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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 405 · आसा

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अंग
405
आसा
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  1. तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥
  2. जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥
  3. डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥
  4. उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥

रागु आसा महला 5 घरु 12
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥
एक साचे नाम बाझहु सगल दीसै छारु ॥1॥
सो प्रभु जाणीऐ सद संगि ॥
गुर प्रसादी बूझीऐ एक हरि कै रंगि ॥1॥ रहाउ ॥
सरणि समरथ एक केरी दूजा नाही ठाउ ॥
महा भउजलु लंघीऐ सदा हरि गुण गाउ ॥2॥
जनम मरणु निवारीऐ दुखु न जम पुरि होइ ॥
नामु निधानु सोई पाए क्रिपा करे प्रभु सोइ ॥3॥
एक टेक अधारु एको एक का मनि जोरु ॥
नानक जपीऐ मिलि साधसंगति हरि बिनु अवरु न होरु ॥4॥1॥136॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 5 घरु 12 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई! संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए इस संबंधी अपनी) सारी सियानपें छोड़ दें। परमात्मा निरंकार का सिमरन किया करें। सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (संसार-समुंद्र से पार लांघने संबंधी और) हरेक चतुराई निकम्मी (मूर्खता साबित होती) है। 1। (हे भाई! अगर संसार-समुंद्र में से अपनी जीवन-बेड़ी सही-सलामत पार लंघानी है, तो) उस परमात्मा को हमेशा अपने अंग-संग बसता समझना चाहिए। ये समझ तभी पड़ सकती है अगर गुरू की कृपा से एक परमात्मा के प्यार में टिके रहें। 1। रहाउ। (हे भाई! संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने की) ताकत रखने वाली सिर्फ एक परमात्मा की ओट है। इसके बिना और कोई सहारा नहीं (इस वास्ते हे भाई!) सदा परमात्मा के गुण गाता रह तो ही इस बिखड़े संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकेगा। 2। (हे भाई! यदि परमात्मा को सदा अंग-संग बसता पहचान लें तो) जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है। जमों के शहर में निवास नहीं होता (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती) कोई दुख छू नहीं सकता। (पर सारे गुणों का) खजाना ये हरि-नाम वही मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर प्रभू स्वयं कृपा करता है। 3। (हे भाई!) एक परमात्मा की ही ओट। एक परमात्मा का ही आसरा। एक परमात्मा का ही मन में तकिया (जम-पुरी से बचा सकता) है। (इस वास्ते) हे नानक! साध-संगति में मिल के परमात्मा का ही नाम सिमरना चाहिए। परमात्मा के बिना और कोई नहीं (जो जमपुरी से बचा सके जो संसार समुंद्र से पार लंघा सके)। 4। 1। 136।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥

आसा महला 5 ॥
जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥
दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥1॥
मेरे मन धिआइ हरि हरि नाउ ॥
हलति पलति सहाइ संगे एक सिउ लिव लाउ ॥1॥ रहाउ ॥
बेद सासत्र जन धिआवहि तरण कउ संसारु ॥
करम धरम अनेक किरिआ सभ ऊपरि नामु अचारु ॥2॥
कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिलै सतिगुर देव ॥
नामु द्रिड़ु करि भगति हरि की भली प्रभ की सेव ॥3॥
चरण सरण दइआल तेरी तूं निमाणे माणु ॥
जीअ प्राण अधारु तेरा नानक का प्रभु ताणु ॥4॥2॥137॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई!) ये जिंद, ये मन, ये शरीर, ये प्राण, सारे स्वादिष्ट पदार्थ, ये सब परमात्मा के दिए हुए हैं। परमात्मा ही गरीबों का (असल) संबंधी है। परमात्मा ही आत्मिक जीवन देने वाला है। परमात्मा ही शरण पड़े की रक्षा करने में समर्थ है। 1। हे मेरे मन! सदा परमात्मा का नाम सिमरते रहें। परमात्मा ही इस लोक में और परलोक में आपकी सहायता करने वाला है आपके साथ रहने वाला है। एक परमात्मा के साथ ही सुरति जोड़े रखें। 1। रहाउ। हे भाई! संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते लोग वेदों-शास्त्रों को विचारते हैं (और उनके बताए मुताबिक निहित) अनेकों धार्मिक कर्म व अन्य साधन करते हैं। पर परमात्मा का नाम-सिमरन एक ऐसा धार्मिक उद्यम है जो उन निहित सब धार्मिक कर्मों से ऊँचा है श्रेष्ठ है। 2। हे भाई! जो मनुष्य गुरू-देव को मिल जाता है (और उसकी शिक्षा के अनुसार परमात्मा का नाम सिमरता है। उसके मन में से) काम-वासना दूर हो जाती है क्रोध मिट जाता है। अहंकार खत्म हो जाता है। (हे भाई! आप भी अपने हृदय में) परमात्मा का नाम पक्की तरह टिकाए रखें। परमात्मा की भक्ति करें। परमात्मा की सेवा-भक्ति ही बढ़िया काम है। 3। हे दया के घर प्रभू! मैंने आपके चरणों की ओट ली है। आप ही मुझ निमाणे को आदर देने वाले हैं। हे प्रभू! मुझे अपनी जिंद वास्ते। प्राणों के वास्ते आपका ही सहारा है। हे भाई! (दास) नानक का आसरा परमात्मा ही है। 4। 2। 137।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥

