ठाकुर सिउ जा की बनि आई ॥
भोजन पूरन रहे अघाई ॥1॥
कछू न थोरा हरि भगतन कउ ॥
खात खरचत बिलछत देवन कउ ॥1॥ रहाउ ॥
जा का धनी अगम गुसाई ॥
मानुख की कहु केत चलाई ॥2॥
जा की सेवा दस असट सिधाई ॥
पलक दिसटि ता की लागहु पाई ॥3॥
जा कउ दइआ करहु मेरे सुआमी ॥
कहु नानक नाही तिन कामी ॥4॥28॥79॥
जउ मै अपुना सतिगुरु धिआइआ ॥
तब मेरै मनि महा सुखु पाइआ ॥1॥
मिटि गई गणत बिनासिउ संसा ॥
नामि रते जन भए भगवंता ॥1॥ रहाउ ॥
जउ मै अपुना साहिबु चीति ॥
तउ भउ मिटिओ मेरे मीत ॥2॥
जउ मै ओट गही प्रभ तेरी ॥
तां पूरन होई मनसा मेरी ॥3॥
देखि चलित मनि भए दिलासा ॥
नानक दास तेरा भरवासा ॥4॥29॥80॥
अनदिनु मूसा लाजु टुकाई ॥
गिरत कूप महि खाहि मिठाई ॥1॥
सोचत साचत रैनि बिहानी ॥
अनिक रंग माइआ के चितवत कबहू न सिमरै सारिंगपानी ॥1॥ रहाउ ॥
द्रुम की छाइआ निहचल ग्रिहु बांधिआ ॥
काल कै फांसि सकत सरु सांधिआ ॥2॥
बालू कनारा तरंग मुखि आइआ ॥
सो थानु मूड़ि निहचलु करि पाइआ ॥3॥
साधसंगि जपिओ हरि राइ ॥
नानक जीवै हरि गुण गाइ ॥4॥30॥81॥
उन कै संगि तू करती केल ॥
उन कै संगि हम तुम संगि मेल ॥
उन॑ कै संगि तुम सभु कोऊ लोरै ॥
ओसु बिना कोऊ मुखु नही जोरै ॥1॥
ते बैरागी कहा समाए ॥
तिसु बिनु तुही दुहेरी री ॥1॥ रहाउ ॥
उन॑ कै संगि तू ग्रिह महि माहरि ॥
उन॑ कै संगि तू होई है जाहरि ॥
उन॑ कै संगि तू रखी पपोलि ॥
ओसु बिना तूं छुटकी रोलि ॥2॥
उन॑ कै संगि तेरा मानु महतु ॥
उन॑ कै संगि तुम साकु जगतु ॥
उन॑ कै संगि तेरी सभ बिधि थाटी ॥
ओसु बिना तूं होई है माटी ॥3॥
ओहु बैरागी मरै न जाइ ॥
हुकमे बाधा कार कमाइ ॥
जोड़ि विछोड़े नानक थापि ॥
अपनी कुदरति जाणै आपि ॥4॥31॥82॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (जिस मनुष्य ने गुरू की कृपा से) परमात्मा के नाम का खजाना पा लिया।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।