अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: (पर) वही मनुष्य आपका नाम जपता है जो आपको प्यारा लगता है (जिस पे आपकी मेहर होती है)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आपका नाम जप के मन शांत हैं जाता है।शरीर (भी।हरेक ज्ञानेन्द्रिय भी) जप के शांत हैं जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए दुखों का डेरा ही उठ जाता है। 2। वह मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाता है, (जो परमात्मा की) रजा को समझ लेता है (रजा में खुशी से) राजी रहता है और जिस मनुष्य के पास सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की राहदारी है नानक कहता है, (हे भाई ! जब से) पूरे गुरू ने परमात्मा का नाम मेरे हृदय में पक्का कर दिया है (तब से) मेरे मन ने (सदा) सुख ही अनुभव किया है। 4। 8। 59।
आसा महला 5 ॥ जहा पठावहु तह तह जाइंी ॥ जो तुम देहु सोई सुखु पाइंी ॥1॥ सदा चेरे गोविंद गोसाई ॥ तुम॑री क्रिपा ते त्रिपति अघाइंी ॥1॥ रहाउ ॥ तुमरा दीआ पैन॑उ खाइंी ॥ तउ प्रसादि प्रभ सुखी वलाइंी ॥2॥ मन तन अंतरि तुझै धिआइंी ॥ तुम॑रै लवै न कोऊ लाइंी ॥3॥ कहु नानक नित इवै धिआइंी ॥ गति होवै संतह लगि पाइंी ॥4॥9॥60॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे गोबिंद ! ये आपकी ही मेहर है कि) जिधर आप मुझे भेजता हॅ।मैं उधर उधर ही (खुशी से) जाता हूँ। (सुख हैं चाहे दुख हो) जो कुछ आप मुझे देता है।मैं उसको (सिर माथे पे) सुख (जान के) मानता हूँ। 1। हे गोबिंद ! हे गुसाई ! (मेहर कर।मैं) सदा आपका दास बना रहूँ (क्योंकि) आपकी कृपा से ही मैं माया की तृष्णा से सदा तृप्त रहता हूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! जो कुछ आप मुझे (पहनने को खाने को) देता है वही मैं (संतोष से) पहनता हूँ और खाता हूँ। आपकी कृपा से मैं (अपना जीवन) सुख आनंद से व्यतीत कर रहा हूँ। 2। हे प्रभू ! मैं अपने मन में अपने हृदय में (सदा) आपको ही याद करता रहता हूँ। आपके बराबर का मैं और किसी को नहीं समझता। 3। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास करता रह और) कह, (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं इसी तरह सदा आपको सिमरता रहूँ। (आपकी मेहर हैं तो आपके) संत जनों के चरणों में लग के मुझे ऊँची आत्मिक अवस्था मिली रहे। 4। 9। 60।
आसा महला 5 ॥ ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥ मारगि चलत हरे हरि गाईऐ ॥1॥ स्रवन सुनीजै अंम्रित कथा ॥ जासु सुनी मनि होइ अनंदा दूख रोग मन सगले लथा ॥1॥ रहाउ ॥ कारजि कामि बाट घाट जपीजै ॥ गुर प्रसादि हरि अंम्रितु पीजै ॥2॥ दिनसु रैनि हरि कीरतनु गाईऐ ॥ सो जनु जम की वाट न पाईऐ ॥3॥ आठ पहर जिसु विसरहि नाही ॥ गति होवै नानक तिसु लगि पाई ॥4॥10॥61॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) उठते बैठते सोते (जागते हर वक्त) परमात्मा को याद करते रहना चाहिए। रास्ते में चलते हुए भी सदा परमात्मा की सिफत सालाह करते रहना चाहिए। 1। (हे भाई !) कानों से (परमात्मा की) आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह सुनते रहना चाहिए जिसके सुनने से मन में आत्मिक आनंद पैदा होता है और मन के सारे दुख-रोग दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) हरेक काम काज करते हुए।रास्ते पर चलते हुए।नदी घाट पार करते हुए परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए और गुरू की कृपा की बरकति से आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जल पीते रहना चाहिए। 2। (हे भाई1) दिन-रात परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए (जो ये काम करता रहता है) जिंदगी के सफर में आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती। 3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आठों पहर किसी (भी वक्त) आप नहीं बिसरता। उसके चरणों में लग के (और मनुष्यों को भी) ऊँची आत्मिक अवस्था मिल जाती है। 4। 10। 61।
