सीतलु हरि हरि नामु सिमरत तपति जाइ ॥3॥ सूख सहज आनंद घणा नानक जन धूरा ॥ कारज सगले सिधि भए भेटिआ गुरु पूरा ॥4॥10॥112॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: उस परमात्मा का नाम (मन में) ठंड डालने वाला है।उसका नाम सिमरने से (मन में से तृष्णा की) तपश बुझ जाती है। 3। जो मनुष्य संत-जनों के चरणों की धूड़ में टिका रहता है उसे आत्मिक अडोलता के बहुत सुख-आनंद प्राप्त हुए रहते हैं। हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है।उसे सारे काम-काजों में सफलता मिलती है। 4। 10। 1112।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे संत जनो !) परमात्मा सारे गुणों का खजाना है।गुरू की शरण पड़ के ही उसके साथ गहरी सांझ डाली जा सकती है। अगर वह प्रभू दयावान हो प्रसन्न हो जाए तो उसका प्रेम (-आनंद) पाया जा सकता है। 1। हे संत जनो ! आएँ।हम इकट्ठे बैठें और परमात्मा की सिफत सालाह की बातें करें। लोक-लाज छोड़ के हर वक्त उसका नाम सिमरते रहें। 1।रहाउ। (हे संत जनो !) मैं तो ज्यों-ज्यों (परमातमा का) नाम जपता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है मेरे अंदर बड़ा आनंद पैदा होता है (उस वक्त मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि) संसार (का मोह) व्यर्थ मोह है। संसार सदा कायम रहने वाला नहीं।संसार तो नाश हो जाने वाला है (इसके मोह में से सुख-आनंद कैसे मिले।)। 2। (पर हे संत जनों !) किसी विरले (भाग्यशाली) मनुष्य ने परमात्मा के सुंदर कोमल चरणों से प्यार डाला है जिस ने (जिसने ये प्यार डाला है) परमात्मा का नाम सिमरा है उसका मुखड़ा भाग्यशाली है। उसका मुंह सुहाना लगता है। 3। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम सिमरने से जनम-मरण (के चक्करों) का दुख मिट जाता है। (हे संत जनो !) जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है (वही ठीक है।ये निश्चय जो सिमरन की बरकति से पैदा होता है) नानक के हृदय में आनंद (पैदा किए रखता है)। 4। 11। 113।
आसा महला 5 ॥ आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥ अंम्रित नामु हरि हरि जपह मिलि पापा मुंचह ॥1॥ ततु वीचारहु संत जनहु ता ते बिघनु न लागै ॥ खीन भए सभि तसकरा गुरमुखि जनु जागै ॥1॥ रहाउ ॥ बुधि गरीबी खरचु लैहु हउमै बिखु जारहु ॥ साचा हटु पूरा सउदा वखरु नामु वापारहु ॥2॥ जीउ पिंडु धनु अरपिआ सेई पतिवंते ॥ आपनड़े प्रभ भाणिआ नित केल करंते ॥3॥ दुरमति मदु जो पीवते बिखली पति कमली ॥ राम रसाइणि जो रते नानक सच अमली ॥4॥12॥114॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मित्र ! आएँ।मिल के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जपें (और नाम की बरकति से अपने सारे) पाप नाश कर लें- यही धन जैसे सारे स्वादिष्ट पदार्थ आओये सारे स्वादिष्ट व्यंजन खाएं। 1। हे संत जनो ! ये सोचा करो कि मनुष्य जीवन का असल मनोरथ क्या है।इस प्रयास से (जीवन यात्रा में) कोई रुकावट नहीं पडती। कामादिक सारे चोर नाश हो जाते हैं (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य (इन चोरों के हमलों से) सुचेत रहता है। 1।रहाउ। हे संत जनो ! विनम्रता वाली बुद्धि धारण करो- ये जीवन-यात्रा का खर्च पल्ले बाँधो।(नाम की बरकति से अपने अंदर से) अहंकार को जला दो (जो आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाला) जहर (है)। (हे संत जनो ! हरि-नाम गुरू से मिलता है।गुरू का घर ही) सदा कायम रहने वाली दुकान है (गुरू-दर से ही हरि नाम का) पूरा सौदा मिलता है (गुरू दर से) नाम-सौदा खरीदो। 