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अंग 388

अंग
388
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दिनु रैणि तेरा नामु वखाना ॥1॥
मै निरगुन गुणु नाही कोइ ॥
करन करावनहार प्रभ सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मूरख मुगध अगिआन अवीचारी ॥
नाम तेरे की आस मनि धारी ॥2॥
जपु तपु संजमु करम न साधा ॥
नामु प्रभू का मनहि अराधा ॥3॥
किछू न जाना मति मेरी थोरी ॥
बिनवति नानक ओट प्रभ तोरी ॥4॥18॥69॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पर आपकी ही मेहर से) मैं दिन-रात आपका (ही) नाम उचारता हूँ। 1। हे प्रभू ! मैं गुणहीन हूँ।मेरे में कोई गुण नहीं (जिसके आसरे मैं आपको प्रसन्न करने की आस कर सकूँ। पर) हे प्रभू ! वह आप ही है जो (सब जीवों में व्यापक हैं के स्वयं ही) सब कुछ करने की ताकत रखता है और (सब जीवों को प्रेरित करके उनसे) करवाने की समर्था वाला है (मुझे भी खुद ही अपने चरणों में जोड़े रख)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं मूर्ख हूँ।मैं मति हीन हूँ।मैं ज्ञानहीन हूँ।मैं बेसमझ हूँ (पर आप अपने बिरद की लाज रखने वाला है)। मैंने आपके (बिरद-पाल) नाम की आस मन में रखी हुई है (कि आप शरण आए की लाज रखेगा)। 2। हे भाई ! मैंने कोई जप नहीं किया।मैंने कोई तप नहीं किया।मैंने कोई संजम नहीं साधा (मुझे किसी जप तपसंजम का सहारा नहीं। का गुमान नहीं) मैं तो परमातमा का नाम ही अपने मन में याद करता रहता हूँ। 3। नानक बिनती करता है, हे प्रभू ! (कोई उक्ति।कोई समझदारी।कोई जप।कोई तप।कोई संजम) कुछ भी करना नहीं जानता।मेरी अक्ल बहुत थोड़ी सी है। मैंने सिर्फ आपका ही आसरा लिया है। 4। 18। 69।
आसा महला 5 ॥
हरि हरि अखर दुइ इह माला ॥
जपत जपत भए दीन दइआला ॥1॥
करउ बेनती सतिगुर अपुनी ॥
करि किरपा राखहु सरणाई मो कउ देहु हरे हरि जपनी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि माला उर अंतरि धारै ॥
जनम मरण का दूखु निवारै ॥2॥
हिरदै समालै मुखि हरि हरि बोलै ॥
सो जनु इत उत कतहि न डोलै ॥3॥
कहु नानक जो राचै नाइ ॥
हरि माला ता कै संगि जाइ ॥4॥19॥70॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! मेरे पास तो) ‘हरि हरि’ – इन दो शब्दों की माला है। इस हरि-नाम-माला को जपते-जपते कंगालों पर भी परमात्मा दयावान हो जाता है। 1। हे सतिगुरू ! मैं आपके आगे अपनी ये अर्ज करता हूँ कि कृपा करके मुझे अपनी शरण में रख और मुझे ‘हरि हरि’ नाम की माला दे। 1।रहाउ। जो मनुष्य हरि-नाम की माला अपने हृदय में टिका के रखता है। वह अपने जनम-मरण के चक्कर का दुख दूर कर लेता है। 2। जो मनुष्य हरि नाम को अपने हृदय में संभाल के रखता है और मुंह से हरि हरि नाम उचारता रहता है वह ना इस लोक में ना ही परलोक में कही भी (किसी बात पर भी) नहीं डोलता। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। हरि-नाम की माला उस के साथ (परलोक में भी) जाती है। 4। 19। 70।
आसा महला 5 ॥
जिस का सभु किछु तिस का होइ ॥
तिसु जन लेपु न बिआपै कोइ ॥1॥
हरि का सेवकु सद ही मुकता ॥
जो किछु करै सोई भल जन कै अति निरमल दास की जुगता ॥1॥ रहाउ ॥
सगल तिआगि हरि सरणी आइआ ॥
तिसु जन कहा बिआपै माइआ ॥2॥
नामु निधानु जा के मन माहि ॥
तिस कउ चिंता सुपनै नाहि ॥3॥
कहु नानक गुरु पूरा पाइआ ॥
