गुरु नानक जा कउ भइआ दइआला ॥ सो जनु होआ सदा निहाला ॥4॥6॥100॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य पर गुरू दयावान हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है। 4। 6। 100।
आसा महला 5 ॥ सतिगुर साचै दीआ भेजि ॥ चिरु जीवनु उपजिआ संजोगि ॥ उदरै माहि आइ कीआ निवासु ॥ माता कै मनि बहुतु बिगासु ॥1॥ जंमिआ पूतु भगतु गोविंद का ॥ प्रगटिआ सभ महि लिखिआ धुर का ॥ रहाउ ॥ दसी मासी हुकमि बालक जनमु लीआ ॥ मिटिआ सोगु महा अनंदु थीआ ॥ गुरबाणी सखी अनंदु गावै ॥ साचे साहिब कै मनि भावै ॥2॥ वधी वेलि बहु पीड़ी चाली ॥ धरम कला हरि बंधि बहाली ॥ मन चिंदिआ सतिगुरू दिवाइआ ॥ भए अचिंत एक लिव लाइआ ॥3॥ जिउ बालकु पिता ऊपरि करे बहु माणु ॥ बुलाइआ बोलै गुर कै भाणि ॥ गुझी छंनी नाही बात ॥ गुरु नानकु तुठा कीनी दाति ॥4॥7॥101॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने गुरू (नानक) को (जगत में) भेजा है उसकी संगति (की बरकति) से (सिखों के दिल में) अॅटल आत्मिक जीवन पैदा हो रहा है। (हे भाई ! जैसे जब माँ के) पेट में (बच्चा) आ निवास करता है तो माँ के मन में बहुत खुशी पैदा होती है (वैसे ही सिख के अंदर अटॅल आत्मिक जीवन आनंद पैदा करता है)। 1। (हे भाई ! गुरू नानक) परमात्मा का भक्त पैदा हुआ (परमात्मा का) पुत्र पैदा हुआ (उसकी बरकति से उसकी शरण आने वाले) सारे जीवों के अंदर धुर-दरगाह के (सेवा-भक्ति के) लेख अंकुरित हो रहे हैं।रहाउ। (हे भाई ! जैसे जिस घर में) परमात्मा के हुकम अनुसार दसवें महीने पुत्र पैदा होता है (तो उस घर में से) ग़म मिट जाता है और बड़ा उत्साह होता है; (वैसे ही जो सत्संगी) सहेली गुरू की सिफत सालाह की बाणी गाती है वह आत्मिक आनंद पाती है और वह सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के मन को प्यारी लगती है। 2। ये गुरसिख ही (गुरू की परमात्मा की) बढ़ रही बेल हैं।चल रही पीढ़ी हैं। गुरू उन गुरसिखों में परमात्मा की धर्म-सत्ता पक्की करके टिका देता है। सतिगुरू उन्हें मन-इच्छित फल देता है- (हे भाई ! जो भाग्यशाली मनुष्य गुरू की संगति की बरकति से) एक परमात्मा में सुरति जोड़ते हैं वे चिंता से रहित हो जाते हैं3। (गुरसिख अपने गुरू पर यूँ गर्व करता है) जैसे कोई पुत्र अपने पिता पर माण करता है (वह सिख गुरू से सहायता की उम्मीद भी वैसे ही रखता है जैसे पुत्र पिता से) वह जो कुछ बोलता है गुरू का प्रेरित हुआ गुरू की रजा में ही बोलता है (हे भाई !) अब ये कोई लुकी-छिपी बात नहीं है (हर कोई जानता है कि जिस मनुष्य पर) गुरू नानक दयावान होता है (उसे नाम की) दाति देता है । 4। 7। 101।
आसा महला 5 ॥ गुर पूरे राखिआ दे हाथ ॥ प्रगटु भइआ जन का परतापु ॥1॥ गुरु गुरु जपी गुरू गुरु धिआई ॥ जीअ की अरदासि गुरू पहि पाई ॥ रहाउ ॥ सरनि परे साचे गुरदेव ॥ पूरन होई सेवक सेव ॥2॥ जीउ पिंडु जोबनु राखै प्रान ॥ कहु नानक गुर कउ कुरबान ॥3॥8॥102॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस सेवक को पूरा गुरू अपना हाथ दे के (विकार आदि से बचा के) रखता है उसकी शोभा-उपमा (सारे जगत में) प्रगट हो जाती है। 1। (हे भाई !) मैं सदा गुरू को ही याद करता हूँ; सदा गुरू का ही ध्यान धरता हूं। गुरू से ही मैं अपने मन की मांगी हुई जरूरतें हासिल करता हूँ।रहाउ। (हे भाई !) जो सेवक सदा स्थिर प्रभू के रूप सतिगुरू का आसरा लेते हैं उनकी सेवा (की मेहनत) सफल हो जाती है। 2। (गुरू शरण पड़े सेवक की) जिंद कोशरीर कोजोबन कोप्राणों को (विकार आदि से) बचा के रखता है। हे नानक ! कह, (हे भाई !) अपना आप गुरू के हवाले कर देना चाहिए3। 8। 102।
