अंग
397
आसा
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सो छूटै महा जाल ते जिसु गुर सबदु निरंतरि ॥2॥
सो छूटै महा जाल ते जिसु गुर सबदु निरंतरि ॥2॥
गुर की महिमा किआ कहा गुरु बिबेक सत सरु ॥
ओहु आदि जुगादी जुगह जुगु पूरा परमेसरु ॥3॥
नामु धिआवहु सद सदा हरि हरि मनु रंगे ॥
जीउ प्राण धनु गुरू है नानक कै संगे ॥4॥2॥104॥
गुर की महिमा किआ कहा गुरु बिबेक सत सरु ॥
ओहु आदि जुगादी जुगह जुगु पूरा परमेसरु ॥3॥
नामु धिआवहु सद सदा हरि हरि मनु रंगे ॥
जीउ प्राण धनु गुरू है नानक कै संगे ॥4॥2॥104॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य के अंदर गुरू का शबद एक-रस टिका रहे वह मनुष्य (माया के मोह के) बड़े जाल (में फंसने) से बचा रहता है। 2। हे भाई ! मैं ये बताने योग्य नहीं हूँ कि गुरू कितना बड़ा (कितना महान।कितनी उच्च आत्मा) है।गुरू विवेक का सरोवर है गुरू उच्च आचरण का सरोवर है। गुरू उस पूरन परमेश्वर (का रूप) है जो सबका आदि है जो जुगों के आदि से है जो हरेक युग में मौजूद है। 3। हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम सिमरते रहो।अपने मन को परमात्मा के प्रेम रंग से रंगे रखो (ये नाम मिलना गुरू से ही है। वह गुरू) मुझ नानक के अंग-संग बसता है।गुरू ही मेरी जिंद है गुरू ही मेरे प्राण हैं।गुरू ही मेरा धन है। 4। 2। 104।
साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥
आसा महला 5 ॥
साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥
दूखु दरदु रोगु माइ मैडा हभु नसै ॥1॥
हउ वंञा कुरबाणु साई आपणे ॥
होवै अनदु घणा मनि तनि जापणे ॥1॥ रहाउ ॥
बिंदक गालि॑ सुणी सचे तिसु धणी ॥
सूखी हूं सुखु पाइ माइ न कीम गणी ॥2॥
नैण पसंदो सोइ पेखि मुसताक भई ॥
मै निरगुणि मेरी माइ आपि लड़ि लाइ लई ॥3॥
बेद कतेब संसार हभा हूं बाहरा ॥
नानक का पातिसाहु दिसै जाहरा ॥4॥3॥105॥
साई अलखु अपारु भोरी मनि वसै ॥
दूखु दरदु रोगु माइ मैडा हभु नसै ॥1॥
हउ वंञा कुरबाणु साई आपणे ॥
होवै अनदु घणा मनि तनि जापणे ॥1॥ रहाउ ॥
बिंदक गालि॑ सुणी सचे तिसु धणी ॥
सूखी हूं सुखु पाइ माइ न कीम गणी ॥2॥
नैण पसंदो सोइ पेखि मुसताक भई ॥
मै निरगुणि मेरी माइ आपि लड़ि लाइ लई ॥3॥
बेद कतेब संसार हभा हूं बाहरा ॥
नानक का पातिसाहु दिसै जाहरा ॥4॥3॥105॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे माँ ! जब वह बेअंत अलख पति-प्रभू थोड़े से समय के लिए भी मेरे मन में आ बसता है मेरा हरेक दुख-दर्द मेरा हरेक रोग सब दूर हो जाता है। 1। हे माँ ! मैं अपने पति-प्रभू से कुर्बान जाती हूँ। उसका नाम जपने से मेरे मन में मेरे हृदय में आनंद पैदा हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! जब उस सदा कायम रहने वाले मालिक-प्रभू की मैं थोड़ी जितनी भी सिफत सालाह सुनती हूँ तो मैं इतना ऊँचा सुख अनुभव करती हूँ कि मैं उसका मूल्य नहीं बता सकती। 2। हे मेरी माँ ! मेरा वह साई मेरी आँखों को प्यारा लगता है उसे देख के मैं मस्त हो जाती हूँ। हे माँ ! मेरे में कोई गुण नहीं।फिर भी उसने स्वयं ही अपने पल्ले से लगा रखा है। 3। (हे माँ ! वह मेरा बादशाह निरा संसार में ही नहीं बस रहा वह तो) इस दिखते संसार से बाहर भी हर जगह है।बेद-कतेब आदि कोई धर्म-पुस्तक उसका स्वरूप बयान नहीं कर सकते।(वैसे। हे माँ !) मुझ नानक का बादशाह हर जगह प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। 4। 3। 105।
लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥
आसा महला 5 ॥
लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥
कवन जुगति मेलावउ निरगुण बिखई जीउ ॥1॥
तेरी टेक गोविंद गुपाल दइआल प्रभ ॥
तूं सभना के नाथ तेरी स्रिसटि सभ ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सहाई संत पेखहि सदा हजूरि ॥
नाम बिहूनड़िआ से मरनि॑ विसूरि विसूरि ॥2॥
दास दासतण भाइ मिटिआ तिना गउणु ॥
विसरिआ जिन॑ा नामु तिनाड़ा हालु कउणु ॥3॥
जैसे पसु हरि॑आउ तैसा संसारु सभ ॥
नानक बंधन काटि मिलावहु आपि प्रभ ॥4॥4॥106॥
लाख भगत आराधहि जपते पीउ पीउ ॥
कवन जुगति मेलावउ निरगुण बिखई जीउ ॥1॥
तेरी टेक गोविंद गुपाल दइआल प्रभ ॥
तूं सभना के नाथ तेरी स्रिसटि सभ ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सहाई संत पेखहि सदा हजूरि ॥
नाम बिहूनड़िआ से मरनि॑ विसूरि विसूरि ॥2॥
दास दासतण भाइ मिटिआ तिना गउणु ॥
विसरिआ जिन॑ा नामु तिनाड़ा हालु कउणु ॥3॥
जैसे पसु हरि॑आउ तैसा संसारु सभ ॥
नानक बंधन काटि मिलावहु आपि प्रभ ॥4॥4॥106॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! आपके लाखों ही भक्त आपको ‘प्यारा प्यारा’ कह के आपका नाम जपते हैं आपकी आरधना करते हैं (उनके सामने मैं तो) गुणहीन विकारी जीव हूँ। (हे प्रभू !) मैं आपको किस तरीके से मिलूँ। 1। हे गोविंद ! हे गोपाल ! हे दयालु प्रभू ! मुझे आपका ही आसरा है। आप सब जीवों के पति हैं।सारी सृष्टि आपकी ही पैदा की हुई है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप अपने संतों की सहायता करने वाले हैं आपके संत आपको सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। पर जो (भाग्यहीन आपके) नाम से वंचित रहते हैं वह (विकारों में ही) झुर-झुर के आत्मिक मौत सहेड़ी रखते हैं। 2। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपके दासों के दास होने के भाव में टिके रहते हैं उनका जन्म-मरण का चक्कर खत्म हो जाता है। पर जिन (दुर्भाग्यपूर्ण व्यक्तियों) को आपका नाम भूला रहता है उनका हाल बुरा ही बना रहता है। 3। (हे भाई !) जैसे खुला रह के हरी खेती चरने वाला कोई पशु (अवारा भटकता फिरता) है वैसे ही सारा जगत (विकारों के पीछे भटक रहा है)। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! (मेरे विकारों वाले) बंधन काट के मुझे आप अपने चरणों में जोड़े रख। 4। 4। 106।
हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥
आसा महला 5 ॥
हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥
झूठा लाहि गुमानु मनु तनु अरपि धरि ॥1॥
आठ पहर सालाहि सिरजनहार तूं ॥
जीवां तेरी दाति किरपा करहु मूं ॥1॥ रहाउ ॥
सोई कंमु कमाइ जितु मुखु उजला ॥
सोई लगै सचि जिसु तूं देहि अला ॥2॥
जो न ढहंदो मूलि सो घरु रासि करि ॥
हिको चिति वसाइ कदे न जाइ मरि ॥3॥
तिन॑ा पिआरा रामु जो प्रभ भाणिआ ॥
गुर परसादि अकथु नानकि वखाणिआ ॥4॥5॥107॥
हभे थोक विसारि हिको खिआलु करि ॥
झूठा लाहि गुमानु मनु तनु अरपि धरि ॥1॥