भरमु मोहु सगल बिनसाइआ ॥4॥20॥71॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य) उस परमात्मा का (सेवक) बना रहता है जिसका ये सारा जगत रचा हुआ है उस मनुष्य पर माया का किसी तरह का भी प्रभाव नहीं पड़ सकता। 1। (हे भाई !) परमात्मा का भक्त सदा ही (माया के मोह के बंधनों से) आजाद रहता है। परमात्मा जो कुछ करता है सेवक को वह सदा भलाई ही भलाई प्रतीत होती है।सेवक की जीवन-शैली बहुत ही पवित्र होती है। 1।रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य और) सारे (आसरे) छोड़ के परमात्मा की शरण आ पड़ता है। माया उस मनुष्य पर कभी अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम-खजाना टिका रहता है उसे कभी भी कोई चिंता छू नहीं सकती। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य पूरा गुरू ढूँढ लेता है उसके अंदर से (माया की खातिर) भटकना दूर हो जाती है (उसके मन में से माया का) सारा मोह दूर हो जाता है। 4। 20। 71।
आसा महला 5 ॥
जउ सुप्रसंन होइओ प्रभु मेरा ॥
तां दूखु भरमु कहु कैसे नेरा ॥1॥
सुनि सुनि जीवा सोइ तुम॑ारी ॥
मोहि निरगुन कउ लेहु उधारी ॥1॥ रहाउ ॥
मिटि गइआ दूखु बिसारी चिंता ॥
फलु पाइआ जपि सतिगुर मंता ॥2॥
सोई सति सति है सोइ ॥
सिमरि सिमरि रखु कंठि परोइ ॥3॥
कहु नानक कउन उह करमा ॥
जा कै मनि वसिआ हरि नामा ॥4॥21॥72॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) जब मेरा प्रभू (किसी मनुष्य पर) बहुत प्रसन्न होता है तब बताओ कोई दुख-भ्रम उस मनुष्य के नजदीक कैसे आ सकता है। 1। (हे मेरे प्रभू !) आपकी शोभा (महिमा) सुन-सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। (हे मेरे प्रभू ! मेहर कर) मुझ गुण-हीन को (दुखों-भ्रमों से) बचाए रख। 1।रहाउ। (मेरे) अंदर से हरेक किस्म का दुख दूर हो गया है।मैंने (हरेक किस्म की) चिंता भुला दी है (हे भाई !) सतिगुरू की बाणी जपके मैंने ये फल प्राप्त कर लिया है । 2। (हे भाई !) वह परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला है वह परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है। उसे सदा सिमरता रह।उस (के नाम) को अपने गले में परो के रख (जैसे फूलों का हार गले में डालते हैं)। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसे। और वह कौन सा (निहित धार्मिक) कर्म (रह जाता है जो उसे करना चाहिए।)। 4। 21। 72।
आसा महला 5 ॥
कामि क्रोधि अहंकारि विगूते ॥
हरि सिमरनु करि हरि जन छूटे ॥1॥
सोइ रहे माइआ मद माते ॥
जागत भगत सिमरत हरि राते ॥1॥ रहाउ ॥
मोह भरमि बहु जोनि भवाइआ ॥
असथिरु भगत हरि चरण धिआइआ ॥2॥
बंधन अंध कूप ग्रिह मेरा ॥
मुकते संत बुझहि हरि नेरा ॥3॥
कहु नानक जो प्रभ सरणाई ॥
ईहा सुखु आगै गति पाई ॥4॥22॥73॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! माया-ग्रसित जीव) काम में।क्रोध में।अहंकार में (फस के) दुखी होते रहते हैं। परमातमा के सेवक परमात्मा के नाम का सिमरन करके (काम-क्रोध-अहंकार आदि से) बचे रहते हैं। 1। (हे भाई ! माया में ग्रसित जीव) माया के नशे में मस्त हो के (आत्मिक जीवन के पक्ष से) सोए रहते हैं (बेपरवाह टिके रहते हैं)। पर परमात्मा की भक्ति करने वाले मनुष्य प्रभू नाम का सिमरन करते हुए (हरि-नाम-रंग में) रंग के (माया के हमलों की तरफ़ से) सचेत रहते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! माया के) मोह की भटकना में पड़ के मनुष्य अनेकों जूनियों में भटकते रहते हैं पर भगत जन परमात्मा के चरणों का ध्यान धरते हैं वह (जनम-मरण के चक्कर से) अडोल रहते हैं। 2। (हे भाई !) ये घर मेरा है।ये घर मेरा है, इस मोह के अंधे कूएं के बंधनों से वे संत-जन आजाद रहते हैं जो परमात्मा को (हर वक्त) अपने नजदीक बसता समझते हैं। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है वह इस लोक में आत्मिक आनंद भोगता है। परलोक में भी वह उच्च आत्मिक अवस्था हासिल किए रहता है। 4। 22। 73।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “पर आपकी ही मेहर से) मैं दिन-रात आपका (ही) नाम उचारता हूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।