2। (हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने हरी-नाम-धन खरीदने के लिए) अपनी जिंद।अपना शरीर।अपना दुनियावी धन भेटा कर दिया वह मनुष्य (लोक-परलोक में) आदरणीय हो गए। वे अपने परमात्मा को प्यारे लगने लग पड़े।वे सदा आत्मिक आनंद पाने लग गए। 3। (हे संत जनो !) खोटी मति (जैसे) शराब है जो मनुष्य ये शराब पीने लग जाते हैं (जो गुरू का आसरा छोड़ के खोटी मति के पीछे चलने लग जाते हैं) वे दुराचारी हो जाते हैं वे (विकारों में) पागल हो जाते हैं।पर। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के श्रेष्ठ रस में मस्त रहते हैं उनको सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम का अमल लग जाता है। 4। 12। 114।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जैसे गुरू ने उद्यम करने की प्रेरणा की है वैसे ही मैंने उद्यम किया है और परमात्मा का नाम जपने के उद्यम का आरम्भ मैंने कर दिया है। गुरू ने मेरे हृदय में नाम-मंत्र पक्का करके टिका दिया है।अब नाम जप-जपके मुझे आत्मिक जीवन मिल गया है। 1। (हे भाई ! आओ) उस गुरू के चरणों में ढह पड़ें जिसने हमारे मन की भटकना नाश कर दी है। (गुरू की बरकति के साथ ही) परमात्मा ने अपनी कृपा करके (अपना) सदा-स्थिर नाम (जपने का रास्ता) चला के हमारा जीवन सुंदर बना दिया है। 1।रहाउ। (हे भाई !) वह रजा का मालिक परमात्मा सदा कायम रहने वाला है उसने अपने हुकम में मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने चरणों में लीन कर लिया है। (अपने नाम की) जो दाति मुझे दी है वही मेरे वास्ते सबसे बड़ा आदर-मान है। 2। (हे भाई ! अब मेरे दिल में) सदा ही परमात्मा के गुण गाए जा रहे हैं।मैं सदा परमात्मा का नाम जपता रहता हूँ। प्रभू ने मेहर की है।गुरू मेरा (नाम जपने का) नियम सफल कर रहा है। 3। (हे भाई ! अब) परमात्मा का नाम ही (मेरा) धन है।मैं सदा परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ पूरे गुरू ने मुझे (मानस जनम में किए जाने वाले वणज का ये) लाभ दिया है। हे नानक ! (कह, हे भाई ! नाम-रस का) शाहूकार परमात्मा बेअंत ताकत का मालिक है उसके संत-जन (उसकी मेहर से ही उसके नाम के) बंजारे हैं (मानस जनम का लाभ हासिल करने के लिए संत-जनों की शरण पड़ना चाहिए)। 4। 13। 115।
आसा महला 5 ॥ जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥ ओहु सुहेला सद सुखी सभु भ्रमु भउ भागा ॥1॥ हम चाकर गोबिंद के ठाकुरु मेरा भारा ॥ करन करावन सगल बिधि सो सतिगुरू हमारा ॥1॥ रहाउ ॥ दूजा नाही अउरु को ता का भउ करीऐ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप खुद ही जिस मनुष्य के सिर पर मालिक है उसके बड़े भाग्य (समझने चाहिए)। वह सदा आसान (जीवन व्यतीत करता) है वह सदा सुखी (रहता) है उसका हरेक किस्म का डर और भरम दूर हो जाता है। 1। (हे भाई !) मैं उस गोबिंद का सेवक हूँ मेरा वह मालिक है जो सबसे बड़ा है जो (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सारे तरीकों से (सब कुछ) करने वाला है।और (जीवों से) कराने वाला है।वही मेरा गुरू है (मेरे जीवन राह में रौशनी देने वाला है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! जगत में) परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं है जिसका डर माना जाए।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस परमात्मा का नाम (मन में) ठंड डालने वाला है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।