भई परापति मानुख देहुरीआ ॥
गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥
अवरि काज तेरै कितै न काम ॥
मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥1॥
सरंजामि लागु भवजल तरन कै ॥
जनमु ब्रिथा जात रंगि माइआ कै ॥1॥ रहाउ ॥
जपु तपु संजमु धरमु न कमाइआ ॥
सेवा साध न जानिआ हरि राइआ ॥
कहु नानक हम नीच करंमा ॥
सरणि परे की राखहु सरमा ॥2॥29॥
तुझ बिनु अवरु नाही मै दूजा तूं मेरे मन माही ॥
तूं साजनु संगी प्रभु मेरा काहे जीअ डराही ॥1॥
तुमरी ओट तुमारी आसा ॥
बैठत ऊठत सोवत जागत विसरु नाही तूं सास गिरासा ॥1॥ रहाउ ॥
राखु राखु सरणि प्रभ अपनी अगनि सागर विकराला ॥
नानक के सुखदाते सतिगुर हम तुमरे बाल गुपाला ॥2॥30॥
हरि जन लीने प्रभू छडाइ ॥
प्रीतम सिउ मेरो मनु मानिआ तापु मुआ बिखु खाइ ॥1॥ रहाउ ॥
पाला ताऊ कछू न बिआपै राम नाम गुन गाइ ॥
डाकी को चिति कछू न लागै चरन कमल सरनाइ ॥1॥
संत प्रसादि भए किरपाला होए आपि सहाइ ॥
गुन निधान निति गावै नानकु सहसा दुखु मिटाइ ॥2॥31॥
अउखधु खाइओ हरि को नाउ ॥
सुख पाए दुख बिनसिआ थाउ ॥1॥
तापु गइआ बचनि गुर पूरे ॥
अनदु भइआ सभि मिटे विसूरे ॥1॥ रहाउ ॥
जीअ जंत सगल सुखु पाइआ ॥
पारब्रहमु नानक मनि धिआइआ ॥2॥32॥
बांछत नाही सु बेला आई ॥
बिनु हुकमै किउ बुझै बुझाई ॥1॥
ठंढी ताती मिटी खाई ॥
ओहु न बाला बूढा भाई ॥1॥ रहाउ ॥
नानक दास साध सरणाई ॥
गुर प्रसादि भउ पारि पराई ॥2॥33॥
सदा सदा आतम परगासु ॥
साधसंगति हरि चरण निवासु ॥1॥
राम नाम निति जपि मन मेरे ॥
सीतल सांति सदा सुख पावहि किलविख जाहि सभे मन तेरे ॥1॥ रहाउ ॥
कहु नानक जा के पूरन करम ॥
सतिगुर भेटे पूरन पारब्रहम ॥2॥34॥
दूजे घर के चउतीस ॥
जा का हरि सुआमी प्रभु बेली ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आसा महला 5 दुपदे ॥ हे भाई ! आपको मनुष्य जनम के सोहणे शरीर की प्राप्ति हुई है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।