Lulla Family

अंग ३९५ · आसा

अंग
395
आसा
अंग बदलें या अंश चुनें · ४ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥
  2. नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥
  3. गावि लेहि तू गावनहारे ॥
  4. प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥

करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥

अंग ३९४ से चला आ रहा अंश

करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥
संगि होवत कउ जानत दूरि ॥ सो जनु मरता नित नित झूरि ॥2॥
जिनि सभु किछु दीआ तिसु चितवत नाहि ॥
महा बिखिआ महि दिनु रैनि जाहि ॥3॥
कहु नानक प्रभु सिमरहु एक ॥
गति पाईऐ गुर पूरे टेक ॥4॥3॥97॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को मेहर करके आप अपने नाम के साथ जोड़े रखते हैं, आपकी रजा में चलने से सारे सुख प्राप्त होते हैं।1।रहाउ। (हे भाई !) जो मनुष्य अपने अंग-संग बसते परमात्मा को कहीं दूर बसता समझता है वह सदा (माया की तृष्णा के अधीन) खिझ-खिझ के आत्मिक मौत सहेड़ी रखता है। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा ने हरेक चीज दी है जो मनुष्य उसको याद नहीं करता उस के (जिंदगी के) सारे रात-दिन खासी माया (के मोह) में (फसे हुए ही) गुजरते हैं। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) पूरे गुरू की शरण पड़ के एक परमात्मा को याद करते रहा करो (इस तरह) ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है (और माया की तृष्णा में नहीं फंसते)। 4। 3। 97।

नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥

आसा महला 5 ॥
नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥
कलमल दोख सगल परहरिआ ॥1॥
सोई दिवसु भला मेरे भाई ॥
हरि गुन गाइ परम गति पाई ॥ रहाउ ॥
साध जना के पूजे पैर ॥
मिटे उपद्रह मन ते बैर ॥2॥
गुर पूरे मिलि झगरु चुकाइआ ॥
पंच दूत सभि वसगति आइआ ॥3॥
जिसु मनि वसिआ हरि का नामु ॥
नानक तिसु ऊपरि कुरबान ॥4॥4॥98॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जैसे पानी मिलने से वृक्ष हरा-भरा हो जाता है।वृक्ष में मानो जान वापस आ जाती है वैसे ही) परमात्मा का नाम जपने से (नाम-जल से) मनुष्य का मन मनुष्य का हृदय आत्मिक जीवन वाला हो जाता है (उसके अंदर से) सारे पाप-एैब दूर हो जाते हैं। 1। हे मेरे भाई ! सिर्फ वही दिन (मनुष्य के लिए) बढ़िया होता है जब वह परमात्मा के गुण गा के सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करता है। 1।रहाउ। जो मनुष्य गुरमुखों के पैर पूजता है उसके मन में से सारी छेड़खानियां-उपद्रव सारे वैर-विरोध मिट जाते हैं। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के (अपने अंदर से विकारों का) झगड़ा खत्म कर लिया। कामादिक पाँच वैरी सारे उसके काबू में आ जाते हैं। 3। हे नानक ! (कह) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है उससे सदा सदके होना चाहिए। 4। 4। 98।

