अंग
387
आसा
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राम रामा रामा गुन गावउ ॥
राम रामा रामा गुन गावउ ॥
संत प्रतापि साध कै संगे हरि हरि नामु धिआवउ रे ॥1॥ रहाउ ॥
सगल समग्री जा कै सूति परोई ॥
घट घट अंतरि रविआ सोई ॥2॥
ओपति परलउ खिन महि करता ॥
आपि अलेपा निरगुनु रहता ॥3॥
करन करावन अंतरजामी ॥
अनंद करै नानक का सुआमी ॥4॥13॥64॥
संत प्रतापि साध कै संगे हरि हरि नामु धिआवउ रे ॥1॥ रहाउ ॥
सगल समग्री जा कै सूति परोई ॥
घट घट अंतरि रविआ सोई ॥2॥
ओपति परलउ खिन महि करता ॥
आपि अलेपा निरगुनु रहता ॥3॥
करन करावन अंतरजामी ॥
अनंद करै नानक का सुआमी ॥4॥13॥64॥
हिन्दी अर्थ: मैं परमातमा के सुंदर गुण गाता रहता हूँ। हे भाई ! गुरू के बख्शे प्रताप की बरकति से गुरू की संगति में रहके मैं सदा परमात्मा का नाम सिमरता रहता हूँ 1।रहाउ। (हे भाई ! गुरू के बख्शे प्रताप की बरकति से मुझे यह निश्चय है कि) जिस (की रजा) के धागे में सारे पदार्थ परोए हुए हैं। वह परमात्मा ही हरेक शरीर के अंदर बस रहा है2। (हे भाई ! गुरू की संगति में टिके रहने के सदका अब मैं जानता हूँ कि) परमात्मा एक पल में सारे जगत की उत्पत्ति और नाश कर सकता है। (सारे जगत में व्यापक होता हुआ भी) प्रभू स्वयं सबसे अलग रहता है और माया के तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त है। 3। (हे भाई ! गुरू के प्रताप की बरकति से मुझे ये यकीन बन गया है कि) हरेक के दिल की जानने वाला परमात्मा (सब में व्यापक हो के) सब कुछ करने व जीवों से करवाने की स्मर्था रखता है (इतनाव्यस्त होते हुए भी) मुझ नानक का पति-प्रभू सदा प्रसन्न रहता है। 4। 13। 64।
कोटि जनम के रहे भवारे ॥
आसा महला 5 ॥
कोटि जनम के रहे भवारे ॥
दुलभ देह जीती नही हारे ॥1॥
किलबिख बिनासे दुख दरद दूरि ॥
भए पुनीत संतन की धूरि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ के संत उधारन जोग ॥
तिसु भेटे जिसु धुरि संजोग ॥2॥
मनि आनंदु मंत्रु गुरि दीआ ॥
त्रिसन बुझी मनु निहचलु थीआ ॥3॥
नामु पदारथु नउ निधि सिधि ॥
नानक गुर ते पाई बुधि ॥4॥14॥65॥
कोटि जनम के रहे भवारे ॥
दुलभ देह जीती नही हारे ॥1॥
किलबिख बिनासे दुख दरद दूरि ॥
भए पुनीत संतन की धूरि ॥1॥ रहाउ ॥
प्रभ के संत उधारन जोग ॥
तिसु भेटे जिसु धुरि संजोग ॥2॥
मनि आनंदु मंत्रु गुरि दीआ ॥
त्रिसन बुझी मनु निहचलु थीआ ॥3॥
नामु पदारथु नउ निधि सिधि ॥
नानक गुर ते पाई बुधि ॥4॥14॥65॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जिनको संत जनों की चरण-धूड़ प्राप्त हुई।उनके) करोड़ों जन्मों के चक्कर खत्म हो गए। उन्होंने मुश्किल से मिले इस मानस जनम की बाजी जीत ली।(उन्होंने माया के हाथों) हार नहीं खाई। 1। (हे भाई ! उनके सारे) पाप नष्ट हो गए, दुख कलेश दूर हो गए। जिन अति भाग्यशाली मनुष्यों को) संत जनों की चरण धूड़ (मिल गई वह) पवित्र जीवन वाले हो गए। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की भक्ति करने वाले संत-जन औरों को भी विकारों से बचाने की स्मर्था रखते हैं। पर संत-जन मिलते सिर्फ उस मनुष्य को ही हैं जिसके भाग्यों में धुर-दरगाह से मिलाप के लेख लिखे होते हैं। 2। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) गुरू ने उपदेश दे दिया उसके मन में (सदा) आनंद बना रहता है। (उसके अंदर से माया की) तृष्णा (की आग) बुझ जाती है।उसका मन (माया के हमलों के मुकाबले में) डोलने से हट जाता है। 3। उसे सबसे कीमती पदार्थ परमात्मा का नाम मिल जाता है, दुनिया के सारे नौ खजाने मिल जाते हैं और करामाती ताकतें प्राप्त हो जाती हैं (भाव।उसे दुनिया के धन-पदार्थ और रिद्धियों-सिद्धियों की लालसा नहीं रह जाती)। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू से (सही आत्मिक जीवन की) सूझ प्राप्त कर ली4। 14। 65।
मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥
आसा महला 5 ॥
मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥
साध सेवा अघ कटे घनेरे ॥1॥
सूख सहज आनंदु घना ॥
गुर सेवा ते भए मन निरमल हरि हरि हरि हरि नामु सुना ॥1॥ रहाउ ॥
बिनसिओ मन का मूरखु ढीठा ॥
प्रभ का भाणा लागा मीठा ॥2॥
गुर पूरे के चरण गहे ॥
कोटि जनम के पाप लहे ॥3॥
रतन जनमु इहु सफल भइआ ॥
कहु नानक प्रभ करी मइआ ॥4॥15॥66॥
मिटी तिआस अगिआन अंधेरे ॥
साध सेवा अघ कटे घनेरे ॥1॥
सूख सहज आनंदु घना ॥
गुर सेवा ते भए मन निरमल हरि हरि हरि हरि नामु सुना ॥1॥ रहाउ ॥
बिनसिओ मन का मूरखु ढीठा ॥
प्रभ का भाणा लागा मीठा ॥2॥
गुर पूरे के चरण गहे ॥
कोटि जनम के पाप लहे ॥3॥
रतन जनमु इहु सफल भइआ ॥
कहु नानक प्रभ करी मइआ ॥4॥15॥66॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य हरी नाम सुनते हैं उनके अंदर से पहले) अज्ञानता के अंधेरे के कारण पैदा हुई माया की तृष्णा मिट जाती है। गुरू की (बताई) सेवा के कारण उनके अनेकों ही पाप कट जाते हैं। 1। उन्हें बड़ा सुख आनंद प्राप्त होता है (उनके अंदर) आत्मिक अडोलता बनी रहती है। (हे भाई ! जो मनुष्य) सदा परमात्मा का नाम सुनते रहते हैं (सिफत सालाह करते सुनते रहते हैं) गुरू द्वारा बताई (इस) सेवा की बरकति से उनके मन पवित्र हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! हरि नाम सुनने वालों के) मन की मूर्खता और ढीठता नाश हो जाती है। उन्हें परमात्मा की रजा प्यारी लगने लग पड़ती है (फिर वे उस रजा के आगे अड़ते नहीं।जैसे पहले मूर्खता के कारण अड़ते थे)। 2। (हे भाई !) जिन लोगों ने पूरे गुरू के चरण पकड़ लिए हैं उनके (पिछले) करोड़ों जन्मों के किए पाप उतर जाते हैं। 3। उनका ये कीमती मानस जनम कामयाब हो जाता है - (हे नानक !) कह, (जिन मनुष्यों पर) परमात्मा ने (अपने नाम के दाति की) मेहर की । ४।१५।६६।
सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥
आसा महला 5 ॥
सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥
गुर के चरन केस संगि झारे ॥1॥
जागु रे मन जागनहारे ॥
बिनु हरि अवरु न आवसि कामा झूठा मोहु मिथिआ पसारे ॥1॥ रहाउ ॥
गुर की बाणी सिउ रंगु लाइ ॥
गुरु किरपालु होइ दुखु जाइ ॥2॥
गुर बिनु दूजा नाही थाउ ॥
गुरु दाता गुरु देवै नाउ ॥3॥
गुरु पारब्रहमु परमेसरु आपि ॥
आठ पहर नानक गुर जापि ॥4॥16॥67॥
सतिगुरु अपना सद सदा सम॑ारे ॥
गुर के चरन केस संगि झारे ॥1॥
जागु रे मन जागनहारे ॥
बिनु हरि अवरु न आवसि कामा झूठा मोहु मिथिआ पसारे ॥1॥ रहाउ ॥
गुर की बाणी सिउ रंगु लाइ ॥
गुरु किरपालु होइ दुखु जाइ ॥2॥
गुर बिनु दूजा नाही थाउ ॥
गुरु दाता गुरु देवै नाउ ॥3॥
गुरु पारब्रहमु परमेसरु आपि ॥