आसा घरु 8 काफी महला 5 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मै बंदा बै खरीदु सचु साहिबु मेरा ॥ जीउ पिंडु सभु तिस दा सभु किछु है तेरा ॥1॥ माणु निमाणे तूं धणी तेरा भरवासा ॥ बिनु साचे अन टेक है सो जाणहु काचा ॥1॥ रहाउ ॥ तेरा हुकमु अपार है कोई अंतु न पाए ॥ जिसु गुरु पूरा भेटसी सो चलै रजाए ॥2॥ चतुराई सिआणपा कितै कामि न आईऐ ॥ तुठा साहिबु जो देवै सोई सुखु पाईऐ ॥3॥ जे लख करम कमाईअहि किछु पवै न बंधा ॥ जन नानक कीता नामु धर होरु छोडिआ धंधा ॥4॥1॥103॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा घरु 8 काफी महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! मेरा मालिक सदा कायम रहने वाला है।मैं उसका मूल्य खरीदा ग़ुलाम हूँ। मेरी ये जिंद।मेरा ये शरीर सब कुछ उस मालिक प्रभू का ही दिया हुआ है। हे प्रभू ! मेरे पास जो कुछ भी है सब आपका ही बख्शा हुआ है। 1। हे प्रभू ! मुझ निमाणे का आप ही माण है।मुझे आपका ही भरोसा है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना कोई और झाक टिकी रहे।तो समझो कि वह अभी कमजोर जीवन वाला है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका हुकम बेअंत है।कोई जीव आपके हुकम का अंत नहीं पा सकता। (आपकी मेहर से) जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।वह आपके हुकम में चलता है। 2। (हे भाई ! सुखों की खातिर मनुष्य अनेकों) चतुराईआं और समझदारियां (करता है।पर कोई समझदारी।कोई चतुराई) किसी काम नहीं आती; वही सुख प्राप्त किया जा सकता है जो सुख मालिक प्रभू खुद प्रसन्न हो के देता है। 3। (हे भाई ! दुनियां में सुख-दुखों का चक्कर चलता रहता है।दुखों की निर्वित्ती के वास्ते) अगर लाखों ही (निहित धार्मिक) कर्म किए जाएं तो भी (दुखों की राह में) कोई रोक नहीं पड़ सकती। हे दास नानक ! (कह) मैंने तो परमात्मा के नाम को ही आसरा बनाया है।और (सुखों की खातिर) और दौड़-भाग छोड़ दी है। 4। 1। 103।
आसा महला 5 ॥ सरब सुखा मै भालिआ हरि जेवडु न कोई ॥ गुर तुठे ते पाईऐ सचु साहिबु सोई ॥1॥ बलिहारी गुर आपणे सद सद कुरबाना ॥ नामु न विसरउ इकु खिनु चसा इहु कीजै दाना ॥1॥ रहाउ ॥ भागठु सचा सोइ है जिसु हरि धनु अंतरि ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) मैंने (दुनिया के) सारे सुखों को खोज के देखा है परमात्मा के मिलाप के बराबर का और कोई सुख नहीं।और वह सदा कायम रहने वाला मालिक-परमात्मा प्रसन्न हुए गुरू के द्वारा ही मिल सकता है। 1। (हे भाई !) मैं अपने गुरू से सदा सदके होता हूँ सदा कुर्बान जाता हूँ (मैं गुरू के पास अरजोई करता हूँ-हे गुरू !) मुझे ये दान दे कि मैं परमात्मा का नाम एक छिन वास्ते भी एक पल वास्ते भी ना भुलाऊँ। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम-धन बसता हैं वही (असल) शाहूकार है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य पर गुरू दयावान हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक आनंद पाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।