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अंग 390

अंग
390
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक पाइआ नाम खजाना ॥4॥27॥78॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से) परमात्मा के नाम का खजाना पा लिया । 4। 27। 78।
आसा महला 5 ॥
ठाकुर सिउ जा की बनि आई ॥
भोजन पूरन रहे अघाई ॥1॥
कछू न थोरा हरि भगतन कउ ॥
खात खरचत बिलछत देवन कउ ॥1॥ रहाउ ॥
जा का धनी अगम गुसाई ॥
मानुख की कहु केत चलाई ॥2॥
जा की सेवा दस असट सिधाई ॥
पलक दिसटि ता की लागहु पाई ॥3॥
जा कउ दइआ करहु मेरे सुआमी ॥
कहु नानक नाही तिन कामी ॥4॥28॥79॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस मनुष्य की प्रीति मालिक प्रभू के साथ पक्की बन जाती है ना-समाप्त होने वाले नाम-भोजन की बरकति से वह (माया की तृष्णा की ओर से सदा) तृप्त रहता है। 1। (हे भाई ! हरी के भक्तों के पास इतना ना खत्म होने वाला नाम-खजाना होता है कि) भक्त जनों को किसी चीज की कमी नहीं होती। वे उस खजाने को स्वयं भी बरतते हैं औरों को भी बाँटते हैं।स्वयं आनंद लेते हैं।और औरों को भी आनंद देने के समर्थ होते हैं। 1।रहाउ। जगत का पति अपहुँच अगम मालिक जिस मनुष्य का (रखवाला) बन जाता है (हे भाई !) बता किसी मनुष्य का उस पर क्या जोर चल सकता है। 2। जिसकी सेवा-भक्ति करने से और जिसकी मेहर की निगाह से अठारहों (ही) करामाती ताकतें मिल जाती हैं (हे भाई !)सदा उसके चरणों में लगे रहो। 3। हे मेरे सवामी ! जिन मनुष्यों पे आप मेहर करता है हे नानक ! कह,उन्हे किसी भी बात की कोई कमी नहीं रहती। 4। 28। 79।
आसा महला 5 ॥
जउ मै अपुना सतिगुरु धिआइआ ॥
तब मेरै मनि महा सुखु पाइआ ॥1॥
मिटि गई गणत बिनासिउ संसा ॥
नामि रते जन भए भगवंता ॥1॥ रहाउ ॥
जउ मै अपुना साहिबु चीति ॥
तउ भउ मिटिओ मेरे मीत ॥2॥
जउ मै ओट गही प्रभ तेरी ॥
तां पूरन होई मनसा मेरी ॥3॥
देखि चलित मनि भए दिलासा ॥
नानक दास तेरा भरवासा ॥4॥29॥80॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जब से मैंने अपने गुरू को अपने मन में बसा लिया है तब से मेरे मन ने बड़ा आनंद प्राप्त किया है। 1। उनकी हरेक चिंता मिट जाती है उनका हरेक सहम दूर हो जाता है। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के नाम रंग में रंगे जाते हैं वह भाग्यशाली हो जाते हें।1।रहाउ। हे मेरे मित्र ! जब से मैंने अपने मालिक को अपने चित्त में (बसाया है) तब से मेरा हरेक किस्म का डर दूर हो गया है। 2। हे प्रभू ! जब से मैंने आपकी ओट पकड़ी है तब से मेरी हरेक मनोकामना पूरी हैं रही है। 3। आपके चरित्र देख-देख के मेरे मन में सहारा बनता जाता है (कि शरण पड़ों की आप सहायता करता है) हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! मुझे आपके) दास को आपका ही भरोसा है । 4। 29। 80।
आसा महला 5 ॥
अनदिनु मूसा लाजु टुकाई ॥
गिरत कूप महि खाहि मिठाई ॥1॥
सोचत साचत रैनि बिहानी ॥
अनिक रंग माइआ के चितवत कबहू न सिमरै सारिंगपानी ॥1॥ रहाउ ॥
द्रुम की छाइआ निहचल ग्रिहु बांधिआ ॥
काल कै फांसि सकत सरु सांधिआ ॥2॥
बालू कनारा तरंग मुखि आइआ ॥
सो थानु मूड़ि निहचलु करि पाइआ ॥3॥
साधसंगि जपिओ हरि राइ ॥