आठ पहर नानक गुर जापि ॥4॥16॥67॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे मन ! अपने सतिगुरू को सदा ही (अपने अंदर) संभाल के रख। (हे भाई !) गुरू के चरणों को अपने केसों से झाड़ा कर (गुरू-दर पर विनम्रता से पड़ा रह)। 1। हे जागने योग्य मन ! (माया के मोह की नींद में से) सुचेत हो। परमात्मा के नाम के बिना और कोई (पदार्थ) आपके काम नहीं आएगा।(परिवार का) मोह और (माया का) पसारा ये कोई भी साथ निभाने वाले नहीं हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) सतिगुरू की बाणी से प्यार जोड़। जिस मनुष्य पर गुरू दयावान होता है उसका हरेक दुख दूर हो जाता है। 2। (हे भाई !) गुरू के बिना और कोई जगह नहीं (जहाँ माया के मोह की नींद में सोए मन को जगाया जा सके)। गुरू (परमात्मा का) नाम बख्शता है।गुरू नाम की दाति देने के समर्थ है (नाम की दाति दे के सोए हुए मन को जगा देता है)। 3। गुरू पारब्रहम (का रूप) है गुरू परमेश्वर (का रूप) है। हे नानक ! (कह,हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) गुरू को याद रख।4। 16। 67।
आपे पेडु बिसथारी साख ॥
आसा महला 5 ॥
आपे पेडु बिसथारी साख ॥
अपनी खेती आपे राख ॥1॥
जत कत पेखउ एकै ओही ॥
घट घट अंतरि आपे सोई ॥1॥ रहाउ ॥
आपे सूरु किरणि बिसथारु ॥
सोई गुपतु सोई आकारु ॥2॥
सरगुण निरगुण थापै नाउ ॥
दुह मिलि एकै कीनो ठाउ ॥3॥
कहु नानक गुरि भ्रमु भउ खोइआ ॥
अनद रूपु सभु नैन अलोइआ ॥4॥17॥68॥
आपे पेडु बिसथारी साख ॥
अपनी खेती आपे राख ॥1॥
जत कत पेखउ एकै ओही ॥
घट घट अंतरि आपे सोई ॥1॥ रहाउ ॥
आपे सूरु किरणि बिसथारु ॥
सोई गुपतु सोई आकारु ॥2॥
सरगुण निरगुण थापै नाउ ॥
दुह मिलि एकै कीनो ठाउ ॥3॥
कहु नानक गुरि भ्रमु भउ खोइआ ॥
अनद रूपु सभु नैन अलोइआ ॥4॥17॥68॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! ये जगत।मानो।एक बड़े फैलाव वाला वृक्ष है) परमात्मा खुद ही (इस जगत-वृक्ष को सहारा देने वाला) बड़ा तना है (जगत-पसारा उस वृक्ष की) शाखाओं का फैलाव फैला हुआ है। (हे भाई ! ये जगत) परमात्मा की (बीजी हुई) फसल है।स्वयं ही वह इस फसल का रखवाला है। 1। (हे भाई !) मैं जिधर-किधर देखता हूँ मुझे एक परमात्मा ही दिखता है। वह परमात्मा स्वयं ही हरेक शरीर में बस रहा है। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा स्वयं ही सूर्य है (और ये जगत।मानो।उसकी) किरणों का बिखराव है। वह स्वयं ही अदृश्य (रूप में) है और स्वयं ही ये दिखाई देता पसारा है। 2। (हे भाई ! अपने अदृश्य और दृष्टमान रूपों का) निर्गुण और सर्गुण नाम वह प्रभू स्वयं ही स्थापित करता है (दोनों में फर्क नाम-मात्र को ही है।कहने को ही है)। इन दोनों (रूपों) ने मिल के एक परमात्मा में ही ठिकाना बनाया हुआ है (इन दोनों का ठिकाना परमात्मा स्वयं ही है)। 3। हे नानक ! कह, गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर से माया वाली) भटकना और डर दूर कर दी उसने हर जगह उस परमात्मा को ही अपनी आँखों से देख लिया जो सदा ही आनंद में रहता है। 4। 17। 68।
उकति सिआनप किछू न जाना ॥
आसा महला 5 ॥
उकति सिआनप किछू न जाना ॥
उकति सिआनप किछू न जाना ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! मैं कोई दलील (देनी) नहीं जानता।मैं कोई समझदारी (की बात करनी) नहीं जानता (जिससे मैं आपको खुश कर सकूँ।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३८७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।