अंग
406
आसा
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दइआ करहु किरम अपुने कउ इहै मनोरथु सुआउ ॥2॥
दइआ करहु किरम अपुने कउ इहै मनोरथु सुआउ ॥2॥
तनु धनु तेरा तूं प्रभु मेरा हमरै वसि किछु नाहि ॥
जिउ जिउ राखहि तिउ तिउ रहणा तेरा दीआ खाहि ॥3॥
जनम जनम के किलविख काटै मजनु हरि जन धूरि ॥
भाइ भगति भरम भउ नासै हरि नानक सदा हजूरि ॥4॥4॥139॥
तनु धनु तेरा तूं प्रभु मेरा हमरै वसि किछु नाहि ॥
जिउ जिउ राखहि तिउ तिउ रहणा तेरा दीआ खाहि ॥3॥
जनम जनम के किलविख काटै मजनु हरि जन धूरि ॥
भाइ भगति भरम भउ नासै हरि नानक सदा हजूरि ॥4॥4॥139॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे प्यारे ! आप मेरे मालिक हैं। अपने इस नाचीज सेवक पर मेहर कर कि - मेरा ये मनोरथ पूरा कर, मेरी ये अभिलाषा पूरी कर। 2। (हे प्रभू !) मेरा ये शरीर।मेरा ये धन सब कुछ आपका ही दिया हुआ है।आप ही मेरे मालिक हैं।(हम जीव अपने उद्यम से आपके नाम जपने के योग्य भी नहीं हैं) हमारे बस में कुछ भी नहीं। आप हम जीवों को जिस-जिस हाल में रखते हैं उसी तरह ही हम जीवन बिताते हैं।हम आपका ही दिया हुआ हरेक पदार्थ खाते हैं। 3। हे नानक ! (कह) परमात्मा के सेवकों (के चरणों) की धूड़ में (किया हुआ) स्नान (मनुष्य के) जन्मों-जन्मांतरों के (किए हुए) पाप दूर कर देता है। प्रभू-प्रेम से भक्ति की बरकति से (मनुष्य का) हरेक किस्म का डर वहम नाश हो जाता है।और परमात्मा सदा अंग-संग प्रतीत होने लग पड़ता है। 4। 4। 139।
अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥
आसा महला 5 ॥
अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥
आपि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी सतिगुरि बखसिआ हरि नामु ॥1॥
कलिजुगु उधारिआ गुरदेव ॥
मल मूत मूड़ जि मुघद होते सभि लगे तेरी सेव ॥1॥ रहाउ ॥
तू आपि करता सभ स्रिसटि धरता सभ महि रहिआ समाइ ॥
धरम राजा बिसमादु होआ सभ पई पैरी आइ ॥2॥
सतजुगु त्रेता दुआपरु भणीऐ कलिजुगु ऊतमो जुगा माहि ॥
अहि करु करे सु अहि करु पाए कोई न पकड़ीऐ किसै थाइ ॥3॥
हरि जीउ सोई करहि जि भगत तेरे जाचहि एहु तेरा बिरदु ॥
कर जोड़ि नानक दानु मागै अपणिआ संता देहि हरि दरसु ॥4॥5॥140॥
अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥
आपि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी सतिगुरि बखसिआ हरि नामु ॥1॥
कलिजुगु उधारिआ गुरदेव ॥
मल मूत मूड़ जि मुघद होते सभि लगे तेरी सेव ॥1॥ रहाउ ॥
तू आपि करता सभ स्रिसटि धरता सभ महि रहिआ समाइ ॥
धरम राजा बिसमादु होआ सभ पई पैरी आइ ॥2॥
सतजुगु त्रेता दुआपरु भणीऐ कलिजुगु ऊतमो जुगा माहि ॥
अहि करु करे सु अहि करु पाए कोई न पकड़ीऐ किसै थाइ ॥3॥
हरि जीउ सोई करहि जि भगत तेरे जाचहि एहु तेरा बिरदु ॥
