पूरा गुरु पूरी बणत बणाई ॥ नानक भगत मिली वडिआई ॥4॥24॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! परमात्मा सबसे बड़ा है उसमें कोई कमी नहीं है उसकी बनाई हुई रचना भी कमी-रहित है। परमात्मा की भक्ति करने वालों को (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 4। 24।
आसा महला 5 ॥ गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥ गुर का दरसनु संचहु हरि धनु ॥1॥ ऊतम मति मेरै रिदै तूं आउ ॥ धिआवउ गावउ गुण गोविंदा अति प्रीतम मोहि लागै नाउ ॥1॥ रहाउ ॥ त्रिपति अघावनु साचै नाइ ॥ अठसठि मजनु संत धूराइ ॥2॥ सभ महि जानउ करता एक ॥ साधसंगति मिलि बुधि बिबेक ॥3॥ दासु सगल का छोडि अभिमानु ॥ नानक कउ गुरि दीनो दानु ॥4॥25॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़ के (अपने) इस मन को नए सिरे से घड़ो। (गुरू का शबद ही) गुरू का दीदार है (इस शबद की बरकति से) परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो। 1। हे श्रेष्ठ मति ! (अगर गुरू मेहर करे तो) आप मेरे अंदर आ के बस ता कि मैं परमात्मा के गुण गाऊँ परमात्मा का ध्यान धरूँ और परमात्मा का नाम मुझे बहुत प्यारा लगने लगे। 1।रहाउ। (गुरू के द्वारा) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से तृष्णा खत्म हो जाती है।मन की भूख मिट जाती है। (हे भाई !) गुरू के चरणों की धूड़ अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। 2। (हे भाई !)मैं अब सभी में एक करतार को ही बसता पहचानता हूँ। गुरू की संगति में मिल के मैंने अच्छे-बुरे की परख करने वाली बुद्धि प्राप्त कर ली है 3। मैं अहंकार त्याग के सभी का दास बन गया हूँ। (हे भाई ! मुझे) नानक को गुरू ने (बिबेक बुद्धि की ऐसी) दाति बख्शी है 4। 25।
आसा महला 5 ॥ बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥ ता ते बिनसी दुरमति दूरी ॥1॥ ऐसी गुरमति पाईअले ॥ बूडत घोर अंध कूप महि निकसिओ मेरे भाई रे ॥1॥ रहाउ ॥ महा अगाह अगनि का सागरु ॥ गुरु बोहिथु तारे रतनागरु ॥2॥ दुतर अंध बिखम इह माइआ ॥ गुरि पूरै परगटु मारगु दिखाइआ ॥3॥ जाप ताप कछु उकति न मोरी ॥ गुर नानक सरणागति तोरी ॥4॥26॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई ! गुरू की कृपा से मेरी) बुद्धि में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है मेरी अक्ल कमी-रहित हो गई है। इसकी सहायता से मेरी बुरी मति का नाश हो गया है।मेरी परमात्मा से दूरी मिट गई है। 1। हे मेरे भाई ! मैंने गुरू से ऐसी बुद्धि प्राप्त कर ली है जिसकी मदद से मैं माया के घुप अंधेरे कूँऐ से डूबता-डूबता बच निकला हूँ। 1।रहाउ। (हे भाई ! ये संसार की तृष्णा की) आग एक बड़ा अथाह समुंद्र है। रत्नों की खान गुरू (मानो) जहाज है जो (इस समुंद्र में से) पार लंघा लेता है। 2। (हे भाई !) यह माया (मानो।एक समुंद्र है जिस में से) पार लांघना मुश्किल है जिस में घोर अंधेरा ही अंधेरा है (इस में से पार लांघने के लिए) पूरे गुरू ने मुझे साफ रास्ता दिखा दिया है। 3। हे नानक ! (कह) हे गुरू ! मेरे पास कोई जप नहीं कोई तप नहीं कोई सियानप नहीं। मैं तो आपकी ही शरण आया हूँ (मुझे इस घोर अंधकार में से निकाल ले)। 4। 26।
