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अंग 39

अंग
39
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिन की सेवा धरम राइ करै धंनु सवारणहारु ॥2॥
मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥
आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥
बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥
सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥3॥
सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥
जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥
गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥
नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥4॥30॥63॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: धर्मराज (भी) उन लोगों की सेवा करता है। धन्य है वह परमात्मा जो (अपने सेवकों का जीवन) इतना सुहाना बना देता है (कि खुद धर्मराज भी उनका आदर करते हैं)।2। जो मनुष्य अपने मन में से मन के विकार छोड़ देता है, जिसके मन में से माया का अहंकार दूर हो जाता है, वह सर्व व्यापक परमात्मा के साथ जान पहिचान बना लेता है। वह आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के नाम में लीनता हासिल कर लेता है। (पर) गुरू की शरण के बिना (विकारों से) छुटकारा नहीं मिल सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों के पीछे) पागल हुआ फिरता है, वह गुरू के शबद (की कद्र) को नहीं समझता। वह (जबानी-जबानी धार्मिक) बातें चाहे जितनी करता फिरे, पर माया के मोह में ही गरक रहता है।3। (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सभ कुछ कराने वाला है, और कोई जीव दम नहीं मार सकता। (अपनी सिफत सलाह वह खुद ही करवाता है) जैसे परमात्मा बोलने की प्रेरणा करे वैसे ही जीव बोल सकता है। (जीव तब ही सिफत सलाह कर सकता है) जबवह परमात्मा खुद प्रेरता है। गुरू की शरण पड़ कर सिफत सलाह की बाणी में जुड़ने से प्रभु मिलता है, गुरू के शबद के द्वारा (ही प्रभु से) मिलाप होता है। हे नानक! (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम को हृदय में संभाल, इस नाम के सिमरन से ही आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है।4।30।63।
सिरीरागु महला 3 ॥
जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥
मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥
बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥
पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥1॥
मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥
मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥
मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥
जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥2॥
हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥
करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥
माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥
गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥3॥
जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥
ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥
मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥
नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥4॥31॥64॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जगत में अहम् की मैल (के कारण सदा) दुख (ही) सहना पड़ा है (क्योंकि) माया में प्यार के कारन जगत को (विकारों की) मैल चिपकी रहती है। अगर मनुष्य सौ तीर्थों पर भी स्नान करे तो भी (ऐसे) किसी तरीके से यह अहंकार की मैल धोने से (मन से) दूर नहीं होती। लोग कई किस्मों के (नियत) धार्मिक कर्म करते हैं। (इस तरह बल्कि पहले से) दुगनी (अहं की) मैल आ लगती है। (विद्या आदि) पढ़ने से भी यह मैल दूर नहीं होती, बेशक, पढ़े-लिखे लोगों को जा के पूछ लो (अर्थात, पढ़े हुए लोगों को विद्या का गुमान ही बना रहता है)।1। हे मेरे मन! (जब मनुष्य) गुरू की शरण में आता है तब (ही) पवित्र होता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग राम राम कह कह के थक जाते हैं (फिर भी अहम् की) मैल (उनसे) धोई नहीं जा सकती।1।रहाउ। अहम् की मैल से भरे हुए मन से परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती, (इस तरह) परमात्मा का नाम हासिल नहीं होता (हृदय में टिक नहीं सकता)। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग सदा अहंकार के कारण मलीन मन रहते हैं, और आत्मिक मौत मरे रहते हैं, (वह दुनिया से) इज्जत गवा के ही जाएंगे। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम बस जाता है, उस का अहंकार दूर हो जाता है, वह प्रभु चरणों में लीन रहता है। जैसे अगर अंधेरे में दिया जला दें (तो अंधेरा दूर हो जाता है) ऐसे ही गुरू की बख्शी हुई समझ की बरकति से (अहम्-रूप) बेसमझी (का अंधकार) दूर हो जाता है।2। (यह काम) ‘हमने’ किया है, ‘हम’ ही कर सकते हैं। इस तरह “मैं मैं’ ‘हम हम’ कहने वाले लोग मूर्ख उजड्ड होते हैं उन्हें पैदा करने वाला परमात्मा भूला रहता है। वे सदा माया से ही प्यार डाल के रखते हैं। (दुनिया में) माया के मोह जितना (और कोई) दुख नहीं। माया के मोह में फंस के सारे जीव (माया) की खातर भटक भटक के खपते रहते हैं। गुरू की मति पर चलने से सदा स्थिर प्रभु का नाम हृदय में टिका के ही आत्मिक आनन्द मिलता है।3। (पर, जीवों के भी क्या बस?) जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्रभु (अपने चरणों में) जोड़ता है, वही प्रभु को मिलता है। मैं ऐसे शख्स से कुर्बान जाता हूं। हे मन! (परमात्मा की कृपा) जो मनुष्य प्रभु की भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं, प्रभु का सदा स्थिर नाम ही जिन की बाणी बन जाती है। उनको ‘अपना घर’ प्राप्त हो जाता है (अर्थात, वह सदा उस आत्मिक ठिकाने में टिके रहते हैं, जहां माया का मोह उन्हें धक्का नहीं दे सकता)। मैं श्रद्धा से प्रभु के चरण पकड़ती हूँ (और गुरू के आगे विनती करती हूँ कि) मुझे परमेश्वर-पति से मिलन करवा दे उनको, हे नानक! परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता, वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहते हैं।4।33।31।64।
सिरीरागु महला 4 घरु 1 ॥
मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥
जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥
जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥1॥
मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥
हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥
सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥
हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥2॥
मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्रीरागु महला घरु 1॥ मेरे मन में, शरीर में (प्रीतम प्रभु के) बिछोड़े का भारी दर्द है। (मेरा मन तड़प रहा है कि) कैसे प्रीतम प्रभु मेरे हृदय घर में मुझे आ मिले। जब मैं प्यारे प्रभु के दर्शन करता हूँ प्रभु के दर्शन करने से मेरा (विछोड़े का) दुख दूर हो जाता है। (जिन सत्संगी सज्जनों ने प्रीतम प्रभु का दर्शन किया है) मैं उन सज्जनों को जा के पूछता हूँ कि प्रभु किस तरीके से मिलाए मिलता है।1। हे मेरे सतिगुरू! आपके बगैर मेरा और कोई (सहारा) नहीं। हम जीव मूर्ख हैं, अन्जान है। (पर) आपकी शरण आए हैं (जो भाग्यशाली गुरू की शरण में आता है उस को) वह परमात्मा खुद मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लेता है।1।रहाउ। गुरू हरि नाम की दात देने वाला है (जिस को गुरू से यह दात मिलती है उस को) वह प्रभु अपने आप साथ मिला लेता है। गुरू ने हरि प्रभु के साथ गहरी सांझ डाली हुई है (इस वास्ते) गुरू जितनी (ऊँची आत्मिक अवस्था वाला) और कोई नहीं। (मेरी यही तमन्ना है कि) मैं गुरू की शरण, अहं भाव मिटा के आ पड़ूं। (गुरू की शरण पड़ने से ही) वह प्रभु मेहर करके अपने साथ मिला लेता है।2। मन के हठ से (किए तप आदि के साधनों से) कभी किसी ने परमात्मा को नहीं ढूढा। (ऐसे) उपाय करके सभ थक ही जाते हैं।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “धर्मराज (भी) उन लोगों की सेवा करता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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