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अंग 401

अंग
401
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुरू विटहु हउ वारिआ जिसु मिलि सचु सुआउ ॥1॥ रहाउ ॥
सगुन अपसगुन तिस कउ लगहि जिसु चीति न आवै ॥
तिसु जमु नेड़ि न आवई जो हरि प्रभि भावै ॥2॥
पुंन दान जप तप जेते सभ ऊपरि नामु ॥
हरि हरि रसना जो जपै तिसु पूरन कामु ॥3॥
भै बिनसे भ्रम मोह गए को दिसै न बीआ ॥
नानक राखे पारब्रहमि फिरि दूखु न थीआ ॥4॥18॥120॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: क्योंकि उस (गुरू) को मिल के ही मैंने सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरना (अपनी जिंदगी का) उद्देश्य बनाया है। 1।रहाउ। (हे भाई ! मेरे अंदर अच्छे-बुरे शगुनों का सहिम भी नहींरह गया) अच्छे-बुरे शगुनों के सहम उस मनुष्य को चिपकते हैं जिसके चित्त में परमात्मा नहीं बसता।पर। जो मनुष्य प्रभू (की याद) में (जुड़ के) हरि-प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ता है जमदूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते। 2। (हे भाई ! निहित) नेक कर्म।दान।जप व तप- ये जितने भी हैं परमात्मा का नाम जपना इन सभी में से श्रेष्ठ कर्म है। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपता है उसका जीवन मनोरथ सफल हो जाता है। 3। उनके सारे डर नाश हो जाते हैं उनके मोह के भरम समाप्त हो जाते हैं।उन्हें कोई मनुष्य बेगाना नहीं दिखाई देता। हे नानक ! जिन मनुष्यों की रक्षा परमात्मा ने स्वयं की है उन्हें दुबारा कोई दुख नहीं व्याप्ता। 4। 18। 120।
आसा घरु 9 महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥
एकु दातारु सगल है जाचिक दूसर कै पहि जावउ ॥1॥
हउ मागउ आन लजावउ ॥
सगल छत्रपति एको ठाकुरु कउनु समसरि लावउ ॥1॥ रहाउ ॥
ऊठउ बैसउ रहि भि न साकउ दरसनु खोजि खोजावउ ॥
ब्रहमादिक सनकादिक सनक सनंदन सनातन सनतकुमार तिन॑ कउ महलु दुलभावउ ॥2॥
अगम अगम आगाधि बोध कीमति परै न पावउ ॥
ताकी सरणि सति पुरख की सतिगुरु पुरखु धिआवउ ॥3॥
भइओ क्रिपालु दइआलु प्रभु ठाकुरु काटिओ बंधु गरावउ ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइओ तउ फिरि जनमि न आवउ ॥4॥1॥121॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा घरु 9 महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) मैं (सदा) चाहता (तो ये) हूँ कि परमात्मा का सिमरन करके (उससे) मैं सारे सुख हासिल करूँ (पर मुझे ये पता नहीं कि ये तमन्ना करके) मैं प्रभू की हजूरी में ठीक लग रहा हूँ कि नहीं। (कोई सुख आदि मांगने के लिए) मैं किसी और के पास जा भी नहीं सकता।क्योंकि दातें देने वाला तो सिर्फ एक परमात्मा ही है और सृष्टि (उसके दर से) मांगने वाली है। (हे भाई ! जब) मैं (परमात्मा के बिना) किसी और से मांगता हूँ तो शर्माता हूँ (क्योंकि) एक मालिक प्रभू ही सब जीवों का राजा है। मैं किसी और को उसके बराबर का सोच ही नहीं सकता। 1।रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा का दर्शन करने के लिए) मैं उठता हूँ (कोशिश करता हूँ।फिर) बैठ जाता हूँ।(पर दर्शन किए बिना) रह भी नहीं सकता।दुबारा खोज-खोज के दर्शन तलाशता हूँ। (मैं बेचारा क्या चीज हूँ।) परमात्मा के ठिकाने तो उनके वास्ते भी दुर्लभ ही रहे जो ब्रहमा जैसे (बड़े-बड़े देवता माने गए) जो सनक जैसे-सनक।सनंदन।सनातन व सनत कुमार (ब्रहमा के पुत्र कहलवाए)। 2। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है।जीवों की पहुँच से परे है।