संगि होवत कउ जानत दूरि ॥ सो जनु मरता नित नित झूरि ॥2॥
जिनि सभु किछु दीआ तिसु चितवत नाहि ॥
महा बिखिआ महि दिनु रैनि जाहि ॥3॥
कहु नानक प्रभु सिमरहु एक ॥
गति पाईऐ गुर पूरे टेक ॥4॥3॥97॥
नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥
कलमल दोख सगल परहरिआ ॥1॥
सोई दिवसु भला मेरे भाई ॥
हरि गुन गाइ परम गति पाई ॥ रहाउ ॥
साध जना के पूजे पैर ॥
मिटे उपद्रह मन ते बैर ॥2॥
गुर पूरे मिलि झगरु चुकाइआ ॥
पंच दूत सभि वसगति आइआ ॥3॥
जिसु मनि वसिआ हरि का नामु ॥
नानक तिसु ऊपरि कुरबान ॥4॥4॥98॥
गावि लेहि तू गावनहारे ॥
जीअ पिंड के प्रान अधारे ॥
जा की सेवा सरब सुख पावहि ॥
अवर काहू पहि बहुड़ि न जावहि ॥1॥
सदा अनंद अनंदी साहिबु गुन निधान नित नित जापीऐ ॥
बलिहारी तिसु संत पिआरे जिसु प्रसादि प्रभु मनि वासीऐ ॥ रहाउ ॥
जा का दानु निखूटै नाही ॥
भली भाति सभ सहजि समाही ॥
जा की बखस न मेटै कोई ॥
मनि वासाईऐ साचा सोई ॥2॥
सगल समग्री ग्रिह जा कै पूरन ॥
प्रभ के सेवक दूख न झूरन ॥
ओटि गही निरभउ पदु पाईऐ ॥
सासि सासि सो गुन निधि गाईऐ ॥3॥
दूरि न होई कतहू जाईऐ ॥
नदरि करे ता हरि हरि पाईऐ ॥
अरदासि करी पूरे गुर पासि ॥
नानकु मंगै हरि धनु रासि ॥4॥5॥99॥
प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥
मन सगल कउ होआ सूखु ॥
करि किरपा गुर दीनो नाउ ॥
बलि बलि तिसु सतिगुर कउ जाउ ॥1॥
गुरु पूरा पाइओ मेरे भाई ॥
रोग सोग सभ दूख बिनासे सतिगुर की सरणाई ॥ रहाउ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाए ॥
मन चिंतत सगले फल पाए ॥
अगनि बुझी सभ होई सांति ॥
करि किरपा गुरि कीनी दाति ॥2॥
निथावे कउ गुरि दीनो थानु ॥
निमाने कउ गुरि कीनो मानु ॥
बंधन काटि सेवक करि राखे ॥
अंम्रित बानी रसना चाखे ॥3॥
वडै भागि पूज गुर चरना ॥
सगल तिआगि पाई प्रभ सरना ॥
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को मेहर करके आप अपने नाम के साथ जोड़े रखता है, आपकी रजा में चलने से सारे सुख प्राप्त होते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।