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अंग 380

अंग
380
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हउ मारउ हउ बंधउ छोडउ मुख ते एव बबाड़े ॥
आइआ हुकमु पारब्रहम का छोडि चलिआ एक दिहाड़े ॥2॥
करम धरम जुगति बहु करता करणैहारु न जानै ॥
उपदेसु करै आपि न कमावै ततु सबदु न पछानै ॥
नांगा आइआ नांगो जासी जिउ हसती खाकु छानै ॥3॥
संत सजन सुनहु सभि मीता झूठा एहु पसारा ॥
मेरी मेरी करि करि डूबे खपि खपि मुए गवारा ॥
गुर मिलि नानक नामु धिआइआ साचि नामि निसतारा ॥4॥1॥38॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अपने मुंह से ऐसे अवा-तबा भी (बड़कें मारता है) बोलता है कि मैं (अपने वैरियों को) मार सकता हूँ (उनको) बाँध सकता हूँ (और अगर जी चाहे तो उन्हें कैद से) छोड़ भी सकता हूँ (तो भी क्या हुआ।) आखिर एक दिन परमात्मा का हुकम आता है (मौत आ जाती है।और) ये सब कुछ छोड़ के यहां से चला जाता है। 2। अगर कोई मनुष्य (औरों को दिखाने के लिए) अनेकों किस्मों के (निहित) धार्मिक कर्म करता हैं।पर सृजनहार प्रभू से सांझ ना डाले। यदि औरों को तो (धर्म का) उपदेश करता फिरे पर अपना धार्मिक जीवन ना बनाए।और परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की सार ना समझे। तो वह खाली हाथ जगत में आता है और यहां से खाली हाथ ही चला जाता है (उसके ये दिखावे के धार्मिक काम व्यर्थ ही जाते हैं) जैसे हाथी (स्नान करके फिर अपने ऊपर) मिट्टी डाल लेता है। 3। हे संत जनो ! हे सज्जनो ! हे मित्रो ! सारे सुन लो।ये सारा जगत पसारा नाशवंत है। जो लोग नित्य ये कहते रहे कि ये मेरी धन-दौलत है ये मेरी जायदाद है वह (माया-मोह के समुंद्र में) डूबे रहे और दुखी हो हो के आत्मिक मौत मरते रहे। हे नानक ! जिस मनुष्य ने सतिगुरू को मिल केपरमात्मा का नाम सिमरा।सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ के (इस संसार समुंद्र से) उसका पार-उतारा हो गया। 4। 1। 38।
रागु आसा घरु 5 महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भ्रम महि सोई सगल जगत धंध अंध ॥
कोऊ जागै हरि जनु ॥1॥
महा मोहनी मगन प्रिअ प्रीति प्रान ॥
कोऊ तिआगै विरला ॥2॥
चरन कमल आनूप हरि संत मंत ॥
कोऊ लागै साधू ॥3॥
नानक साधू संगि जागे गिआन रंगि ॥
वडभागे किरपा ॥4॥1॥39॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा घरु 5 महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) जगत के धंधों में अंधी होई हुई सारी दुनिया माया की भटकना में सोई पड़ी है। कोई दुर्लभ परमात्मा का भगत (इस मोह की नींद में से) जाग रहा है। 1। (हे भाई !) मन को मोह लेने वाली बली माया में दुनिया मस्त पड़ी है।(माया के साथ ये) प्रीति प्राणों से भी प्यारी लग रही है। कोई दुर्लभ मनुष्य ही (माया की इस प्रीति को) छोड़ता है। 2। (हे भाई !) परमात्मा के सोहाने सुंदर चरणों में। संत जनों के उपदेश में। कोई विरला गुरमुख मनुष्य ही चित्त जोड़ता है। 3। गुरू की संगति में आ के (गुरू के बख्शे) ज्ञान के रंग में (रंग के।माया के मोह की नींद में से) वह जागता रहता है। हे नानक ! जिस किसीभाग्यशाली मनुष्यपर प्रभू की कृपा हो जाए। 4। 1। 39।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु 6 महला 5 ॥
जो तुधु भावै सो परवाना सूखु सहजु मनि सोई ॥
करण कारण समरथ अपारा अवरु नाही रे कोई ॥1॥
तेरे जन रसकि रसकि गुण गावहि ॥
मसलति मता सिआणप जन की जो तूं करहि करावहि ॥1॥ रहाउ ॥
अंम्रितु नामु तुमारा पिआरे साधसंगि रसु पाइआ ॥
त्रिपति अघाइ सेई जन पूरे सुख निधानु हरि गाइआ ॥2॥
जा कउ टेक तुम॑ारी सुआमी ता कउ नाही चिंता ॥
जा कउ दइआ तुमारी होई से साह भले भगवंता ॥3॥
भरम मोह ध्रोह सभि निकसे जब का दरसनु पाइआ ॥