वह एक अथाह समुंद्र है जिसकी गहराई की सूझ नहीं पड़ सकती।उसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती।मैं उसका मूल्य नहीं निश्चित कर सकता। (हे भाई ! उसके दर्शन की खातिर) मैंने गुरू महापुरख की शरण देखी है।मैं सतिगुरू की आराधना करता हूँ। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य पर ठाकुर प्रभू दयावान होता है उसके गले की (माया के मोह की) फाही काट देता है। हे नानक ! कह,अगर मुझे साधसंगति प्राप्त हो जाए।तो ही मैं बार-बार जन्मों में नहीं आऊँगा (जन्मों के चक्करों से बच सकूँगा)। 4। 1। 121।
आसा महला 5 ॥
अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥
संगि चलन कउ तोसा दीन॑ा गोबिंद नाम के बिउहारी ॥1॥
अवर बिसारी बिसारी ॥
नाम दानु गुरि पूरै दीओ मै एहो आधारी ॥1॥ रहाउ ॥
दूखनि गावउ सुखि भी गावउ मारगि पंथि सम॑ारी ॥
नाम द्रिड़ु गुरि मन महि दीआ मोरी तिसा बुझारी ॥2॥
दिनु भी गावउ रैनी गावउ गावउ सासि सासि रसनारी ॥
सतसंगति महि बिसासु होइ हरि जीवत मरत संगारी ॥3॥
जन नानक कउ इहु दानु देहु प्रभ पावउ संत रेन उरि धारी ॥
स्रवनी कथा नैन दरसु पेखउ मसतकु गुर चरनारी ॥4॥2॥122॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु 10 महला 5 ॥
जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ अब मैं अपने हृदय में परमात्मा के गुण गाता हूँ।बाहर दुनिया से कार्य-व्यवहार करते हुए भी परमात्मा की सिफत सालाह याद रखता हूँ।सोने के समय भी और जाग के भी मैं परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ। (हे भाई !) परमात्मा के नाम के वणजारे सत्संगियों ने मेरे से साथ करने के लिए मुझे (परमात्मा का नाम) यात्रा-खर्च (के तौर पर) दे दिया है। 1। (हे भाई ! परमात्मा के बिना) कोई अन्य ओट मैंने बिल्कुल ही भुला दी है। पूरे गुरू ने मुझे परमात्मा के नाम (की) दाति दी है।मैंने इसी को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना लिया है। 1।रहाउ। अब मैं दुखों में परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ।सुख में भी गाता हूँ।रास्ते पर चलते हुए भी (परमात्मा की याद को अपने दिल में) संभाले रखता हूँ। (हे भाई !) गुरू ने मेरे मन में प्रभू-नाम दृढ़ कर दिया है (उस नाम ने) मेरी तृष्णा मिटा दी है।2। (हे भाई !) अब मैं दिन में भी और रात को भी।और हरेक सांस के साथ भी अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ। (हे भाई ! ये सारी बरकति साध-संगति की है) साध-संगति में टिकने से ये निश्चय बन जाता है कि परमात्मा जीते-मरते हर वक्त हमारे साथ रहता है। 3। हे प्रभू ! अपने दास नानक को ये दान दे कि मैं आपके संत-जनों की चरण-धूड़ प्राप्त करूँ। आपकी याद को अपने हृदय में टिकाए रखूँ।आपकी सिफत सालाह अपने कानों से सुनता रहूँ।आपके दर्शन अपनी आँखों से करता रहूँ।और अपना माथा गुरू के चरणों में रखे रखूँ। 4। 2। 122। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा घरु 10 महला 5 ॥ हे मन ! जिस पुत्र को जिस स्त्री को जिस घर के सामान को आप सदा कायम रहने वाला माने बैठा है।ये सारे तो दो दिनों के मेहमान हैं।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “क्योंकि उस (गुरू) को मिल के ही मैंने सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरना (अपनी जिंदगी का) उद्देश्य बनाया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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