अंग
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आसा
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सीतलु हरि हरि नामु सिमरत तपति जाइ ॥3॥
सीतलु हरि हरि नामु सिमरत तपति जाइ ॥3॥
सूख सहज आनंद घणा नानक जन धूरा ॥
कारज सगले सिधि भए भेटिआ गुरु पूरा ॥4॥10॥112॥
सूख सहज आनंद घणा नानक जन धूरा ॥
कारज सगले सिधि भए भेटिआ गुरु पूरा ॥4॥10॥112॥
हिन्दी अर्थ: उस परमात्मा का नाम (मन में) ठंड डालने वाला है।उसका नाम सिमरने से (मन में से तृष्णा की) तपश बुझ जाती है। 3। जो मनुष्य संत-जनों के चरणों की धूड़ में टिका रहता है उसे आत्मिक अडोलता के बहुत सुख-आनंद प्राप्त हुए रहते हैं। हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है।उसे सारे काम-काजों में सफलता मिलती है। ४।१०।११२।
गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥
आसा महला 5 ॥
गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥
होइ क्रिपालु दइआलु हरि रंगु माणीऐ ॥1॥
आवहु संत मिलाह हरि कथा कहाणीआ ॥
अनदिनु सिमरह नामु तजि लाज लोकाणीआ ॥1॥ रहाउ ॥
जपि जपि जीवा नामु होवै अनदु घणा ॥
मिथिआ मोहु संसारु झूठा विणसणा ॥2॥
चरण कमल संगि नेहु किनै विरलै लाइआ ॥
धंनु सुहावा मुखु जिनि हरि धिआइआ ॥3॥
जनम मरण दुख काल सिमरत मिटि जावई ॥
नानक कै सुखु सोइ जो प्रभ भावई ॥4॥11॥113॥
गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥
होइ क्रिपालु दइआलु हरि रंगु माणीऐ ॥1॥
आवहु संत मिलाह हरि कथा कहाणीआ ॥
अनदिनु सिमरह नामु तजि लाज लोकाणीआ ॥1॥ रहाउ ॥
जपि जपि जीवा नामु होवै अनदु घणा ॥
मिथिआ मोहु संसारु झूठा विणसणा ॥2॥
चरण कमल संगि नेहु किनै विरलै लाइआ ॥
धंनु सुहावा मुखु जिनि हरि धिआइआ ॥3॥
जनम मरण दुख काल सिमरत मिटि जावई ॥
नानक कै सुखु सोइ जो प्रभ भावई ॥4॥11॥113॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे संत जनो !) परमात्मा सारे गुणों का खजाना है।गुरू की शरण पड़ के ही उसके साथ गहरी सांझ डाली जा सकती है। अगर वह प्रभू दयावान हो प्रसन्न हो जाए तो उसका प्रेम (-आनंद) पाया जा सकता है। 1। हे संत जनो ! आएँ।हम इकट्ठे बैठें और परमात्मा की सिफत सालाह की बातें करें। लोक-लाज छोड़ के हर वक्त उसका नाम सिमरते रहें। 1।रहाउ। (हे संत जनो !) मैं तो ज्यों-ज्यों (परमातमा का) नाम जपता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है मेरे अंदर बड़ा आनंद पैदा होता है (उस वक्त मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि) संसार (का मोह) व्यर्थ मोह है। संसार सदा कायम रहने वाला नहीं।संसार तो नाश हो जाने वाला है (इसके मोह में से सुख-आनंद कैसे मिले।)। 2। (पर हे संत जनों !) किसी विरले (भाग्यशाली) मनुष्य ने परमात्मा के सुंदर कोमल चरणों से प्यार डाला है जिस ने (जिसने ये प्यार डाला है) परमात्मा का नाम सिमरा है उसका मुखड़ा भाग्यशाली है। उसका मुंह सुहाना लगता है। 3। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम सिमरने से जनम-मरण (के चक्करों) का दुख मिट जाता है। (हे संत जनो !) जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है (वही ठीक है।ये निश्चय जो सिमरन की बरकति से पैदा होता है) नानक के हृदय में आनंद (पैदा किए रखता है)। 4। 11। 113।
आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥
आसा महला 5 ॥
आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥
अंम्रित नामु हरि हरि जपह मिलि पापा मुंचह ॥1॥