आसा महला 5 ॥
डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥
खाटि लाभु गोबिंद हरि रसु पारब्रहम इक रंग ॥1॥
हरि को नामु जपीऐ नीति ॥
सासि सासि धिआइ सो प्रभु तिआगि अवर परीति ॥1॥ रहाउ ॥
करण कारण समरथ सो प्रभु जीअ दाता आपि ॥
तिआगि सगल सिआणपा आठ पहर प्रभु जापि ॥2॥
मीतु सखा सहाइ संगी ऊच अगम अपारु ॥
चरण कमल बसाइ हिरदै जीअ को आधारु ॥3॥
करि किरपा प्रभ पारब्रहम गुण तेरा जसु गाउ ॥
सरब सूख वडी वडिआई जपि जीवै नानकु नाउ ॥4॥3॥138॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे मन!) गुरू की संगति से वंचित रह के (असल सहाई परमात्मा से) सिदक-हीन हो हो के आप बड़ा दुख सहते रहे। अब तो हरि-नाम का स्वाद चखें। एक परमात्मा के मिलाप का आनंद लें (यही है जीवन का) लाभ (ये) कमा ले। 1। (हे भाई!) परमात्मा का नाम सदा जपते रहना चाहिए। (हे भाई!) हरेक सांस के साथ उस परमात्मा को सिमरते रहें। औरों की प्रीति त्याग दें। 1। रहाउ। वह प्रभू ही सारे जगत का मूल है। (दुख दूर करने के) समर्थ है। वह खुद ही आत्मिक जीवन देने वाला है। (हे भाई! दुखों से छुटकारा पाने के लिए) और सारी चतुराईयां छोड़ दें। आठों पहर प्रभू को याद करते रहें। 2। हे भाई! वह सबसे ऊँचा। अपहुँच व बेअंत परमात्मा ही आपका असल मित्र है दोस्त है सहायक है साथी है। उसके सोहाने कोमल चरण अपने दिल में बसाए रखें। वही जिंद का (असली) सहारा है। 3। हे प्रभू! हे पारब्रहम! मेहर कर मैं सदा आपके गुण गाता रहूँ आपकी सिफत सालाह करता रहूँ। (आपकी सिफत सालाह में ही) सारे सुख हैं और बड़ी इज्जत है। (आपका दास) नानक आपका नाम सिमर के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। 4। 3। 138।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग आसा

उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥

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आसा महला 5 ॥
उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥
हरि हरि नामु चरावहु रंगनि आपे ही प्रभ रंगि ॥1॥
मन महि राम नामा जापि ॥
करि किरपा वसहु मेरै हिरदै होइ सहाई आपि ॥1॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि नामु तुमारा प्रीतम प्रभु पेखन का चाउ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मेरे मालिक! (मुझसे ये उद्यम) करवाते रहें। गुरू की संगति में आपके दर्शन करते हुए मैं आपका नाम जपने का आहर करता रहूँ। हे प्रभू! मेरे मन पर आप अपने नाम की रंगत चढ़ा दें। आप खुद ही (मेरे मन को अपने प्रेम के रंग में) रंग दें। 1। हे प्रभू! (मेरे पर) किरपा करें। मेरे हृदय में आ बसें। यदि आप मेरा मददगार बनें, तो मैं अपने मन में आपका राम-नाम जपता रहूँ। 1। रहाउ। आपका नाम सुन-सुन के मेरे अंदर आपके दर्शनों का चाव बना रहे

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 405 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।