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अंग ३८ · सिरी राग

अंग
38
सिरी राग
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  1. मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥
  2. इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥
  3. हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥

मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥

अंग ३७ से चला आ रहा अंश

मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥
पिरु प्रभु साचा सोहणा पाईऐ गुर बीचारि ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुखि कंतु न पछाणई तिन किउ रैणि विहाइ ॥
गरबि अटीआ त्रिसना जलहि दुखु पावहि दूजै भाइ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी तिन विचहु हउमै जाइ ॥
सदा पिरु रावहि आपणा तिना सुखे सुखि विहाइ ॥2॥
गिआन विहूणी पिर मुतीआ पिरमु न पाइआ जाइ ॥
अगिआन मती अंधेरु है बिनु पिर देखे भुख न जाइ ॥
आवहु मिलहु सहेलीहो मै पिरु देहु मिलाइ ॥
पूरै भागि सतिगुरु मिलै पिरु पाइआ सचि समाइ ॥3॥
से सहीआ सोहागणी जिन कउ नदरि करेइ ॥
खसमु पछाणहि आपणा तनु मनु आगै देइ ॥
घरि वरु पाइआ आपणा हउमै दूरि करेइ ॥
नानक सोभावंतीआ सोहागणी अनदिनु भगति करेइ ॥4॥28॥61॥

हिन्दी अर्थ: हे स्वै भाव में मस्त व झूठ की बंजारन जीव स्त्री! आपको माया के पसारे ने लूट लिया है। (इस तरह प्रभु पति के साथ आपका मेल नहीं हो सकता)। सदा स्थिर रहने वाला सुहाना पति गुरू की बताई विचार पे चलने से ही मिलता है।1।रहाउ। जो जीव सि्त्रयां अपने ही मन के पीछे चलती हैं, खसम प्रभु उन्हें पहचाता भी नहीं। उनकी (जिंदगी रूपी) रात कैसे बीतती होगी? (भाव, वह सारी उम्र दुखी ही रहती हैं)। वह अहंकार में पूरी तरह भरी हुई तृष्णा की आग में जलती हैं, वह माया के मोह में पड़ कर दुख बर्दाश्त करती हैं। (जो जीव सि्त्रयां गुरू के) शबद में रंगी रहती हैं वह भाग्यशाली हैं (शबद की बरकति से) उनके अंदर से अहम् दूर हो जाता है। वह सदा अपने प्रभु पति से मिलीे रहती हैं, उनकी उम्र पूरी तरह सुख में ही बीतती है।2। जो जीव-स्त्री प्रभु पति के साथ गहरी सांझ डाले बगैर ही रही, वह प्रभु-पति से छुटी ही रह जाती है। वह प्रभु-पति का प्यार हासिल नहीं कर सकती। अज्ञान में मत (बुद्धि) ली हुई जीव स्त्री को (माया के मोह का) अंधेरा व्याप्त रहता है। पति प्रभु के दर्शन के बिना उसकी यह माया की भूख तृप्त नहीं होती। हे सत्संगी जीव सि्त्रयो! आओ, मुझे मिलो और मुझे प्रभु पति मिला दो। जिस जीव स्त्री के सौभाग्य से गुरू मिल जाता है, वह प्रभु पति को मिल जाती है। वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहती है।3। वह सत्संगी जीव सि्त्रयां भाग्यशाली हैं जिन पर प्रभु पति मेहर की निगाह करता है। वह अपना तन अपना मन उसके आगे भेट रख के अपने प्रभु पति से सांझ (समझ / पहचान) पाती हैं। जो जीव स्त्री अपने अंदर से अहंकार दूर करती है वह अपने हृदय घर में (ही) प्रभु-पति को ढूँढ लेती है। हे नानक! वह शोभनीय हैं वह भाग्यशाली हैं, वह हर वक्त प्रभु-पति की भक्ति करती हैं।4।28।61।

इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥
सतिगुरु सेवी भाउ करि मै पिरु देहु मिलाइ ॥
सभु उपाए आपे वेखै किसु नेड़ै किसु दूरि ॥
जिनि पिरु संगे जाणिआ पिरु रावे सदा हदूरि ॥1॥
मुंधे तू चलु गुर कै भाइ ॥
अनदिनु रावहि पिरु आपणा सहजे सचि समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सबदि रतीआ सोहागणी सचै सबदि सीगारि ॥
हरि वरु पाइनि घरि आपणै गुर कै हेति पिआरि ॥
सेज सुहावी हरि रंगि रवै भगति भरे भंडार ॥
सो प्रभु प्रीतमु मनि वसै जि सभसै देइ अधारु ॥2॥
पिरु सालाहनि आपणा तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥
मनु तनु अरपी सिरु देई तिन कै लागा पाइ ॥
जिनी इकु पछाणिआ दूजा भाउ चुकाइ ॥
गुरमुखि नामु पछाणीऐ नानक सचि समाइ ॥3॥29॥62॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ कई (भाग्यशाली जीवसि्त्रयां) अपने प्रभु पति को प्रसन्न करती हैं (उनको देख के मेरे मन अंदर भी चाह पैदा होती है कि) मैं किस के दर पे जा के (प्रभु पति को प्रसंन्न करने का तरीका) पूछूँ। मैं प्रेम से सतिगुरु की सेवा करती हूँ और विनती करती हूँ: मुझे अपने प्रभु-पति से मिला दीजिए। प्रभु खुद ही सारा जगत पैदा करता है तथा (सभ की) संभाल करता है, हरेक जीव में एक समान मौजूद है। जिस (जीव स्त्री) ने (गुरू की शरण पड़ के) उस प्रभु पति को अपने अंग-संग जान लिया है, वह उस हाजिर नाजिर बसते को सदा अपने हृदय में बसा के रखती है।1। हे जीव स्त्री! आप गुरू के प्रेम में (रह कर जीवन सफर पे) चलें। (जो जीव सि्त्रयां गुरू के प्रेम में चलती हैं वह) आत्मक अडोलता से सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के हर वक्त अपने प्रभु पति को मिली रहती हैं।1।रहाउ। जो जीव सि्त्रयां गुरू के शबद में रंगी रहती हैं, वह भाग्यशाली हो जाती हैं। वह सदा सिफत सलाह की बाणी से अपने जीवन को सवार लेती हैं। वह अपने गुरू के प्रेम में, प्यार में टिक के प्रभु पति को अपने हृदय घर में ढूंढ लेती हैं। प्रभु (पति) उनके सुंदर हृदय सेज पर प्रेम से आकर प्रगट होता है। उनके भगती के खजाने भर जाते है। उनके मन में वह प्रभु प्रीतम आ बसता है, जो हरेक जीव को आसरा दे रहा है।2। जो जीव सि्त्रयां अपने प्रभु पति की सिफत सलाह करती हैं, मैं उन से सदा कुर्बान जाती हूँ। मैं उनके आगे अपना मन और तन भेंट करती हूँ। मैं (उनके चरणों में) अपना शीश रखती हूं। मैं उनके चरण लगती हूं, क्योंकि उन्होंने माया का प्यार (अपने अंदर से) दूर करके सिर्फ प्रभु पति से जान-पहिचान बना ली है। हे नानक! गुरू के सन्मुख हो के सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के उसके नाम के साथ जान पहिचान बन सकती है।३।२९।६२।

हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥
लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥
हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥
गुर परसादी सेव करी सचु गहिर गंभीरै ॥1॥
मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥
गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥
दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥
अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ हे प्रभू जी ! आप (ही) सदा स्थिर रहने वाले हैं और सारा जगत आपके वस में है। (पर आप मिलते हैं गुरू के द्वारा) गुरू पीर को मिले बिना (अर्थात, गुरू की शरण आए बिना) चौरासी लाख योनियों के जीव (आपके दर्शन को) तरसते फिरते हैं। जिस जीव पे परमात्मा खुद मेहर करता है बख्शिश करता है, उसके हृदय में सदा आत्मिक आनन्द बना रहता है। (मेरे अंदर भी चाह है कि) मैं गुरू की मेहर से सदा स्थिर व गहरे जिगरे वाले परमात्मा का सिमरन करता रहूँ।1। हे मेरे मन! अगर परमात्मा के नाम रंग में रंगे जाएं, तो आत्मिक आनन्द मिलता है। (पर) गुरू की मति पर चल के ही परमात्मा का नाम सलाहना चाहिए। (नाम सिमरन का) और कोई तरीका नहीं।1।रहाउ। धर्मराज को (भी परमात्मा का) हुकम है (हे धर्मराज ! आप !) बैठ के (यह) अटल धर्म (न्याय) याद रख कि वह विकारी मनुष्य आपकी सरकार है, रईअत है, जो माया के प्यार में (फंसा) रहता है। आत्मिक जीवन वाले बंदों के मन में गुणों का खजाना परमात्मा खुद बसता है, वह परमात्मा को ही सिमरते रहते है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३८ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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