आसा महला 5 ॥ जा कै सिमरनि सूख निवासु ॥ भई कलिआण दुख होवत नासु ॥1॥ अनदु करहु प्रभ के गुन गावहु ॥ सतिगुरु अपना सद सदा मनावहु ॥1॥ रहाउ ॥ सतिगुर का सचु सबदु कमावहु ॥ थिरु घरि बैठे प्रभु अपना पावहु ॥2॥ पर का बुरा न राखहु चीत ॥ तुम कउ दुखु नही भाई मीत ॥3॥ हरि हरि तंतु मंतु गुरि दीन॑ा ॥ इहु सुखु नानक अनदिनु चीन॑ा ॥4॥11॥62॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू के कहे अनुसार उस परमात्मा का सिमरन करते रहो) जिसके सिमरन की बरकति से (मन में) सुख का वासा हो जाता है। सदा सुख-शांति बनी रहती है और दुखों का नाश हो जाता है। 1। (गुरू के हुकम अनुसार) परमात्मा की सिफत सालाह करते रहा करो (इसका नतीजा ये होंगे कि सदा) आत्मिक आनंद पाते रहोगे। (हे भाई ! अपने गुरू के उपदेश के अनुसार चल के) सदा ही गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करते रहो 1।रहाउ। (हे भाई !) सदा स्थिर परमात्मा की सिफत सालाह वाले गुर-शबद को हर समय हृदय में रखो (शबद अनुसार अपना जीवन घड़ते रहो। इस शबद की बरकति से अपने) हृदय-घर में अडोल टिके रहोगे (भटकना खत्म हो जाएगी) और परमात्मा को अपने अंदर ही पा लेंगे। 2। हे भाई ! हे मित्र ! कभी किसी का बुरा ना चितवा करो (कभी मन में ये इच्छा ना पैदा होने दो कि किसी का नुकसान हो। इसका नतीजा ये होंगे कि) आपको भी कोई दुख नहीं व्यापेगा। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा के नाम का ही तंत्र मन्त्र (टोना टोटका) दिया है।परमात्मा के नाम का ही मंत्र दिया है (वह मंत्र-टूणों द्वारा दूसरों का बुरा चितवने की जगह। अपने अंदर) हर समय (परमात्मा के नाम से पैदा हुआ) आत्मिक आनंद बसा पहचान लेता है। 4। 11। 62।
आसा महला 5 ॥ जिसु नीच कउ कोई न जानै ॥ नामु जपत उहु चहु कुंट मानै ॥1॥ दरसनु मागउ देहि पिआरे ॥ तुमरी सेवा कउन कउन न तारे ॥1॥ रहाउ ॥ जा कै निकटि न आवै कोई ॥ सगल स्रिसटि उआ के चरन मलि धोई ॥2॥ जो प्रानी काहू न आवत काम ॥ संत प्रसादि ता को जपीऐ नाम ॥3॥ साधसंगि मन सोवत जागे ॥ तब प्रभ नानक मीठे लागे ॥4॥12॥63॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य को नीच जाति का समझ के कोई जानता-पहचानता भी नहीं आपका नाम जपने की बरकति से सारे जगत में उसका आदर-मान होने लगता है।1। हे प्यारे प्रभू ! मैं आपका दर्शन मांगता हूँ (मुझे अपने दर्शनों की दाति) दे। जिसने आपकी सेवा-भक्ति की उस उस को (तूने अपने दर्शन दे के) संसार-समुंद्र से पार लंघा दिया। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (कंगाल जान के) जिस मनुष्य के पास भी कोई नहीं फटकता (आपका नाम जपने की बरकति से फिर) सारी लुकाई उसके पैर मल-मल के धोने लग पड़ती है। हे प्रभू ! जो मनुष्य (पहले) किसी का कोई काम सँवारने के काबिल नहीं था (अब) गुरू की कृपा से (आपका नाम जपने के कारण) उसे हर जगह याद किया जाता है। 3। हे नानक ! (कह) हे मन ! साध-संगति में आ के (माया के मोह की नींद में) सोए हुए लोग जाग पड़ते हैं (आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त कर लेते हैं। और) तब उन्हें प्रभू जी प्यारे लगने लग पड़ते हैं। 4। 12। 63।
आसा महला 5 ॥ एको एकी नैन निहारउ ॥ सदा सदा हरि नामु सम॑ारउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू के प्रताप के सदके ही) मैं परमातमा को हर जगह ही बसता अपनी आँखों से देखता हूँ। और सदा ही परमात्मा का नाम अपने दिल में टिकाए रखता हूँ। 1।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर) वही मनुष्य आपका नाम जपता है जो आपको प्यारा लगता है (जिस पे आपकी मेहर होती है)।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।