गुर सेवा महलु पाईऐ जगु दुतरु तरीऐ ॥2॥ द्रिसटि तेरी सुखु पाईऐ मन माहि निधाना ॥ जा कउ तुम किरपाल भए सेवक से परवाना ॥3॥ अंम्रित रसु हरि कीरतनो को विरला पीवै ॥ वजहु नानक मिलै एकु नामु रिद जपि जपि जीवै ॥4॥14॥116॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) गुरू की बताई सेवा करने से (परमात्मा के चरणों में) ठिकाना मिल जाता है।और इस संसार (-समुंद्र) से पार लांघ जाते हैं जिससे (वैसे) पार लांघना बहुत ही मुश्किल है। 2। हे प्रभू ! आपकी मेहर की नजर से सुख मिलता है (जिनपे आपकी मेहर हैं उनके) मन में (आपका नाम-) खजाना आ बसता है। हे प्रभू ! जिन पे आप दयावान होता है वह आपके सेवक आपके दर पर कबूल होते हैं। 3। हे भाई ! परमात्माकी सिफत सालाह आत्मिक जीवन देने वाला रस है।कोई विरला (भाग्यशाली) मनुष्य ये (अमृत रस) पीता है। हे नानक ! (कह, जिस नौकर को) परमात्मा का नाम-वजीफा मिल जाता है वह अपने हृदय में ये नाम सदा जप के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 4। 14। 116।
आसा महला 5 ॥ जा प्रभ की हउ चेरुली सो सभ ते ऊचा ॥ सभु किछु ता का कांढीऐ थोरा अरु मूचा ॥1॥ जीअ प्रान मेरा धनो साहिब की मनीआ ॥ नामि जिसै कै ऊजली तिसु दासी गनीआ ॥1॥ रहाउ ॥ वेपरवाहु अनंद मै नाउ माणक हीरा ॥ रजी धाई सदा सुखु जा का तूं मीरा ॥2॥ सखी सहेरी संग की सुमति द्रिड़ावउ ॥ सेवहु साधू भाउ करि तउ निधि हरि पावउ ॥3॥ सगली दासी ठाकुरै सभ कहती मेरा ॥ जिसहि सीगारे नानका तिसु सुखहि बसेरा ॥4॥15॥117॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सहेलियो ! मैं जिस प्रभू की निमाणी सी दासी हूँ मेरा वह मालिक प्रभू सबसे ऊँचा है। मेरे पास जो कुछ भी छोटी-बड़ी चीज है उस मालिक की ही कहलाती है। 1। हे सहेलियो ! मेरी जिंद।मेरे प्राण।मेरा धन-पदार्थ – ये सब कुछ मैं अपने मालिक प्रभू की दी हुई दाति मानती हूँ। जिस मालिक-प्रभू के नाम की बरकति से मैं इज्जत वाली हो गई हूँ मैं अपने आप को उसकी दासी गिनती हूँ। 1।रहाउ। (हे मेरे मालिक प्रभू !) तूझे किसी की मुहताजी नहीं।आप सदा आनंद-स्वरूप है।आपका नाम मेरे वास्ते मोती है हीरा है। हे प्रभू ! जिस जीव-स्त्री का (जिस जीव स्त्री के सिर पर) आप पातशाह (बनता) है वह (माया की ओर से) तृप्त रहती है।संतुष्ट रहती है वह सदा आनंद पाती है। 2। हे मेरे साथ की सहेलियो ! मैं आपको ये भली सलाह बारंबार याद करवाती हूँ (जो मुझे गुरू से मिली हुई है)। आप श्रद्धा व प्रेम धारण करके गुरू की शरण पड़ो। (मैं जब से गुरू की शरण में आई हूँ) तब से मैं परमात्मा का नाम-खजाना हासिल कर रही हूँ। 3। हे मेरी सहेलियो ! हरेक जीव-स्त्री ही मालिक प्रभू की दासी है।हरेक जीव-स्त्री कहती है कि परमात्मा मेरा मालिक है।पर। हे नानक ! (कह, हे सहेलियो !) जिस जीव-स्त्री (के जीवन) को (मालिक प्रभू स्वयं) सुंदर बनाता है उसका निवास सुख आनंद में बना रहता है। 4। 15। 117।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मेरी सोहनी जिंदे ! आप सत्संगियों की निमाणी दासी बनी रह- बस ! ये कर्तव्य सीख।और। हे जिंदे ! उस पति-प्रभू को कहीं दूर बसता ना समझ जो सारे गुणों का मालिक है जो अपने गुणों के कारण सबसे श्रेष्ठ है। 1। हे (मेरी) सोहणी जिंदे ! आप अपने इस मन को मजीठ (जैसे पक्के) परमात्मा के नाम रंग से रंग ले। अपने अंदर की सियानप और चतुराई छोड के (ये गुमान छोड़ कि आप बड़ी सियानी है और चतुर है)।हे जिंदे ! सृष्टि के मालिक प्रभू को अपने साथ बसता समझती रह। 