कर जोड़ि नानक दानु मागै अपणिआ संता देहि हरि दरसु ॥4॥5॥140॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे अपहुँच प्रभू ! आप मनुष्यों की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे हैं।आपके दर्शन वही मनुष्य करता है।जिसके मस्तक के भाग्य जाग पड़ते हैं। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर) कृपा के घर परमात्मा ने कृपा की निगाह की सतिगुरू ने उसे परमात्मा के नाम (-सिमरन की दाति) बख्श दी। 1। हे सतिगुरु ! आपने (तो) कलयुग को भी बचा लिया है (जिसे और युगों से बुरा समझा जाता है। भाव जो भी पहले) गंदे व मूर्ख (थे वह) सारे आपकी सेवा में आ के लगे हैं (आपकी बताई प्रभू की सेवा-भगती करने लग पड़े हैं)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप स्वयं सारी सृष्टि को पैदा करने वाले हैं आप स्वयं (ही) सारी सृष्टि को आसरा देने वाले हैं।आप स्वयं ही सारी सृष्टि में व्यापक हैं (फिर कोई युग अच्छा कैसे।और कोई जुग बुरा कैसे।चाहे इस कलियुग को चारों युगों से बुरा कहा जाता है। फिर भी) धर्मराज हैरान हो रहा है (कि गुरू की कृपा से विकारों से हट के) सारी लुकाई आपके चरणों में जुड़ रही है।(सो।अगर पुराने विचारों की तरफ भी जाएं तो भी ये कलियुग बुरा युग नहीं।और ये जुग जीवों को बुरे-कर्मों की ओर नहीं प्रेरता)। 2। हे भाई ! सतियुग को।त्रेते को।द्वापर को (अच्छा) युग कहा जाता है (पर।प्रत्यक्ष दिख रहा है कि बल्कि) कलियुग सारे युगों में श्रेष्ठ है (क्योंकि इस जुग में) जो हाथ कोई कर्म करता है।वही हाथ उसका फल भुगतता है।कोई मनुष्य किसी और मनुष्य की जगह (विकारों के कारण) पकड़ा नहीं जाता। 3। हे भाई ! (कोई भी युग हो।आप अपने भक्तों की लाज सदा रखते आए हैं) आप वही कुछ करते हैं जो आपके भक्त आपसे मांगते हैं।ये आपका बिरद है (मूल स्वभाव है)। हे हरी ! (आपका दास नानक भी अपने) दोनों हाथ जोड़ के (आपके दर से) दान मांगता है कि नानक को अपने संत-जनों का दर्शन दे। 4। 5। 140।
सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥
रागु आसा महला 5 घरु 13
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥
निरगुण निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥
महा बिखादी दुसट अपवादी ते पुनीत संगारे ॥1॥
जनम भवंते नरकि पड़ंते तिन॑ के कुल उधारे ॥2॥
कोइ न जानै कोइ न मानै से परगटु हरि दुआरे ॥3॥
कवन उपमा देउ कवन वडाई नानक खिनु खिनु वारे ॥4॥1॥141॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥
निरगुण निसतारे ॥1॥ रहाउ ॥
महा बिखादी दुसट अपवादी ते पुनीत संगारे ॥1॥
जनम भवंते नरकि पड़ंते तिन॑ के कुल उधारे ॥2॥
कोइ न जानै कोइ न मानै से परगटु हरि दुआरे ॥3॥
कवन उपमा देउ कवन वडाई नानक खिनु खिनु वारे ॥4॥1॥141॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 5 घरु 13 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे सतिगुरू ! आपके बचनों ने (आपकी शरण पड़े अनेकों) गुण-हीन लोगों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया। 1।रहाउ। हे सतिगुरू ! आपकी संगति में रह के वे लोग भी पवित्र आचरण वाले बन गए।जो पहले बड़े कटु स्वभाव वाले थे।बुरे आचरण वाले थे और गलत बोल बोलने वाले थे। 