प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥ दुतीआ तेरी मनीऐ पांति ॥ त्रितीआ तेरा सुंदर थानु ॥ बिगड़ रूपु मन महि अभिमानु ॥1॥ सोहनी सरूपि सुजाणि बिचखनि ॥ अति गरबै मोहि फाकी तूं ॥1॥ रहाउ ॥ अति सूची तेरी पाकसाल ॥ करि इसनानु पूजा तिलकु लाल ॥ गली गरबहि मुखि गोवहि गिआन ॥ सभि बिधि खोई लोभि सुआन ॥2॥ कापर पहिरहि भोगहि भोग ॥ आचार करहि सोभा महि लोग ॥ चोआ चंदन सुगंध बिसथार ॥ संगी खोटा क्रोधु चंडाल ॥3॥ अवर जोनि तेरी पनिहारी ॥ इसु धरती महि तेरी सिकदारी ॥ सुइना रूपा तुझ पहि दाम ॥ सीलु बिगारिओ तेरा काम ॥4॥ जा कउ द्रिसटि मइआ हरि राइ ॥ सा बंदी ते लई छडाइ ॥ साधसंगि मिलि हरि रसु पाइआ ॥ कहु नानक सफल ओह काइआ ॥5॥ सभि रूप सभि सुख बने सुहागनि ॥ अति सुंदरि बिचखनि तूं ॥1॥ रहाउ दूजा ॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: (हे जीव स्त्री ! देख) पहले तो आपकी (मनुष्य जन्म वाली) बढ़िया जाति है; दूसरा आपका खानदान भी जाना-माना है; तीसरा आपका सुंदर शरीर है। पर आपका रूप कोझा ही रहा (क्योंकि) आपके मन में अहंकार है। 1। (हे जीव-स्त्री !) आप (देखने में) सुंदर है। रूपवती है। सियानी है चतुर है। पर आप बड़े अहंकार और मोह में फंसी हुई है। 1। रहाउ। (हे जीव-स्त्री !) आपकी बड़ी स्वच्छ (साफ) रसोई है (जिसमें आप अपना भोजन तैयार करती है। बाकी पशु-पक्षी तो बिचारे गंदी-मंदी जगहों पर ही पेट भर लेते हैं)। आप स्नान करके पूजा भी कर सकती है माथे पर तिलक भी लगा लेती है। आप बातों से अपना आप भी जता लेती है (पशु-पक्षियों को तो ये दाति नहीं मिली) मुंह से ज्ञान की बाते भी कर सकती है। पर कुत्ते लोभ ने आपकी ये हरेक किस्म की वडिआई गवा दी है। 2। (हे जीव स्त्री !) आप (सुंदर) कपड़े पहनती है (दुनिया के सारे) भोग भोगती है। जगत में शोभा कमाने के लिए विभिन्न आचरण करती है आप इ़त्र चंदन और अनेको सुगंधियां बरतती हैं। पर चण्डाल क्रोध आपका बुरा साथी है। 3। (हे जीव स्त्री !) और सारी जूनियां आपकी सेवक हैं। इस धरती पर आपकी ही सरदारी है। आपके पास सोना है चाँदी है धन-पदार्थ है (और जोनियों के पास यह चीजें नहीं हैं) पर काम-वासना ने आपका स्वभाव (जो सबसे उच्च श्रेणी वालों को फबता है) बिगाड़ा हुआ है। 4। हे नानक ! जिस जीव स्त्री पर प्रभू-पातशाह की मेहर की नज़र पड़ती है। उसको वह (लोभ। क्रोध काम आदि की) कैद से छुड़ा लेता है। जिस शरीर ने (जीव ने मानस शरीर प्राप्त करके) साध-संगति में मिल के परमात्मा के नाम का स्वाद पाया। हे नानक ! वही शरीर कामयाब है। 5। (हे जीव स्त्री !) अगर आप पति-प्रभू वाली बन जाए तो सारे सोहज और सारे सुख (जो आपको मिले हुए हैं) आपको फॅब जाएं; आप सचमुच बड़ी सुंदर और बड़ी सियानी बन जाए1। रहाउ। दूजा। 12।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 इकतुके 2 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य (माया के मान के आसरे) जीवित दिखता है उसे जरूर आत्मिक मौत हड़प किए रखती है; पर जो मनुष्य (माया के मान से) अछूता है उसे अटॅल आत्मिक जीवन मिला रहता है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य माया के मद में मस्त रहते हैं वे आत्मिक मौत मरे रहते हैं। पर जो मनुष्य माया के मान से अछोह हैं वे आत्मिक जीवन वाले हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम-दारू अपने मुंह में रखा (आत्मिक मौत वाला रोग उनके अंदर से दूर हो गया) गुरू के शबद की बरकति से उन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया। 