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अंग 379

अंग
379
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पीड़ गई फिरि नही दुहेली ॥1॥ रहाउ ॥
करि किरपा चरन संगि मेली ॥
सूख सहज आनंद सुहेली ॥1॥
साधसंगि गुण गाइ अतोली ॥
हरि सिमरत नानक भई अमोली ॥2॥35॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: उसका हरेक किस्म का दुख-दर्द दूर हो जाता है उसको पुनः कभी कोई दुख नहीं घेर सकते। 1।रहाउ। (हे भाई !) जिस जीव को परमात्मा कृपा करके अपने चरणों में जोड़ लेता है उसके अंदर सुख आनंद आत्मिक अडोलता आ बसते हैं उसका जीवन सुखी हो जाता है। 1। हे नानक ! साध-संगति में परमात्मा के गुण गा के परमात्मा का सिमरन करके (मनुष्य का जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि उसके) बराबर का कोई नहीं मिल सकता, उसकी कीमत का कोई नहीं मिल सकता। 2। 35।
आसा महला 5 ॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर ए खेलत सभि जूऐ हारे ॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सचु इह अपुनै ग्रिह भीतरि वारे ॥1॥
जनम मरन चूके सभि भारे ॥
मिलत संगि भइओ मनु निरमलु गुरि पूरै लै खिन महि तारे ॥1॥ रहाउ ॥
सभ की रेनु होइ रहै मनूआ सगले दीसहि मीत पिआरे ॥
सभ मधे रविआ मेरा ठाकुरु दानु देत सभि जीअ सम॑ारे ॥2॥
एको एकु आपि इकु एकै एकै है सगला पासारे ॥
जपि जपि होए सगल साध जन एकु नामु धिआइ बहुतु उधारे ॥3॥
गहिर गंभीर बिअंत गुसाई अंतु नही किछु पारावारे ॥
तुम॑री क्रिपा ते गुन गावै नानक धिआइ धिआइ प्रभ कउ नमसकारे ॥4॥36॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में बैठता है वह) काम-क्रोध-माया का मोह-अहंकार-ईष्या- इन सारे विकारों को (मानो) जूए की बाजी में खेल के हार देता है और सत-संतोष-दया-धर्म-सच- इन गुणों को अपने हृदय घर में ले आता है। 1। (हे भाई !) उसके जनम मरन के चक्कर समाप्त हो गए उसकी (अपने आप अपने सिर पर ली हुई) जिम्मेवारियां खत्म हैं गई। साध-संगति में मिल बैठ के मन पवित्र हो जाता है (साध-संगति में बैठने वाले को) पूरे गुरू ने एक छिन में (विकारों के समुंद्र से) पार लंघा लिया। 1।रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य संगति में बैठता है उसका) मन सभी के चरणों की धूड़ बन जाता है उसे (सृष्टि के) सारे जीव प्यारे मित्र दिखते हैं (उसे प्रत्यक्ष दिखता है कि) प्यारा पालनहार प्रभू सब जीवों में मौजूद है और सब जीवों को दातें दे दे के सबकी संभाल कर रहा है। 2। एक परमात्मा के नाम का ध्यान धर के वह और अनेकों को विकारों से बचा लेते हैं (उन्हें निश्चय बन जाता है कि सारे संसार में) परमात्मा स्वयं ही स्वयं बस रहा है।ये सारा जगत उस एक परमात्मा का ही पसारा है। (हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में आते हैं) परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के वह सारे मनुष्य गुरमुख बन जाते हैं।3। हे नानक ! (कह) हे गहरे प्रभू ! हे बड़े जिगरे वाले प्रभू ! हे बेअंत गोसाई ! आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। आपकी हस्ती का उरला और परला छोर नहीं मिल सकता।जो भी कोई जीव आपके गुण गाता है।जो भी कोई आपका नाम सिमर सिमर के आपके आगे सिर निवाता है वह ये सब कुछ आपकी मिहर से करता है। 4। 36।
आसा महला 5 ॥
तू बिअंतु अविगतु अगोचरु इहु सभु तेरा आकारु ॥
किआ हम जंत करह चतुराई जां सभु किछु तुझै मझारि ॥1॥