1। हे सतिगुरु ! आपने उन लोगों के कुलों के कुल (विकारों में गिरने से) बचा लिए।जो अनेकों जूनियों में भटकते आ रहे थे और (जनम-मरण के चक्कर के) नर्क में पड़े हुए थे। 2। हे सतिगुरू ! आपकी मेहर से वे मनुष्य भी प्रभू के दर पर आदर-मान पाने के लायक हो गए। जिन्हें पहले कोई जानता-पहचानता ही नहीं था जिन्हें (जगत में) कोई आदर नहीं था देता। 4। हे नानक ! (कह, हे सतिगुरू !) मैं आपके जैसा और किसे कहूँ।मैं आपकी क्या सिफत करूँ।मैं आपसे हरेक पल कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 141।
बावर सोइ रहे ॥1॥ रहाउ ॥
आसा महला 5 ॥
बावर सोइ रहे ॥1॥ रहाउ ॥
मोह कुटंब बिखै रस माते मिथिआ गहन गहे ॥1॥
मिथन मनोरथ सुपन आनंद उलास मनि मुखि सति कहे ॥2॥
अंम्रितु नामु पदारथु संगे तिलु मरमु न लहे ॥3॥
करि किरपा राखे सतसंगे नानक सरणि आहे ॥4॥2॥142॥
बावर सोइ रहे ॥1॥ रहाउ ॥
मोह कुटंब बिखै रस माते मिथिआ गहन गहे ॥1॥
मिथन मनोरथ सुपन आनंद उलास मनि मुखि सति कहे ॥2॥
अंम्रितु नामु पदारथु संगे तिलु मरमु न लहे ॥3॥
करि किरपा राखे सतसंगे नानक सरणि आहे ॥4॥2॥142॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (माया के मोह में) बावरे हुए मनुष्य (गलफ़त की नींद में) सोए रहते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! ऐसे लोग) परिवार के मोह और विषियों के स्वादों में मस्त हो के झूठे मैदान मारते रहते हैं। 1। (हे भाई ! माया के मोह में पागल हुए मन) उन पदार्थों की लालसा करते रहते हैं जिनसे साथ नहीं निभना जो सुपने में प्रतीत हो रहे मौज-मेलों की भांति हैं।(ऐसे लोग) इन पदार्थों को अपने मन में सदा कायम रहने वाला समझते हैं।मुंह से भी उन्हें ही पक्के साथी कहते हैं। 2। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम ही सदा साथ देने वाला पदार्थ है।पर माया के मोह में झल्ले हुए मनुष्य इस हरि-नाम का भेद तिल भर भी नहीं समझते। 3। (जीवों के भी क्या वश।) हे नानक ! प्रभू मेहर करके जिन मनुष्यों को साध-संगति में रखता है वही उस प्रभू की शरण में आए रहते हैं। 4। 2। 142।
ओहा प्रेम पिरी ॥1॥ रहाउ ॥
आसा महला 5 तिपदे ॥
ओहा प्रेम पिरी ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक माणिक गज मोतीअन लालन नह नाह नही ॥1॥
राज न भाग न हुकम न सादन ॥
ओहा प्रेम पिरी ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक माणिक गज मोतीअन लालन नह नाह नही ॥1॥
राज न भाग न हुकम न सादन ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 तिपदे ॥ (हे भाई ! मुझे तो) प्यारे (प्रभू) का वह प्रेम ही (चाहिए)। 1।रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के प्यार के बदले में) सोना।मोती।बड़े बड़े मोती।हीरे लाल- मुझे इनमें से कुछ भी नहीं चाहिए।नहीं चाहिए। 1। (हे भाई ! प्रभू के प्यार की जगह) ना राज।ना धन-पदार्थ।ना हकूमत ना ही स्वादिष्ट खाने-
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४०६ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।