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अंग ३७४ · आसा

अंग
374
आसा
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  1. प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥
  2. जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥
  3. पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥
  4. इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥

प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥

अंग ३७३ से चला आ रहा अंश

प्रथमे तेरी नीकी जाति ॥
दुतीआ तेरी मनीऐ पांति ॥
त्रितीआ तेरा सुंदर थानु ॥
बिगड़ रूपु मन महि अभिमानु ॥1॥
सोहनी सरूपि सुजाणि बिचखनि ॥
अति गरबै मोहि फाकी तूं ॥1॥ रहाउ ॥
अति सूची तेरी पाकसाल ॥
करि इसनानु पूजा तिलकु लाल ॥
गली गरबहि मुखि गोवहि गिआन ॥
सभि बिधि खोई लोभि सुआन ॥2॥
कापर पहिरहि भोगहि भोग ॥
आचार करहि सोभा महि लोग ॥
चोआ चंदन सुगंध बिसथार ॥
संगी खोटा क्रोधु चंडाल ॥3॥
अवर जोनि तेरी पनिहारी ॥
इसु धरती महि तेरी सिकदारी ॥
सुइना रूपा तुझ पहि दाम ॥
सीलु बिगारिओ तेरा काम ॥4॥
जा कउ द्रिसटि मइआ हरि राइ ॥
सा बंदी ते लई छडाइ ॥
साधसंगि मिलि हरि रसु पाइआ ॥
कहु नानक सफल ओह काइआ ॥5॥
सभि रूप सभि सुख बने सुहागनि ॥
अति सुंदरि बिचखनि तूं ॥1॥ रहाउ दूजा ॥12॥

हिन्दी अर्थ: (हे जीव स्त्री ! देख) पहले तो आपकी (मनुष्य जन्म वाली) बढ़िया जाति है; दूसरा आपका खानदान भी जाना-माना है; तीसरा आपका सुंदर शरीर है। पर आपका रूप कोझा ही रहा (क्योंकि) आपके मन में अहंकार है। 1। (हे जीव-स्त्री !) आप (देखने में) सुंदर हैं। रूपवती हैं। सियानी हैं, चतुर हैं। पर आप बड़े अहंकार और मोह में फंसी हुई हैं। 1। रहाउ। (हे जीव-स्त्री !) आपकी बड़ी स्वच्छ (साफ) रसोई है (जिसमें आप अपना भोजन तैयार करती हैं। बाकी पशु-पक्षी तो बिचारे गंदी-मंदी जगहों पर ही पेट भर लेते हैं)। आप स्नान करके पूजा भी कर सकती हैं माथे पर तिलक भी लगा लेती हैं। आप बातों से अपना आप भी जता लेती हैं (पशु-पक्षियों को तो ये दाति नहीं मिली) मुंह से ज्ञान की बातें भी कर सकती हैं। पर कुत्ते लोभ ने आपकी ये हरेक किस्म की वडिआई गवा दी है। 2। (हे जीव स्त्री !) आप (सुंदर) कपड़े पहनती हैं (दुनिया के सारे) भोग भोगती हैं। जगत में शोभा कमाने के लिए विभिन्न आचरण करती हैं आप इ़त्र चंदन और अनेको सुगंधियां बरतती हैं। पर चण्डाल क्रोध आपका बुरा साथी है। 3। (हे जीव स्त्री !) और सारी जूनियां आपकी सेवक हैं। इस धरती पर आपकी ही सरदारी है। आपके पास सोना है चाँदी है धन-पदार्थ है (और जोनियों के पास यह चीजें नहीं हैं) पर काम-वासना ने आपका स्वभाव (जो सबसे उच्च श्रेणी वालों को फबता है) बिगाड़ा हुआ है। 4। हे नानक ! जिस जीव स्त्री पर प्रभू-पातशाह की मेहर की नज़र पड़ती है। उसको वह (लोभ। क्रोध काम आदि की) कैद से छुड़ा लेता है। जिस शरीर ने (जीव ने मानस शरीर प्राप्त करके) साध-संगति में मिल के परमात्मा के नाम का स्वाद पाया। हे नानक ! वही शरीर कामयाब है। 5। (हे जीव स्त्री !) अगर आप पति-प्रभू वाली बन जाएँ तो सारे सोहज और सारे सुख (जो आपको मिले हुए हैं) आपको फॅब जाएं; आप सचमुच बड़ी सुंदर और बड़ी सियानी बन जाएँ। 1। रहाउ। दूजा। 12।

जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥

आसा महला 5 इकतुके 2 ॥
जीवत दीसै तिसु सरपर मरणा ॥
मुआ होवै तिसु निहचलु रहणा ॥1॥
जीवत मुए मुए से जीवे ॥
हरि हरि नामु अवखधु मुखि पाइआ गुर सबदी रसु अंम्रितु पीवे ॥1॥ रहाउ ॥
काची मटुकी बिनसि बिनासा ॥
जिसु छूटै त्रिकुटी तिसु निज घरि वासा ॥2॥
ऊचा चड़ै सु पवै पइआला ॥
धरनि पड़ै तिसु लगै न काला ॥3॥
भ्रमत फिरे तिन किछू न पाइआ ॥
से असथिर जिन गुर सबदु कमाइआ ॥4॥
जीउ पिंडु सभु हरि का मालु ॥
नानक गुर मिलि भए निहाल ॥5॥13॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 इकतुके 2 ॥ (हे भाई !) जो मनुष्य (माया के मान के आसरे) जीवित दिखता है उसे जरूर आत्मिक मौत हड़प किए रखती है; पर जो मनुष्य (माया के मान से) अछूता है उसे अटॅल आत्मिक जीवन मिला रहता है। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य माया के मद में मस्त रहते हैं वे आत्मिक मौत मरे रहते हैं। पर जो मनुष्य माया के मान से अछोह हैं वे आत्मिक जीवन वाले हैं। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम-दारू अपने मुंह में रखा (आत्मिक मौत वाला रोग उनके अंदर से दूर हो गया) गुरू के शबद की बरकति से उन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीया। 1। रहाउ। (हे भाई ! जैसे) कच्चा घड़ा जरूर नाश होने वाला है (वैसे ही माया से भी साथ आखिर अवश्य टूटता है। माया के मान में दूसरोंके साथ खीझना मूर्खता है) जिस मनुष्य के अंदर (माया के मान के कारण पैदा हुई) खीझ नहीं रहती। उसका निवास (सदा) प्रभू-चरणों में रहता है। 2। (हे भाई ! माया में) जो मनुष्य सिर ऊँचा किए रखता है (अकड़ा फिरता है) वह आत्मिक मौत के गड्ढे में पड़ा रहता है। पर। जो मनुष्य सदा विनम्रता धारता है उसे आत्मिक मौत छू नहीं सकती। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य (माया की खातिर ही सदा) भटकते फिरते हैं (आत्मिक जीवन की दाति में से) उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। पर। जिन्होंने गुरू शबद को (अपने जीवन में) प्रयोग में लिया है वह (माया के मोह की ओर से) अडोल-चित्त रहते हैं। हे नानक ! जिन मनुष्यों ने ये जिंद ये शरीर सब कुछ को परमात्मा की दी हुई दाति समझा है वे गुरू को मिल के सदा खिले माथे रहते हैं (उनकी त्रिकुटी खत्म हो जाती है अंदर की खिझ समाप्त हो जाती है)। ५।१३।

पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥

आसा महला 5 ॥
पुतरी तेरी बिधि करि थाटी ॥
जानु सति करि होइगी माटी ॥1॥
मूलु समालहु अचेत गवारा ॥
इतने कउ तुम॑ किआ गरबे ॥1॥ रहाउ ॥
तीनि सेर का दिहाड़ी मिहमानु ॥
अवर वसतु तुझ पाहि अमान ॥2॥
बिसटा असत रकतु परेटे चाम ॥
इसु ऊपरि ले राखिओ गुमान ॥3॥
एक वसतु बूझहि ता होवहि पाक ॥
बिनु बूझे तूं सदा नापाक ॥4॥
कहु नानक गुर कउ कुरबानु ॥
जिस ते पाईऐ हरि पुरखु सुजानु ॥5॥14॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (ये ठीक है कि परमात्मा ने) आपका ये शरीर बड़ी सियानप से बनाया है। (पर ये भी) सच जान कि (इस शरीर ने आखिर) मिट्टी हो जाना है। 1। हे गाफिल जीव ! हे मूर्ख जीव ! (जिससे आप पैदा हुए हैं उस) मूल (-प्रभू) को (हृदय में सदा) संभाल के रख। इस तुच्छ आधार वाले शरीर पर आप क्या गुमान करते हैं। 1। रहाउ। (आप जगत में एक) मेहमान हैं जिसे रोजाना का तीन सेर (कच्चा आटा आदि) मिलता है। और सारी चीज आपके पास अमानत (के तौर पर ही पड़ी) है। 2। (आपके अंदर की) विष्टा हड्डियां और लहू (आदि बाहरी) चमड़ी से लपेटे हुए हैं पर आप इस पर ही मान किए जा रहे हैं। 3। अगर आप एक प्रभू के नाम-पदार्थ के साथ सांझ डाल ले तो आप पवित्र जीवन वाला हो जाए। प्रभू के नाम के साथ सांझ डाले बिना आप सदा ही अपवित्र हैं। 4। हे नानक ! कह, (हे मूर्ख जीव !) उस गुरू से सदके हो जिसके द्वारा सबके दिलों की जानने वाला सर्व-व्यापक परमात्मा मिल सकता है। 5। 14।

इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥

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आसा महला 5 इकतुके चउपदे ॥
इक घड़ी दिनसु मो कउ बहुतु दिहारे ॥
मनु न रहै कैसे मिलउ पिआरे ॥1॥
इकु पलु दिनसु मो कउ कबहु न बिहावै ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 इकतुके चउपदे ॥ (हे भाई ! प्रभू-पति के विछोड़े में) एक पल भी एक दिन भी मुझे (ऐसा प्रतीत होता है कि) कभी खत्म ही नहीं होता। मेरे मन में बड़ी ललक लगी रहती है कि मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए जो मुझे प्रभू पति से मिला दे। 1। रहाउ। (हे भाई !) दिन की एक घड़ी भी (प्रभू-पति के विछोड़े में) मुझे कई कई दिनों के बराबर प्रतीत होती है

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३७४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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