Lulla Family

अंग 37

अंग
37
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिनु सतिगुर किनै न पाइओ करि वेखहु मनि वीचारि ॥
मनमुख मैलु न उतरै जिचरु गुर सबदि न करे पिआरु ॥1॥
मन मेरे सतिगुर कै भाणै चलु ॥
निज घरि वसहि अंम्रितु पीवहि ता सुख लहहि महलु ॥1॥ रहाउ ॥
अउगुणवंती गुणु को नही बहणि न मिलै हदूरि ॥
मनमुखि सबदु न जाणई अवगणि सो प्रभु दूरि ॥
जिनी सचु पछाणिआ सचि रते भरपूरि ॥
गुर सबदी मनु बेधिआ प्रभु मिलिआ आपि हदूरि ॥2॥
आपे रंगणि रंगिओनु सबदे लइओनु मिलाइ ॥
सचा रंगु न उतरै जो सचि रते लिव लाइ ॥
चारे कुंडा भवि थके मनमुख बूझ न पाइ ॥
जिसु सतिगुरु मेले सो मिलै सचै सबदि समाइ ॥3॥
मित्र घणेरे करि थकी मेरा दुखु काटै कोइ ॥
मिलि प्रीतम दुखु कटिआ सबदि मिलावा होइ ॥
सचु खटणा सचु रासि है सचे सची सोइ ॥
सचि मिले से न विछुड़हि नानक गुरमुखि होइ ॥4॥26॥59॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई!) अपने मन में विचार करके देख लो, सतिगुरू (की शरण) के बिना किसी ने भी परमात्मा को नहीं ढूंढा। (क्योंकि) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जब तक गुरू के शबद से प्यार नहीं डालता, उस के मन के (विकारों की) मैल नहीं उतरती।1। हे मेरे मन! सतिगुरू की रजा में चल। (गुरू की रजा में चल के) अपने अंतरात्मे टिका रहेगा (अर्थात, भटकनों से बच जाएगा)। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन पीएगा, उस की बरकति से सुखें का ठिकाना ढूंढ लेगा।1।रहाउ। जिस जीव-स्त्री के भीतर औगुण ही औगुण हों और गुण कोई भी नहीं, उसको परमात्मा की हजूरी में जगह नहीं मिलती। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री गुरू के शबद की कद्र नहीं जानती, औगुणों के कारण वह परमात्मा उसे कहीं दूर ही प्रतीत होता है। जिन लोगों ने सदा स्थिर परमात्मा को हर जगह बसता पहिचान लिया है वह उस सदा स्थिर प्रभु (के प्यार रंग) में रंगे रहते है। उनका मन गुरू के शबद में परोया रहता है। उनको परमात्मा मिल जाता हैऔर अंग-संग बसता दिखाई देता है।2। (पर, जीवों के भी क्या बस?) जिन जीवों को प्रभु ने खुद ही साध-संगति में (रख के नाम रंग से) रंगा है, गुरू शबद में जोड़ के उनको अपने (चरणों) में मिला लिया है। जो लोग सदा स्थिर प्रभु में सुरति जोड़ के (नाम रंग से) रंगे जाते हैं, उनका ये सदा स्थिर रहने वाला रंग कभी नहीं उतरता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (माया की खातिर) चारों तरफ भटक भटक के थक जाते हैं (अर्थात, आत्मिक जीवन कमजोर कर लेते हैं) उनको (सही जीवन राह की) सूझ नहीं होती। जिस मनुष्य को गुरू मिलाता है वह प्रभु प्रीतम को मिल जाता है। वह सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह बकी बाणी में लीन रहता है।3। (दुनिया के) बहुत सारे (सम्बंधियों) को मित्र बना बना के मैं थक चुकी हूँ (मैं समझती रही कि कोई साक-संबंधी) मेरा दुख काट सकेगा। प्रभु-प्रीतम को मिल के ही दुख काटा जाता है, गुरू के शबद द्वारा ही उसका मिलाप होता है। हे नानक! गुरू के सन्मुख हो के जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में मिल जाते हैं वह (दुबारा उस से) जुदा नहीं होते। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु का रूप् हो जाता है सदा स्थिर प्रभु का नाम ही उसकी लाभ कमायी हैं जाती है, नाम ही उसकी राशि पूँजी बन जाती है तथा उसको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है।4।26।59।
सिरीरागु महला 3 ॥
आपे कारणु करता करे स्रिसटि देखै आपि उपाइ ॥
सभ एको इकु वरतदा अलखु न लखिआ जाइ ॥
आपे प्रभू दइआलु है आपे देइ बुझाइ ॥
गुरमती सद मनि वसिआ सचि रहे लिव लाइ ॥1॥
मन मेरे गुर की मंनि लै रजाइ ॥
मनु तनु सीतलु सभु थीऐ नामु वसै मनि आइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि करि कारणु धारिआ सोई सार करेइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥
से जन सबदे सोहणे तितु सचै दरबारि ॥
गुरमुखि सचै सबदि रते आपि मेले करतारि ॥2॥
