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अंग 391

अंग
391
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ना ओहु मरता ना हम डरिआ ॥
ना ओहु बिनसै ना हम कड़िआ ॥
ना ओहु निरधनु ना हम भूखे ॥
ना ओसु दूखु न हम कउ दूखे ॥1॥
अवरु न कोऊ मारनवारा ॥
जीअउ हमारा जीउ देनहारा ॥1॥ रहाउ ॥
ना उसु बंधन ना हम बाधे ॥
ना उसु धंधा ना हम धाधे ॥
ना उसु मैलु न हम कउ मैला ॥
ओसु अनंदु त हम सद केला ॥2॥
ना उसु सोचु न हम कउ सोचा ॥
ना उसु लेपु न हम कउ पोचा ॥
ना उसु भूख न हम कउ त्रिसना ॥
जा उहु निरमलु तां हम जचना ॥3॥
हम किछु नाही एकै ओही ॥
आगै पाछै एको सोई ॥
नानक गुरि खोए भ्रम भंगा ॥
हम ओइ मिलि होए इक रंगा ॥4॥32॥83॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! हम जीवोंकी परमात्मा से अलग कोई हस्ती नहीं।वह स्वयं ही जीवात्मा-रूप में शरीरों के अंदर बरत रहा है) वह परमात्मा कभी मरता नहीं (हमारे अंदर भी वह स्वयं ही है) हमें भी मौत से डर नहीं होना चाहिए। वह परमात्मा कभी नाश नहीं होता।हमें भी (विनाश की) कोई चिंता नहीं होनी। वह प्रभू कंगाल नहीं।हम भी अपने आप को भूखे-गरीब ना समझें। उसे कोई दुख नहीं छूता।हमें भी कोई दुख नहीं छूना चाहिए। 1। उसके बिना और कोई हमें मारने कीताकत नहीं रखता। (हे भाई !) जीता रहे हमें जिंद देने वाला परमात्मा (परमात्मा स्वयं सदा कायम रहने वाला है।वही हम जीवों को जिंद देने वाला है। 1।रहाउ। उस परमात्मा को माया के बंधन जकड़ नहीं सकते (इस वास्ते असल में) हम भी माया के मोह में बंधे हुए नहीं हैं। उसे कोई मायावी दौड़-भाग ग्रस नहीं सकती।हम भी धंधों में ग्रसे हुए नहीं हैं। (हमारे असल) उस परमात्मा को विकारों की मैल नहीं लग सकती।हमें भी मैल नहीं लगनी चाहिए। उसे सदा आनंद ही आनंद है।हम भी सदा (आनंद में) खिले ही रहें। 2। (हे भाई !) उस परमात्मा को चिंता-फिक्र नहीं व्याप्तता (हमारे अंदरवह स्वयं ही है) हमें भी कोई फिक्र नहीं होना चाहिए। उस पर माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।फिर हमारे ऊपर क्यों पड़े। उस परमात्मा को माया का मालिक नहीं दबा सकता।हमें भी माया की तृष्णा नहीं व्यापनी चाहिए। जब वह परमात्मा पवित्र-स्वरूप है (वही हमारे अंदर मौजूद है) तो हम भी शुद्ध स्वरूप ही होने चाहिए। 3। (हे भाई !) हमारा कोई अलग अस्तित्व नहीं है (सब में) वह परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। इस लोक में और परलोक में हर जगह वह परमात्मा खुद ही खुद है। हे नानक ! जब गुरू ने (हमारे अंदर से हमारी निहित अलग हस्ती के) भरम दूर कर दिए जो (हमारे उससे एक-रूप होने के राह में) विघन (डाल रहे हैं)। तब हम उस (परमात्मा से) मिल के उस से एक-मेक हो जाते हैं। 4। 32। 83।
आसा महला 5 ॥
अनिक भांति करि सेवा करीऐ ॥
जीउ प्रान धनु आगै धरीऐ ॥
पानी पखा करउ तजि अभिमानु ॥
अनिक बार जाईऐ कुरबानु ॥1॥
साई सुहागणि जो प्रभ भाई ॥
तिस कै संगि मिलउ मेरी माई ॥1॥ रहाउ ॥
दासनि दासी की पनिहारि ॥
उन॑ की रेणु बसै जीअ नालि ॥
माथै भागु त पावउ संगु ॥
मिलै सुआमी अपुनै रंगि ॥2॥
जाप ताप देवउ सभ नेमा ॥
करम धरम अरपउ सभ होमा ॥
गरबु मोहु तजि होवउ रेन ॥
उन॑ कै संगि देखउ प्रभु नैन ॥3॥
निमख निमख एही आराधउ ॥
दिनसु रैणि एह सेवा साधउ ॥
भए क्रिपाल गुपाल गोबिंद ॥
साधसंगि नानक बखसिंद ॥4॥33॥84॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे माँ ! (प्रभू को प्यारी हो चुकी सत्संगी जीव-स्त्री की) सेवा अनेक प्रकार से करनी चाहिए। ये जिंद ये प्राण और (अपना) धन (सब कुछ) उसके आगे रख देना चाहिए (हे माँ ! अगर मेरे पर कृपा हो तो) मैं भी अहंकार त्याग के उसका पानी ढोने और उसको पंखा करने की सेवा करूँ। (उस जीव-स्त्री से) अनेकों बार सदके होना चाहिए। 1। हे मेरी माँ ! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी लग जाती है वही सुहागन बन जाती है। (अगर मेरे पर मेहर हो।अगर मेरे भाग्य जागें तो) मैं भी उस सुहागनि की संगति में मिल के बैठूँ। 1।रहाउ। मैं उन सुहागिनों की संगति हासिल करूँ।