पिरु प्रभु साचा सोहणा पाईऐ गुर बीचारि ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुखि कंतु न पछाणई तिन किउ रैणि विहाइ ॥
गरबि अटीआ त्रिसना जलहि दुखु पावहि दूजै भाइ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी तिन विचहु हउमै जाइ ॥
सदा पिरु रावहि आपणा तिना सुखे सुखि विहाइ ॥2॥
गिआन विहूणी पिर मुतीआ पिरमु न पाइआ जाइ ॥
अगिआन मती अंधेरु है बिनु पिर देखे भुख न जाइ ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो मै पिरु देहु मिलाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै पिरु पाइआ सचि समाइ ॥3॥
से सहीआ सोहागणी जिन कउ नदरि करेइ ॥
खसमु पछाणहि आपणा तनु मनु आगै देइ ॥
घरि वरु पाइआ आपणा हउमै दूरि करेइ ॥
नानक सोभावंतीआ सोहागणी अनदिनु भगति करेइ ॥4॥28॥61॥
इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥
सतिगुरु सेवी भाउ करि मै पिरु देहु मिलाइ ॥
सभु उपाए आपे वेखै किसु नेड़ै किसु दूरि ॥
जिनि पिरु संगे जाणिआ पिरु रावे सदा हदूरि ॥1॥
मुंधे तू चलु गुर कै भाइ ॥
अनदिनु रावहि पिरु आपणा सहजे सचि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी सचै सबदि सीगारि ॥
हरि वरु पाइनि घरि आपणै गुर कै हेति पिआरि ॥
सेज सुहावी हरि रंगि रवै भगति भरे भंडार ॥
सो प्रभु प्रीतमु मनि वसै जि सभसै देइ अधारु ॥2॥
पिरु सालाहनि आपणा तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥
मनु तनु अरपी सिरु देई तिन कै लागा पाइ ॥
जिनी इकु पछाणिआ दूजा भाउ चुकाइ ॥
गुरमुखि नामु पछाणीऐ नानक सचि समाइ ॥3॥29॥62॥
हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥
लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥
हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥
गुर परसादी सेव करी सचु गहिर गंभीरै ॥1॥
मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥
गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥
दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥
अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे स्वै भाव में मस्त व झूठ की बंजारन जीव स्त्री! आपको माया के पसारे ने लूट लिया है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।