता है और मेरी माँ है।वह परमात्मा ही अपने भक्तों (की जिंदगी) का सहारा है। 2। हे नानक ! (कह, हे भाई !) उस परमात्मा का सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।गुरू ने मुझे उसकी समझ बख्श दी है।गुरू से मैंने उसका मिलाप हासिल किया है।ये उस परमात्मा का एक अजब तमाशा है (कि वह गुरू के द्वारा मिल जाता है)। 3। 4। 145।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ मुझे अपनी भक्ति सदा दिए रख। हे मेरे मालिक ! मैं तमन्ना करके (आपकी शरण) आया हूँ। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! अपने चरण मेरे दिल में बसाए रख।मुझे अपना कीमती नाम दिये रख।ता कि मेरा जीवन सफल हो जाए। 1। हे मेरे मालिक ! मुझे अपने संतों की संगति में रखे रख।यही मेरे वास्ते मुक्ति है।और यही मेरे वास्ते जीवन-युक्ति है। 2। हे नानक ! (कह) हे हरी ! (मेहर कर) आपके गुणों में डुबकी लगा के मैं आपका नाम सिमरता रहूँ और आत्मिक अडोलता में टिका रहूँ। 3। 6। 146।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) मालिक प्रभू के चरण सोहणे हैं। पर प्रभू के संतों को (इनका मिलाप) प्राप्त होता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा के संत) स्वैभाव दूर करके परमातमा की सेवा-भक्ति करते हैं और उसके गुण बड़े आनंद से गाते रहते हैं। 1। (हे भाई ! परमात्मा के संतों को) एक परमात्मा की (सहायता की) ही आशा टिकी रहती है।उन्हें परमात्मा के दर्शनों की चाहत लगी रहती है (इसके बिना) कोई और (दुनियावी आशाएं) अच्छी नहीं लगती। 2। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! आपके संतों के हृदय में आपके चरणों का प्रेम होना-ये) आपकी ही मेहर है (नहीं तो) बिचारे जीवों का क्या जोर है।हे प्रभू ! मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ। 3। 7। 147।
आसा महला 5 ॥ एकु सिमरि मन माही ॥1॥ रहाउ ॥ नामु धिआवहु रिदै बसावहु तिसु बिनु को नाही ॥1॥ प्रभ सरनी आईऐ सरब फल पाईऐ सगले दुख जाही ॥2॥ जीअन को दाता पुरखु बिधाता नानक घटि घटि आही ॥3॥8॥148॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! अपने) मन में एक परमात्मा को सिमरता रह। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरा करो।हरि-नाम अपने दिल में बसाए रखो।परमात्मा के बिना और कोई (सहायता करने वाला) नहीं। 1। (हे भाई !) आएँ।परमात्मा की शरण पड़े रहें (और परमात्मा से) सारे फल हासिल करें।(परमात्मा की शरण पड़ने से) सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2। हे नानक ! (कह) सृजनहार अकाल-पुरख सब जीवों को दातें देने वाला है।वह हरेक शरीर में मौजूद है। 3। 8। 148।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा की याद भूल गई वह आत्मिक मौत मर गया। 1।रहाउ। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहता है।वह सारे (मन-इच्छित) फल हासिल कर लेता है और आसान जीवन गुजारता है। 1। (पर।हे भाई ! परमात्मा का नाम बिसार के जो मनुष्य अपने आप को) राजा (भी) कहलवाता है वह अहंकार पैदा करने वाले काम (ही) करता है वह (राज के गुरूर में ऐसे) बंधा रहता है जैसे (डूबने से बचे रहने के) वहम में तोता नलकी से चिपका रहता है। 2। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को सतिगुरू मिल जाता है वह मनुष्य अॅटल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 3। 9। 149।
आसा महला 5 घरु 14 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ओहु नेहु नवेला ॥ अपुने प्रीतम सिउ लागि रहै ॥1॥ रहाउ ॥ जो प्रभ भावै जनमि न आवै ॥ हरि प्रेम भगति हरि प्रीति रचै ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 घरु 14 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वह प्यार सदा नया बना रहता है (दुनिया वाले प्यार जल्दी ही फीके पड़ जाते हैं)। हे भाई ! जो प्यार प्यारे प्रीतम प्रभू से बना रहता है1।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू को प्यारा लगने लग जाता है (वह उस प्यार की बरकति से बार-बार) जनम में नहीं आता। जिस मनुष्य को हरी का प्रेम प्राप्त हो जाता है हरी की भक्ति प्राप्त हो जाती है वह (सदा) हरी की प्रीति में मस्त रहता है। 1।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।