उनकी दासियों की पानी ढोने वाली बनूँ। उन सुहागनों की चरन-धूड़ मेरी जिंद के साथ टिकी रहे। हे माँ ! मेरे माथे पर (पूर्बले कर्मों के) भाग्य जाग पड़ें तो पति-प्रभू अपने प्रेम रंग में आ के मिल पड़ता है। 2। (लोग देवताओं आदि को वश में करने के लिए कई मंत्रों आदि के जाप करते हैं।कई जंगलों में जा के धूड़ियां तपाते हैं।एवं अनेकों किस्म के साधन करते हैं।कई लोग तीर्थ-स्नान आदि निहित धार्मिक कर्म करते हैं।यज्ञ-हवन आदि करते हैं।पर।हे माँ ! उन सुहागिनों की संगत के बदले में) मैं सारे जाप।सारे ताप व अन्य सारे साधन देने को तैयार हूँ। सारे (निहित) धार्मिक कर्म।सारे यज्ञ-हवन भेट करने को तैयार हूँ। (मेरी ये तमन्ना है कि) अहंकार छोड़ के।मोह त्याग के मैं उन सुहागिनों की चरण-धूड़ बन जाऊँ (क्योंकि। हे माँ !) उन सुहागिनों की संगति में रह के ही मैं प्रभू-पति को इन आँखों से देख सकूँगी। 3। (हे माँ !) मैं पल-पल यही मन्नत माँगती हूँ (कि मुझे उन सुहागिनों की संगति मिले और) मैं दिन-रात उनकी सेवा का साधन करती रहूँ। बख्शनहार गोपाल गोबिंद-प्रभू जी उस पर दयाल हो जाते हैं हे नानक ! जो जीव-स्त्री साध-संगति में जा पहुँचती है । 4। 33। 84।
आसा महला 5 ॥
प्रभ की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
प्रभ की प्रीति दुखु लगै न कोइ ॥
प्रभ की प्रीति हउमै मलु खोइ ॥
प्रभ की प्रीति सद निरमल होइ ॥1॥
सुनहु मीत ऐसा प्रेम पिआरु ॥
जीअ प्रान घट घट आधारु ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ की प्रीति भए सगल निधान ॥
प्रभ की प्रीति रिदै निरमल नाम ॥
प्रभ की प्रीति सद सोभावंत ॥
प्रभ की प्रीति सभ मिटी है चिंत ॥2॥
प्रभ की प्रीति इहु भवजलु तरै ॥
प्रभ की प्रीति जम ते नही डरै ॥
प्रभ की प्रीति सगल उधारै ॥
प्रभ की प्रीति चलै संगारै ॥3॥
आपहु कोई मिलै न भूलै ॥
जिसु क्रिपालु तिसु साधसंगि घूलै ॥
कहु नानक तेरै कुरबाणु ॥
संत ओट प्रभ तेरा ताणु ॥4॥34॥85॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मित्र ! (जो मनुष्य) परमात्मा की प्रीति (अपने दिल में बसाता है उसे) सदा आत्मिक आनंद मिला रहता है। (उसको) कोई दुख नहीं व्याप सकता। (वह मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर लेता है। (ये प्रीति उसे) सदा पवित्र जीवन वाला बनाए रखती है। 1। हे मित्र ! सुनो।(परमात्मा के साथ डाला हुआ) प्रेम-प्यार ऐसी दाति है कि ये हरेक जीव की जिंद की।हरेक जीव के प्राणों का आसरा बन जाता है। 1।रहाउ। हे मित्र ! (जिस मनुष्य के दिल में) परमात्मा की प्रीति (आ बसी उसको।मानो) सारे खजाने (प्राप्त) हो गए। उसके हृदय में (जीवन को) पवित्र करने वाला हरी-नाम (आ बसता है)। (वह लोक परलोक में) सदा शोभा-महिमा वाला बना रहता है। उसकी हरेक किस्म की चिंता मिट जाती है। 2। हे मित्र ! (जिस मनुष्य के हृदय में) परमात्मा की प्रीति (आ बसती है) वह इस संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह जम-दूतों से भय नहीं खाता (उसको आत्मिक मौत नहीं छू सकती। वह खुद विकारों से बचा रहता है और) अन्य सभी को (विकारों से) बचा लेता है। (हे मित्र !) परमात्मा की प्रीति (ही एक ऐसी राशि-पूँजी है जो) सदा मनुष्य का साथ देती है। 3।(पर। हे मित्र ! परमात्मा के साथ प्रीति जोड़नी किसी मनुष्य के अपने बस की बात नहीं) अपने उद्यम से ना कोई मनुष्य (परमात्मा के चरणों में) जुड़ा रह सकता है और ना ही कोई (विछुड़ के) कुमार्ग पर पड़ता है जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है उसे साध-संगति में मिलाता है (और।साध-संगति में टिक के वह परमात्मा के साथ प्यार डालना सीख लेता है)। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! मैं आपसे कुर्बान जाता हूँ। आप ही संतों की ओट है।आप ही संतों का तान-बल है। 4। 34। 85।
आसा महला 5 ॥
भूपति होइ कै राजु कमाइआ ॥
करि करि अनरथ विहाझी माइआ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! अगर किसी ने) राजा बन के राज (का आनंद भी) भोग लिया (लोगों पे) ज्यादतियां कर-कर के माल-धन भी जोड़ लिया।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई ! हम जीवोंकी परमात्मा से अलग कोई हस्ती नहीं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।