गुरमती सचु सलाहणा जिस दा अंतु न पारावारु ॥
घटि घटि आपे हुकमि वसै हुकमे करे बीचारु ॥
गुर सबदी सालाहीऐ हउमै विचहु खोइ ॥
सा धन नावै बाहरी अवगणवंती रोइ ॥3॥
सचु सलाही सचि लगा सचै नाइ त्रिपति होइ ॥
गुण वीचारी गुण संग्रहा अवगुण कढा धोइ ॥
आपे मेलि मिलाइदा फिरि वेछोड़ा न होइ ॥
नानक गुरु सालाही आपणा जिदू पाई प्रभु सोइ ॥4॥27॥60॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ करतार खुद ही (जगत का) मूल रचता है तथा फिर जगत पैदा करके स्वयं ही उसकी संभाल करता है। (इस जगत में) हर जगह करतार स्वयं ही व्यापक है (फिर भी) वह (जीवों की) समझ में नहीं आ सकता। वह प्रभु खुद ही (जब) दयाल होता है (तब) स्वयं ही (सही जीवन की) समझ बख्शता है। जिन मनुष्यों के मन में गुरू की मति की बरकति से परमात्मा बस जाता है। वह मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभु में सदा सुरति जोड़ के रखते हैं।1। हे मेरे मन! गुरू के हुकम में चल। (जो मनुष्य गुरू का हुकम मानता है उस का) मन (उसका शरीर) शांत हो जाता है। (उस के) मन में परमात्मा का नाम आ बसता है।1।रहाउ। जिस करतार ने जगत का मूल रच के जगत को पैदा किया है, वही इसकी संभाल करता है। पर उसकी कद्र गुरू के शबद द्वारा तब पड़ती है जबवह स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। (जिनपे मेहर की निगाह करता है) वह मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के उस सदा स्थिर प्रभु के दरबार में शोभा पाते हैं। जिन को करतार ने खुद ही (गुरू चरणों में) जोड़ा है वह गुरू के सन्मुख रह कर सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह के शबद में रंगे रहते हैं।2। (हे भाई!) गुरू की मति ले के उस सदा स्थिर परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए जिसके (गुणों का) अंत नहीं पड़ सकता, इस पार उस पार का सिरा नहीं ढूंढा जा सकता। (वह सदा स्थिर प्रभु) खुद ही अपने हुकम अनुसार हरेक शरीर में बसता है, और अपने हुकम में ही (जीवों की संभाल की) विचार करता है। (हे भाई!) गुरू के शबद में जुड़ के अपने अंदर से अहम् दूर करके परमात्मा की सिफत सलाह करनी चाहिए। जो जीव स्त्री प्रभु के नाम से वंचित रहती है वह औगुणों से भर जाती है और दुखी होती है।3। मैं सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह करता रहूँ। सदा स्थिर प्रभु (की याद) में जुड़ा रहूँ। सदा स्थिर प्रभु के नाम में जुड़ा रह के ही तृष्णा मिटती है। (मेरी अरदास है कि) मैं परमात्मा के गुणों को विचारता रहूँ। उनके गुणों को (अपने हृदय में) इकट्ठा करता रहूँ तथा (इस तरह अपने अंदर से) औगुणों को धो के निकाल दूँ। जिस मनुष्य को प्रभु खुद ही अपने चरणों में जोड़ता है, उसे दुबारा कभी प्रभु से विछोड़ा नहीं होता। हे नानक! (कह, मेरी यही अरदास है कि) मैं अपने गुरू की सिफत करता रहूँ, क्योंकि गुरू के द्वारा ही वह प्रभु मिल सकता है।4।27।60।
सिरीरागु महला 3 ॥
सुणि सुणि काम गहेलीए किआ चलहि बाह लुडाइ ॥
आपणा पिरु न पछाणही किआ मुहु देसहि जाइ ॥
जिनी सखंी कंतु पछाणिआ हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
तिन ही जैसी थी रहा सतसंगति मेलि मिलाइ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ हे स्वार्थ में फंसी हुई जीव स्त्री! ध्यान से सुन! क्यूँ इतनी लापरवाही से (जीवन राह में) चल रही है? (स्वार्थ में फंस के) आप अपने प्रभु पति को (अब) पहचानती नहीं, परलोक में जा के क्या मुंह दिखाएगी? जिन सत्संगी जीव सि्त्रयों ने अपने खसम प्रभु के साथ जान-पहिचान बना रखी है (वह भाग्यशाली हैं) मैं उनके चरण छूती हूँ। (मेरा चित्त करता है कि) मैं उनके सत्संग के एकत्र में मिल के उन जैसी ही बन जाऊँ।1।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई!) अपने मन में विचार करके देख लो, सतिगुरू (की शरण) के बिना किसी ने भी परमात्मा को नहीं ढूंढा।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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