नानक जीवै हरि गुण गाइ ॥4॥30॥81॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! आप माया के मोह के कूएं में लटका हुआ है।जिस रस्सी के आसरे आप लटका हुआ है उस) लॅज (रस्सी) को हर रोज चूहा कुतर रहा है (उम्र की लॅज को जम-चूहा कुतरता जा रहा है। पर) आप कूएं में गिरा हुआ भी मिठाई खाए जा रहा है (दुनिया के पदार्थ खाने में मगन है)। 1। माया की सोचें सोचते हुए ही मनुष्य की (जिंदगी की सारी) रात बीत जाती है। मनुष्य माया के ही अनेकों रंग-तमाशे सोचता रहता है और परमात्मा को कभी भी नहीं सिमरता। 1।रहाउ। (माया के मोह में फस के मनुष्य इतना मूर्ख हो जाता है कि) वृक्ष की छाया को पक्का घर मान बैठता है। मनुष्य काल (आत्मिक मौत) की फासी में (जाल में) फंसा हुआ है।ऊपर से माया ने (उस पर) तृष्णा (मोह का) तीर कसा हुआ है। 2। (ये जगत-वासा।मानो।) रेतीला किनारा (जो दरिया की) लहरों के मुंह में आया हुआ है (पर माया के मोह में फसे हुए) मूर्ख ने इस जगह को पक्का समझा हुआ है। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य ने साध-संगत में टिक के प्रभू-पातशाह का नाम जपा है वह परमातमा के गुण गा गा के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 4। 30। 81।
आसा महला 5 दुतुके 9 ॥
उन कै संगि तू करती केल ॥
उन कै संगि हम तुम संगि मेल ॥
उन॑ कै संगि तुम सभु कोऊ लोरै ॥
ओसु बिना कोऊ मुखु नही जोरै ॥1॥
ते बैरागी कहा समाए ॥
तिसु बिनु तुही दुहेरी री ॥1॥ रहाउ ॥
उन॑ कै संगि तू ग्रिह महि माहरि ॥
उन॑ कै संगि तू होई है जाहरि ॥
उन॑ कै संगि तू रखी पपोलि ॥
ओसु बिना तूं छुटकी रोलि ॥2॥
उन॑ कै संगि तेरा मानु महतु ॥
उन॑ कै संगि तुम साकु जगतु ॥
उन॑ कै संगि तेरी सभ बिधि थाटी ॥
ओसु बिना तूं होई है माटी ॥3॥
ओहु बैरागी मरै न जाइ ॥
हुकमे बाधा कार कमाइ ॥
जोड़ि विछोड़े नानक थापि ॥
अपनी कुदरति जाणै आपि ॥4॥31॥82॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 दुतुके 9 ॥ हे काया ! जीवात्मा की संगति में रह के आप (कई तरह के) खेल-तमाशे करती रहती है। सभी से आपका मेल मिलाप बना रहता है। हर कोई आपको मिलना चाहता है। पर उस जीवात्मा के मिलाप के बिना आपको कोई मुंह नहीं लगाता। 1। हे काया ! उस (जीवात्मा) के बिना आप दुखी हैं जाती है। पता नहीं लगता वह जीवात्मा आपसे उपराम हैं के कहां चली जाती है। 1।रहाउ। हे काया ! जब तक आप जीवात्मा के साथ थी आप समझदार (समझी जाती है। हर जगह) आप उजागर होती है। आपको पाल-पोस के रखते हैं। पर जब वह जीवात्मा (आपसे दूर) चली जाती है तो आप छॅुटड़ हैं जाती है किसी काम की नहीं रह जाती। 2। हे काया ! जीवात्मा के साथ होते हुए आपका आदर-मान होता है आपको महिमा मिलती है। सारा जगत आपका साक-संबंधी प्रतीत होता है। आपकी हर जगह पालणा की जाती है। पर जब उस जीवात्मा से आप विछुड़ जाती है तो आप मिट्टी में मिल जाती है। 3। काया में से उपराम हैं के चले जाने वाली जीवात्मा (अपने आप) ना मरती है ना पैदा होती है (वह तो परमात्मा के) हुकम में बंधी हुई (काया में आने और फिर इस में से चले जाने की) कार करती है। हे नानक ! (कह, जीवात्मा के भी क्या वश।परमात्मा) मनुष्य का शरीर बना के (जीवात्मा और काया का जोड़ जोड़ता है) जोड़ के फिर विछोड़ देता है। (जीवात्मा और काया को जोड़ने-विछोड़ने की) अपनी अजब खेल को परमात्मा खुद ही जानता है। 4। 31। 82।
आसा महला 5 ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से) परमात्मा के नाम का खजाना पा लिया।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।