1। रहाउ। (हे भाई ! जैसे) कच्चा घड़ा जरूर नाश होने वाला है (वैसे ही माया से भी साथ आखिर अवश्य टूटता है। माया के मान में दूसरोंके साथ खीझना मूर्खता है) जिस मनुष्य के अंदर (माया के मान के कारण पैदा हुई) खीझ नहीं रहती। उसका निवास (सदा) प्रभू-चरणों में रहता है। 2। (हे भाई ! माया में) जो मनुष्य सिर ऊँचा किए रखता है (अकड़ा फिरता है) वह आत्मिक मौत के गड्ढे में पड़ा रहता है। पर। जो मनुष्य सदा विनम्रता धारता है उसे आत्मिक मौत छू नहीं सकती। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य (माया की खातिर ही सदा) भटकते फिरते हैं (आत्मिक जीवन की दाति में से) उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। पर। जिन्होंने गुरू शबद को (अपने जीवन में) प्रयोग में लिया है वह (माया के मोह की ओर से) अडोल-चित्त रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने ये जिंद ये शरीर सब कुछ को परमात्मा की दी हुई दाति समझा है वे गुरू को मिल के सदा खिले माथे रहते हैं (उनकी त्रिकुटी खत्म हो जाती है अंदर की खिझ समाप्त हो जाती है)। 4। 13।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (ये ठीक है कि परमात्मा ने) आपका ये शरीर बड़ी सियानप से बनाया है। (पर ये भी) सच जान कि (इस शरीर ने आखिर) मिट्टी हो जाना है। 1। हे गाफिल जीव ! हे मूर्ख जीव ! (जिससे आप पैदा हुआ है उस) मूल (-प्रभू) को (हृदय में सदा) संभाल के रख। इस तुच्छ आधार वाले शरीर पर आप क्या गुमान करता है। 1। रहाउ। (आप जगत में एक) मेहमान है जिसे रोजाना का तीन सेर (कच्चा आटा आदि) मिलता है। और सारी चीज आपके पास अमानत (के तौर पर ही पड़ी) है। 2। (आपके अंदर की) विष्टा हड्डियां और लहू (आदि बाहरी) चमड़ी से लपेटे हुए हैं पर आप इस पर ही मान किए जा रहा है। 3। अगर आप एक प्रभू के नाम-पदार्थ के साथ सांझ डाल ले तो आप पवित्र जीवन वाला हैं जाए। प्रभू के नाम के साथ सांझ डाले बिना आप सदा ही अपवित्र है। 4। हे नानक ! कह, (हे मूर्ख जीव !) उस गुरू से सदके हो जिसके द्वारा सबके दिलों की जानने वाला सर्व-व्यापक परमात्मा मिल सकता है। 5। 14। आसा महला 5 इकतुके चउपदे ॥ (हे भाई ! प्रभू-पति के विछोड़े में) एक पल भी एक दिन भी मुझे (ऐसा प्रतीत होता है कि) कभी खत्म ही नहीं होता। मेरे मन में बड़ी ललक लगी रहती है कि मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए जो मुझे प्रभू पति से मिला दे। 1। रहाउ। (हे भाई !) दिन की एक घड़ी भी (प्रभू-पति के विछोड़े में) मुझे कई कई दिनों के बराबर प्रतीत होती है
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे जीव स्त्री ! देख) पहले तो आपकी (मनुष्य जन्म वाली) बढ़िया जाति है; दूसरा आपका खानदान भी जाना-माना है; तीसरा आपका सुंदर शरीर है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।