ततु वीचारहु संत जनहु ता ते बिघनु न लागै ॥
खीन भए सभि तसकरा गुरमुखि जनु जागै ॥1॥ रहाउ ॥
बुधि गरीबी खरचु लैहु हउमै बिखु जारहु ॥
साचा हटु पूरा सउदा वखरु नामु वापारहु ॥2॥
जीउ पिंडु धनु अरपिआ सेई पतिवंते ॥
आपनड़े प्रभ भाणिआ नित केल करंते ॥3॥
दुरमति मदु जो पीवते बिखली पति कमली ॥
राम रसाइणि जो रते नानक सच अमली ॥4॥12॥114॥
आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥
अंम्रित नामु हरि हरि जपह मिलि पापा मुंचह ॥1॥
ततु वीचारहु संत जनहु ता ते बिघनु न लागै ॥
खीन भए सभि तसकरा गुरमुखि जनु जागै ॥1॥ रहाउ ॥
बुधि गरीबी खरचु लैहु हउमै बिखु जारहु ॥
साचा हटु पूरा सउदा वखरु नामु वापारहु ॥2॥
जीउ पिंडु धनु अरपिआ सेई पतिवंते ॥
आपनड़े प्रभ भाणिआ नित केल करंते ॥3॥
दुरमति मदु जो पीवते बिखली पति कमली ॥
राम रसाइणि जो रते नानक सच अमली ॥4॥12॥114॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मित्र ! आएँ।मिल के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जपें (और नाम की बरकति से अपने सारे) पाप नाश कर लें- यही धन जैसे सारे स्वादिष्ट पदार्थ आओये सारे स्वादिष्ट व्यंजन खाएं। 1। हे संत जनो ! ये सोचा करो कि मनुष्य जीवन का असल मनोरथ क्या है।इस प्रयास से (जीवन यात्रा में) कोई रुकावट नहीं पडती। कामादिक सारे चोर नाश हो जाते हैं (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य (इन चोरों के हमलों से) सुचेत रहता है। 1।रहाउ। हे संत जनो ! विनम्रता वाली बुद्धि धारण करो- ये जीवन-यात्रा का खर्च पल्ले बाँधो।(नाम की बरकति से अपने अंदर से) अहंकार को जला दो (जो आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाला) जहर (है)। (हे संत जनो ! हरि-नाम गुरू से मिलता है।गुरू का घर ही) सदा कायम रहने वाली दुकान है (गुरू-दर से ही हरि नाम का) पूरा सौदा मिलता है (गुरू दर से) नाम-सौदा खरीदो। 2। (हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने हरी-नाम-धन खरीदने के लिए) अपनी जिंद।अपना शरीर।अपना दुनियावी धन भेटा कर दिया वह मनुष्य (लोक-परलोक में) आदरणीय हो गए। वे अपने परमात्मा को प्यारे लगने लग पड़े।वे सदा आत्मिक आनंद पाने लग गए। 3। (हे संत जनो !) खोटी मति (जैसे) शराब है जो मनुष्य ये शराब पीने लग जाते हैं (जो गुरू का आसरा छोड़ के खोटी मति के पीछे चलने लग जाते हैं) वे दुराचारी हो जाते हैं वे (विकारों में) पागल हो जाते हैं।पर। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के श्रेष्ठ रस में मस्त रहते हैं उनको सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम का अमल लग जाता है। 4। 12। 114।
उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥
आसा महला 5 ॥
उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥
नामु जपे जपि जीवणा गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥1॥
पाइ परह सतिगुरू कै जिनि भरमु बिदारिआ ॥
करि किरपा प्रभि आपणी सचु साजि सवारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
करु गहि लीने आपणे सचु हुकमि रजाई ॥
जो प्रभि दिती दाति सा पूरन वडिआई ॥2॥
सदा सदा गुण गाईअहि जपि नामु मुरारी ॥
नेमु निबाहिओ सतिगुरू प्रभि किरपा धारी ॥3॥
नामु धनु गुण गाउ लाभु पूरै गुरि दिता ॥
वणजारे संत नानका प्रभु साहु अमिता ॥4॥13॥115॥
उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥
नामु जपे जपि जीवणा गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥1॥
पाइ परह सतिगुरू कै जिनि भरमु बिदारिआ ॥
करि किरपा प्रभि आपणी सचु साजि सवारिआ ॥1॥ रहाउ ॥
करु गहि लीने आपणे सचु हुकमि रजाई ॥
जो प्रभि दिती दाति सा पूरन वडिआई ॥2॥
सदा सदा गुण गाईअहि जपि नामु मुरारी ॥
नेमु निबाहिओ सतिगुरू प्रभि किरपा धारी ॥3॥
नामु धनु गुण गाउ लाभु पूरै गुरि दिता ॥
वणजारे संत नानका प्रभु साहु अमिता ॥4॥13॥115॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जैसे गुरू ने उद्यम करने की प्रेरणा की है वैसे ही मैंने उद्यम किया है और परमात्मा का नाम जपने के उद्यम का आरम्भ मैंने कर दिया है। गुरू ने मेरे हृदय में नाम-मंत्र पक्का करके टिका दिया है।अब नाम जप-जपके मुझे आत्मिक जीवन मिल गया है। 1। (हे भाई ! आओ) उस गुरू के चरणों में ढह पड़ें जिसने हमारे मन की भटकना नाश कर दी है। (गुरू की बरकति के साथ ही) परमात्मा ने अपनी कृपा करके (अपना) सदा-स्थिर नाम (जपने का रास्ता) चला के हमारा जीवन सुंदर बना दिया है। 1।रहाउ। (हे भाई !) वह रजा का मालिक परमात्मा सदा कायम रहने वाला है उसने अपने हुकम में मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने चरणों में लीन कर लिया है। (अपने नाम की) जो दाति मुझे दी है वही मेरे वास्ते सबसे बड़ा आदर-मान है। 2। (हे भाई ! अब मेरे दिल में) सदा ही परमात्मा के गुण गाए जा रहे हैं।मैं सदा परमात्मा का नाम जपता रहता हूँ। प्रभू ने मेहर की है।गुरू मेरा (नाम जपने का) नियम सफल कर रहा है। 3। (हे भाई ! अब) परमात्मा का नाम ही (मेरा) धन है।मैं सदा परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ पूरे गुरू ने मुझे (मानस जनम में किए जाने वाले वणज का ये) लाभ दिया है। हे नानक ! (कह, हे भाई ! नाम-रस का) शाहूकार परमात्मा बेअंत ताकत का मालिक है उसके संत-जन (उसकी मेहर से ही उसके नाम के) बंजारे हैं (मानस जनम का लाभ हासिल करने के लिए संत-जनों की शरण पड़ना चाहिए)। 4। 13। 115।
जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥
आसा महला 5 ॥
जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥
ओहु सुहेला सद सुखी सभु भ्रमु भउ भागा ॥1॥
हम चाकर गोबिंद के ठाकुरु मेरा भारा ॥
करन करावन सगल बिधि सो सतिगुरू हमारा ॥1॥ रहाउ ॥
दूजा नाही अउरु को ता का भउ करीऐ ॥
जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥
ओहु सुहेला सद सुखी सभु भ्रमु भउ भागा ॥1॥
हम चाकर गोबिंद के ठाकुरु मेरा भारा ॥
करन करावन सगल बिधि सो सतिगुरू हमारा ॥1॥ रहाउ ॥
दूजा नाही अउरु को ता का भउ करीऐ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप खुद ही जिस मनुष्य के सिर पर मालिक हैं उसके बड़े भाग्य (समझने चाहिए)। वह सदा आसान (जीवन व्यतीत करता) है वह सदा सुखी (रहता) है उसका हरेक किस्म का डर और भरम दूर हो जाता है। 1। (हे भाई !) मैं उस गोबिंद का सेवक हूँ मेरा वह मालिक है जो सबसे बड़ा है जो (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सारे तरीकों से (सब कुछ) करने वाला है।और (जीवों से) कराने वाला है।वही मेरा गुरू है (मेरे जीवन राह में रौशनी देने वाला है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! जगत में) परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं है जिसका डर माना जाए।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३९९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।