आसा महला 5 तिपदे 2 ॥ हरि रसु पीवत सद ही राता ॥ आन रसा खिन महि लहि जाता ॥ हरि रस के माते मनि सदा अनंद ॥ आन रसा महि विआपै चिंद ॥1॥ हरि रसु पीवै अलमसतु मतवारा ॥ आन रसा सभि होछे रे ॥1॥ रहाउ ॥ हरि रस की कीमति कही न जाइ ॥ हरि रसु साधू हाटि समाइ ॥ लाख करोरी मिलै न केह ॥ जिसहि परापति तिस ही देहि ॥2॥ नानक चाखि भए बिसमादु ॥ नानक गुर ते आइआ सादु ॥ ईत ऊत कत छोडि न जाइ ॥ नानक गीधा हरि रस माहि ॥3॥27॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 तिपदे 2 ॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम-अमृत पीने वाला मनुष्य (नाम-रंग में) सदा रंगा रहता है (क्योंकि नाम-रस का असर कभी दूर नहीं होता। इसके अलावा दुनिया के पदार्थों के) अन्य रसों का असर एक पल में उतर जाता है। परमात्मा के नाम-रस के मतवाले मनुष्य के मन में सदा आनंद टिका रहता है। पर दुनिया के पदार्थों के स्वादों में पड़े को चिंता आ दबाती है। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम अमृत पीता है वह उस रस में पूरी तौर से मस्त रहता है वह उस नाम रस का आशिक बन जाता है। उसे दुनिया के और सारे रस (नाम-रस के मुकाबले) फीके प्रतीत होते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! हरि-नाम-रस दुनिया के धन-पदार्थों के बदले में नहीं मिल सकता) परमात्मा के नाम-रस का मूल्य (धन-पदार्थ के रूप में) बयान नहीं किया जा सकता। ये नाम-रस गुरू के हाट में (गुरू की संगति में) सदा टिका रहता है। लाखों-करोड़ों रुपए दे के भी ये किसी को नहीं मिल सकता। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के भाग्यों में तूने इसकी प्राप्ति लिखी है उसी को आप स्वयं देता है। 2। (ये नाम-रस) चख के (कोई इसका स्वाद बयान नहीं कर सकता।यदि कोई यत्न करे तो) हैरान सा होता है (क्योंकि वह अपने आप को इस रस के असर को बयान करने में अस्मर्थ पाता है)। इस हरि-नाम-रस का आनंद गुरू से ही प्राप्त होता है (जिसे एक बार इसकी प्राप्ति हो गई वह) इस लोक और परलोक में (किसी भी और पदार्थ की खातिर) इस नाम-रस को छोड़ के नहीं जाता। हे नानक ! वह सदा हरि-नाम-रस में ही मस्त रहता है। 3। 27।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (गुरू का उपदेश आपके अंदर से) काम-क्रोध-लोभ-मोह को मिटा देगा।आपकी अपनी ही पैदा की हुई कुमति (आपके अंदर से) मिट जाएगी। हे सुंदरी ! अगर आप गुमान त्याग के प्रभू की सेवा भक्ति करेगी तो प्रभू-प्रीतम के मन को प्यारी लगेगी। 1। हे सुंदरी ! हे अपने मन में आत्मिक आनंद टिकाए रखने की चाहवान जीव-स्त्री ! गुरू के बचन सुन के (अपने आप को संसार समुंद्र में डूबने से) बचा। (गुरू की बाणी की बरकति से) आपका दुख मिट जाएगा आपकी माया की भूख मिट जाएगी आप आत्मिक आनंद पाएगी। 1।रहाउ। हे सुंदरी ! गुरू के चरण धो के गुरू की (बताई) सेवा करा कर।आपकी आत्मा पवित्र हैं जाएगी (ये सेवा आपके अंदर से आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाले माया-मोह के) जहर को दूर कर देगी।माया की तृष्णा को मिटा दो। (हे सुंदरी !) अगर आप परमात्मा के सेवकों की दासी बन जाए।निमाणी सी दासी बन जाए।तो आप परमात्मा की हजूरी में शोभा-आदर हासिल करेगी। 2। (हे सुंदरी !) यही कुछ आपके वास्ते धार्मिक रस्मों के करने योग्य है यही आपका नित्य का व्यवहार होना चाहिए।परमात्मा की रजा को सिर-माथे मान (इस तरह की हुई) आपकी प्रभू-भक्ति (प्रभू दर पर) प्रवान हैं जाएगी। हे नानक ! जो भी मनुष्य इस उपदेश को कमाता है (अपने जीवन में उपयोग करता है) वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 3। 28।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! परमात्मा सबसे बड़ा है उसमें कोई कमी नहीं है उसकी बनाई हुई रचना भी कमी-रहित है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।