गावि लेहि तू गावनहारे ॥

आसा महला 5 ॥
गावि लेहि तू गावनहारे ॥
जीअ पिंड के प्रान अधारे ॥
जा की सेवा सरब सुख पावहि ॥
अवर काहू पहि बहुड़ि न जावहि ॥1॥
सदा अनंद अनंदी साहिबु गुन निधान नित नित जापीऐ ॥
बलिहारी तिसु संत पिआरे जिसु प्रसादि प्रभु मनि वासीऐ ॥ रहाउ ॥
जा का दानु निखूटै नाही ॥
भली भाति सभ सहजि समाही ॥
जा की बखस न मेटै कोई ॥
मनि वासाईऐ साचा सोई ॥2॥
सगल समग्री ग्रिह जा कै पूरन ॥
प्रभ के सेवक दूख न झूरन ॥
ओटि गही निरभउ पदु पाईऐ ॥
सासि सासि सो गुन निधि गाईऐ ॥3॥
दूरि न होई कतहू जाईऐ ॥
नदरि करे ता हरि हरि पाईऐ ॥
अरदासि करी पूरे गुर पासि ॥
नानकु मंगै हरि धनु रासि ॥4॥5॥99॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! जब तक गाने की स्मर्था है उसे गाते रहो जो आपकी जिंद का आसरा है जो आपके शरीर का आसरा है जो आपके प्राणों का आसरा है। जिसकी सेवा-भक्ति करके आप सारे सुख हासिल कर लेगा (और सुखों की तलाश में) किसी और के पास पुनः जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 1। (हे भाई !) उस मालिक प्रभू (के नाम) को सदा ही जपना चाहिए जो सारे गुणों का खजाना है जो सदा आनंद का सोमा है। (हे भाई !) उस प्यारे गुरू को सदके जाना चाहिए जिसकी कृपा से परमात्मा को मन में बसा सकते हैं। 1।रहाउ। जिसकी दी हुई दाति कभी खत्म नहीं होती (और जो-जो उसे मन में बसाते हैं वे) सारे अच्छी तरह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं जिसकी की हुई बख्शिश की राह में कोई रुकावट नहीं डाल सकता हे भाई ! उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ही सदा अपने मन में बसाना चाहिए । 2। जिसके घर में (जीवों के वास्ते) सारे पदार्थ भरे पड़े रहते हैं जिसके सेवकों को कोई दुख कोई झोरे छू नहीं सकते और जिसका आसरा लेने से वह आत्मिक दर्जा मिल जाता है जहाँ कोई डर दबा नहीं सकता। हे भाई ! हरेक सांस के साथ गुणों के खजाने उस प्रभू के गुण गाते रहना चाहिए3। हे भाई ! वह परमात्मा हमसे दूर नहीं बसता।कहीं (दूर) तलाशने जाने की जरूरत नहीं। उसकी प्राप्ति तभी हो सकती है जबवह खुद मेहर की नज़र करे। हे भाई ! मैं तो पूरे गुरू के पास अरदास करता हूँ (और कहता हूँ- हे गुरू ! आपके से) नानक हरि-नाम-धन मांगता है हरि-नाम की पूँजी मांगता है। 4। 5। 99।

प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

आसा महला 5 ॥
प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥
मन सगल कउ होआ सूखु ॥
करि किरपा गुर दीनो नाउ ॥
बलि बलि तिसु सतिगुर कउ जाउ ॥1॥
गुरु पूरा पाइओ मेरे भाई ॥
रोग सोग सभ दूख बिनासे सतिगुर की सरणाई ॥ रहाउ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाए ॥
मन चिंतत सगले फल पाए ॥
अगनि बुझी सभ होई सांति ॥
करि किरपा गुरि कीनी दाति ॥2॥
निथावे कउ गुरि दीनो थानु ॥
निमाने कउ गुरि कीनो मानु ॥
बंधन काटि सेवक करि राखे ॥
अंम्रित बानी रसना चाखे ॥3॥
वडै भागि पूज गुर चरना ॥
सगल तिआगि पाई प्रभ सरना ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू को मिल के सबसे) पहले मेरे शरीर के हरेक दुख मिट गए। फिर मेरे मन को पूर्ण आनंद प्राप्त हुआ। गुरू ने कृपा करके मुझे परमात्मा का नाम दिया। (हे भाई !) मैं उस गुरू से सदा कुर्बान जाता हूँ सदके जाता हूँ। 1। हे मेरे भाई ! जब से मुझे पूरा गुरू मिला है गुरू की शरण पड़ के मेरे सारे रोग सारी चिंता-फिक्र सारे दुख नाश हो गए हैं।रहाउ। (हे भाई ! जब से) मैंने गुरू के चरण अपने हृदय में बसाए हैं मुझे सारे मन-इच्छित फल मिल रहे हैं (मेरे अंदर से तृष्णा की) आग बुझ गर्ह है (मेरे अंदर) पूरी ठंड पड़ गई है। ये सारी दाति गुरू ने ही मेहर करके दी है। 2। मुझे पहले कोई आसरा नहीं था मिलता।गुरू ने मुझे (अपने चरणों में) जगह दी। मुझ निमाणे को गुरू ने आदर दिया है। मेरे (माया के मोह के) बंधन काट के मुझे गुरू ने अपना सेवक बना के अपने चरणों में टिका लिया। अब मेरी जीभ आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी (का रस) चखती रहती है। 3। (हे भाई !) बड़ी किस्मत से मुझे गुरू के चरणों की पूजा (का अवसर मिला जिसकी बरकति से) मैं और सारे आसरे छोड़ के प्रभू की शरण में आ पड़ा हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३९५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English