1।रहाउ। हे मेरी सोहणी जिंदे ! पति-प्रभू जो हुकम करता है वह (मीठा करके) मानना चाहिए- बस ! इस बात को (अपने जीवन का) श्रृंगार बनाए रख। परमात्मा के बिना और (माया आदि का) प्यार भुला देना चाहिए- (ये नियम आत्मिक जीवन वास्ते।जैसे।पान का बीड़ा है) हे जिंदे ! ये पान खाया कर। 2। हे मेरी सोहणी जिंदे ! सतिगुरू के शबद को दीपक बना (जो आपके अंदर आत्मिक जीवन का प्रकाश पैदा करे) और उस आत्मिक जीवन की (अपने हृदय में) सेज बिछा। हे सोहणी जिंदे ! (अपने अंतरात्मे) आठों पहर (दोनों) हाथ जोड़ के (प्रभू चरणों में) टिकी रह।तब ही प्रभू-पातशाह (आ के) मिलता है। 3। वह जीव स्त्री सुंदर रूप वाली समझी जाती है जो बेअंत परमात्मा (के चरणों) में लीन रहती है।हे जिंदे ! वही जीव-स्त्री सुहाग-भाग वाली है जो (करतार को) प्यारी लगती है जो करतार (की याद) में लीन रहती है। हे नानक ! (कह) हे मेरी सोहणी जिंदे ! उसी जीव स्त्री को सलीके वाली (सुचॅजी) माना जाता है उसी जीव-स्त्री का (आत्मिक) श्रृंगार परवान होता है।4। 16। 118।
आसा महला 5 ॥ डीगन डोला तऊ लउ जउ मन के भरमा ॥ भ्रम काटे गुरि आपणै पाए बिसरामा ॥1॥ ओइ बिखादी दोखीआ ते गुर ते हूटे ॥ हम छूटे अब उन॑ा ते ओइ हम ते छूटे ॥1॥ रहाउ ॥ मेरा तेरा जानता तब ही ते बंधा ॥ गुरि काटी अगिआनता तब छुटके फंधा ॥2॥ जब लगु हुकमु न बूझता तब ही लउ दुखीआ ॥ गुर मिलि हुकमु पछाणिआ तब ही ते सुखीआ ॥3॥ ना को दुसमनु दोखीआ नाही को मंदा ॥ गुर की सेवा सेवको नानक खसमै बंदा ॥4॥17॥119॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! विकारों में गिरने और मोह में फंसने का सबब तब तक बना रहता है जब तक मनुष्य के मन की (माया की खातिर) दौड़-भाग टिकी रहती हैं। पर प्यारे गुरू ने जिस मनुष्य की भटकनें दूर कर दीं उसने मानसिक टिकाव प्राप्त कर लिया। 1। (हे भाई !) ये जितने भी कामादिक झगड़ालू वैरी हैं गुरू की शरण पड़ने से ये सारे ही थक गए है (हमें दुखी करने से बाज आ गए)। अब उनसे हमें निजात मिल गई है।उन सभी ने हमारा पीछा छोड़ दिया है। 1।रहाउ। जब से मनुष्य मेर-तेर (वितकरे) करता चला तब से ही इसे माया के मोह के बंधन पड़े हुए हैं।पर। जब गुरू ने अज्ञानता दूर कर दी तब मोह के फंदों से खलासी मिल गई। 2। हे भाई ! जब तक मनुष्य परमात्मा की रजा को नहीं समझता उतने समय तक ही दुखी रहता है। पर जिसने गुरू की शरण पड़ के परमात्मा की रजा को समझ लिया वह उसी समय से सुखी हो गया। 3। उसे कोई मनुष्य अपना दुश्मन नहीं दिखता। कोई वैरी नहीं प्रतीत होता।कोई उसे बुरा नहीं लगता। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की सेवा करके परमात्मा का सेवक बन जाता है पति-प्रभू का गुलाम बन जाता है।4। 17। 119।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ मैं परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता हूँ।और (मेरे अंदर) आत्मिक अडोलता का बड़ा सुख-आनंद बना रहता है। (हे भाई !) गुरू ने मुझे वह हरि-नाम दे के जो नाम वह स्वयं जपता है।ने मेरे पर से (जैसे) नौवों (9) ग्रहों की मुसीबतें दूर कर दी हों। 1। (हे भाई !) मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ।सदा ही सदके जाता हूँ।मैं गुरू से वारने जाता हूँ।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) गुरू की बताई सेवा करने से (परमात्मा के चरणों में) ठिकाना मिल जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।