आठ पहर सालाहि सिरजनहार तूं ॥
जीवां तेरी दाति किरपा करहु मूं ॥1॥ रहाउ ॥
सोई कंमु कमाइ जितु मुखु उजला ॥
सोई लगै सचि जिसु तूं देहि अला ॥2॥
जो न ढहंदो मूलि सो घरु रासि करि ॥
हिको चिति वसाइ कदे न जाइ मरि ॥3॥
तिन॑ा पिआरा रामु जो प्रभ भाणिआ ॥
गुर परसादि अकथु नानकि वखाणिआ ॥4॥5॥107॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भाई ! सारे (सांसारिक) पदार्थों (का मोह) भुला के सिर्फ एक परमात्मा का ध्यान धर (दुनिया की मल्कियतों का) झूठा गुमान (अपने मन में से) दूर कर दे। अपना मन (परमात्मा के आगे) भेटा कर दे।अपना हृदय (प्रभू चरणों में) भेट कर दे। 1। हे सृजनहार प्रभू ! आठों पहर आपको सालाह के (आपकी सिफत सालाह करके) मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है।मेरे पर मेहर करके मुझे (आपकी सिफत सालाह की) दाति मिल जाए। 1।रहाउ। हे भाई ! वही काम करा कर जिस काम से (लोक-परलोक में) आपका मुंह रौशन रहे।(पर।) हे प्रभू ! आपके सदा कायम रहने वाले नाम में वही मनुष्य जुड़ता है जिसको आप स्वयं ये दाति देते हैं। 2। हे भाई ! (आत्मिक जीवन की रचना वाले) उस (हृदय-) घर को सुंदर बना जो फिर कभी गिर नहीं सकता। हे भाई ! एक परमात्मा को ही अपने चित्त में बसाए रख वह परमात्मा कभी भी नहीं मरता। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा को अच्छे लगने लगते हैं उनको परमात्मा प्यारा लगने लग पड़ता है (पर।ये गुरू की मेहर से ही होता है)। नानक ने गुरू की कृपा से ही उस बेअंत गुणों के मालिक प्रभू की सिफत सालाह करनी शुरू की हुई है। 4। 5। 107।
जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥
आसा महला 5 ॥
जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥
भेदु न जाणहु मूलि सांई जेहिआ ॥1॥
मनु तनु होइ निहालु तुम॑ संगि भेटिआ ॥
सुखु पाइआ जन परसादि दुखु सभु मेटिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जेते खंड ब्रहमंड उधारे तिंन॑ खे ॥
जिन॑ मनि वुठा आपि पूरे भगत से ॥2॥
जिन॑ा न विसरै नामु से किनेहिआ ॥
भेदु न जाणहु मूलि सांई जेहिआ ॥1॥
मनु तनु होइ निहालु तुम॑ संगि भेटिआ ॥
सुखु पाइआ जन परसादि दुखु सभु मेटिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जेते खंड ब्रहमंड उधारे तिंन॑ खे ॥
जिन॑ मनि वुठा आपि पूरे भगत से ॥2॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों को कभी भी परमात्मा का नाम नहीं भूलता (क्या आपको पता है कि) वे कैसे होते हैं। (उनमें और पति-प्रभू में) रत्ती भी फर्क ना समझो।वे पति-प्रभू जैसे हो जाते हैं। 1। (हे प्रभू !) जिन मनुष्यों ने आपके साथ संगति की उनका मन प्रसन्न रहता है। उन्होंने (आपके) सेवक (-गुरू) की कृपा से आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है और अपना सारा दुख मिटा लिया है। 1।रहाउ। उनमे सारे खंड-ब्रहमण्डों को भी (संसार-समुंद्र से) बचा लेने की समर्था प्राप्त कर ली होती है। (हे भाई !) जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा स्वयं आ बसता है वे पूरी तौर पर भगत बन जाते हैं। 2।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३९७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।