मेरे सतिगुर अपने बालिक राखहु लीला धारि ॥
देहु सुमति सदा गुण गावा मेरे ठाकुर अगम अपार ॥1॥ रहाउ ॥
जैसे जननि जठर महि प्रानी ओहु रहता नाम अधारि ॥
अनदु करै सासि सासि सम॑ारै ना पोहै अगनारि ॥2॥
पर धन पर दारा पर निंदा इन सिउ प्रीति निवारि ॥
चरन कमल सेवी रिद अंतरि गुर पूरे कै आधारि ॥3॥
ग्रिहु मंदर महला जो दीसहि ना कोई संगारि ॥
जब लगु जीवहि कली काल महि जन नानक नामु सम॑ारि ॥4॥37॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे ठाकुर !) आप बेअंत है।आप अदृष्ट है।आप ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।ये दिखाई देता जगत सारा आपका ही रचा हुआ है। हम आपके पैदा किए हुए जीवआपके सामने अपनी लयाकत का क्या दिखावा कर सकते हैं।जो कुछ हैं रहा है सब आपके हुकम के अंदर हैं रहा है। 1। हे मेरे सतिगुरू ! अपने बच्चों को अपना बेअंत करिश्मा बरता के (विकारों से) बचाए रख। हे मेरे अपहुँच और बेअंत ठाकुर !मुझे सुचॅजी मति दे कि मैं आपके गुण गाता रहूँ। 1।रहाउ। (हे ठाकुर ! ये आपकी ही लीला है जैसे) जीव माँ के पेट में रहता हुआ आपके नाम के आसरे जीता है (माँ के पेट में) वह हरेक सांस के साथ (आपका नाम) याद करता है और आत्मिक आनंद लेता है उसे माँ के पेट की आग का सेका नहीं लगता। 2। (हे ठाकुर ! जैसे आप माँ के पेट में रक्षा करता है वैसे ही अब भी) पराया धन।पराई स्त्री।पराई निंदा- इन विकारों से मेरी प्रीति दूर कर। (मेहर कर) पूरे गुरू का आसरा ले के मैं आपके सुंदर चरणों का ध्यान अपने हृदय में टिकाए रखूँ। 3। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) घर।मंदिर।महल।माढ़ियां जो भी आपको दिख रहे हैं इन में से कोई भी (अंत समय) आपके साथ नहीं जाएगा। (इस वास्ते) जब तक आप जगत में जी रहा है परमात्मा का नाम अपने हृदय में परोए रख (यही असली साथी है)। 4। 37।
आसा घरु 3 महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राज मिलक जोबन ग्रिह सोभा रूपवंतु जोुआनी ॥
बहुतु दरबु हसती अरु घोड़े लाल लाख बै आनी ॥
आगै दरगहि कामि न आवै छोडि चलै अभिमानी ॥1॥
काहे एक बिना चितु लाईऐ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत सदा सदा हरि धिआईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
महा बचित्र सुंदर आखाड़े रण महि जिते पवाड़े ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) हकूमत, जमीन की मल्कियत,जोबन,घर,इज्जत,सुंदरता,जवानी बहुत सारा धन,हाथी और घोड़े (अगर ये सब कुछ किसी मनुष्य के पास हो)।अगर लाखों रूपए खर्च के (कीमती) लाल मूल्य ले के आए (और इन पदार्थां का गुमान करता रहे)। पर आगे परमात्मा की दरगाह में (इनमें से कोई भी चीज) काम नहीं आती।(इन पदार्थों का) गुमान करने वाला मनुष्य (इन सभी को यहीं) छोड़ के (यहां से) दूर चल पड़ता है। 1। (हे भाई !) एक परमात्मा के बिना किसी और में प्रीति नहीं जोड़नी चाहिए। उठते बैठते सोते जागते सदा ही परमात्मा में सुरति जोड़े रखनी चाहिए। 1।रहाउ। अगर कोई मनुष्य बड़े आश्चर्यजनक रूप से सुंदर अखाड़े (भाव।कुश्तियां आदि) जीतता है अगर वह रणभूमि में जा के (बड़े-बड़े) झगड़े-लड़ाईयां जीत लेता है और

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसका हरेक किस्म का दुख-दर्द दूर हो जाता है उसको पुनः कभी कोई दुख नहीं घेर सकते।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।