वरतणि नामु नानक सचु कीना हरि नामे रंगि समाइआ ॥4॥1॥40॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा घरु 6 महला 5 ॥ हे प्रभू ! जो कुछ आपको अच्छा लगता है वह आपके सेवकों को (सिर माथे पर) परवान होता है।आपकी रजा ही उनके मन में आनंद और आत्मिक अडोलता पैदा करती है। हे प्रभू ! आपको ही आपके दास सब कुछ करने और जीवों से कराने की ताकत रखने वाला मानते हैं।आप ही उनकी निगाह में बेअंत है। हे भाई ! परमात्मा के दासों को परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं दिखाई देता। 1। (हे प्रभू !) आपके दास बारंबार स्वाद से आपके गुण गाते रहते हैं। जो कुछ आप खुद करता है जो कुछ जीवों से कराता है (उसको सिर माथे पे मानना ही) आपके दासों के वास्ते समझदारी है (आत्मिक जीवन की अगुवाई के लिए) सलाह मश्वरा और फैसला हैं1।रहाउ। हे प्यारे प्रभू ! आपके दासों के वास्ते आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है।साध-संगति में बैठ के वह (आपके नाम का) रस लेते हैं। (हे भाई !) जिन्होंने सुखों के खजाने हरी की सिफत सालाह की।वह मनुष्य गुणों से भरपूर हो गए वही मनुष्य (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो गए। 2। हे प्रभू ! हे सवामी ! जिन मनुष्यों को आपका आसरा है उन्हें कोई चिंता छू नहीं सकती। हे स्वामी ! जिन पर आपकी मेहर हुई।वह (नाम-धन से) शाहूकार बन गए और भाग्यशाली हैं गए। 3। जब ही कोई मनुष्य परमात्मा के दर्शन करता है (उसके अंदर से) भटकना।मोह।ठॅगीयां आदि सारे विकार निकल जाते हैं। हे नानक ! (कह) वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम को अपना रोज काव्यवहार बना लेता है।वह प्रभू के प्रेम रंग में (रंग के) परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है। 4। 1। 40।
आसा महला 5 ॥
जनम जनम की मलु धोवै पराई आपणा कीता पावै ॥
ईहा सुखु नही दरगह ढोई जम पुरि जाइ पचावै ॥1॥
निंदकि अहिला जनमु गवाइआ ॥
पहुचि न साकै काहू बातै आगै ठउर न पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
किरतु पइआ निंदक बपुरे का किआ ओहु करै बिचारा ॥
तहा बिगूता जह कोइ न राखै ओहु किसु पहि करे पुकारा ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (निंदक) दूसरों के अनेकों जन्मों के किए विकारों की मैल धोता है (और वह मैल।वह अपने मन के अंदर संस्कारों के रूप में इकट्ठी कर लेता है।इस तरह वह) अपने किए कर्मों का बुरा फल स्वयं ही भोगता है। (निंदा के कारण उसको) इस लोक में सुख नहीं मिलता।परमात्मा की हजूरी में भी उसे आदर की जगह नहीं मिलती।वह नर्क में पहुँच के दुखी होता रहता है। 1। (हे भाई !) संत की निंदा करने वाले मनुष्य ने (निंदा के कारण अपना) कीमती मानस जनम गवा लिया। (संत की निंदा करके वह ये आशा करता है कि उन्हें दुनिया की नजरों में गिरा के मैं उनकी जगह आदर-सत्कार हासिल कर लूंगा।पर वह निंदक) किसी भी रूप में (संत जनों) की बराबरी नहीं कर सकता।(निेदा के कारण) आगे परलोक में भी उसे आदर की जगह नहीं मिलती। 1।रहाउ। पर निंदक के भी बस की बात नहीं (वह निंदा जैसे बुरे कर्म से हट नहीं सकता।क्योंकि) पिछले जन्मों के किए कर्मों के संस्कार उस दुर्भाग्यपूर्ण निंदक के पल्ले पड़ जाते हैं (उसके अंदर जाग पड़ते हैं और उसे निंदा की तरफ प्रेरित करते हैं)। निंदक ऐसी खराब हुई (निघरी हुई) आत्मिक दशा में ख्वार होता रहता है कि वहाँ (भाव।उस गिरी हुई निघरी दशा में से निकालने के लिए) कोई उसकी मदद नहीं कर सकता।सहायता के लिए वह किसी के पास पुकार करने के काबिल भी नहीं रहता। 2।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मुंह से ऐसे अवा-तबा भी (बड़कें मारता है) बोलता है कि मैं (अपने वैरियों को) मार सकता हूँ (उनको) बाँध सकता हूँ (और अगर जी चाहे तो उन्हें कैद से) छोड़ भी सकता हूँ (तो भी क्या हुआ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।