दरसन की मनि आस घनेरी कोई ऐसा संतु मो कउ पिरहि मिलावै ॥1॥ रहाउ ॥ चारि पहर चहु जुगह समाने ॥ रैणि भई तब अंतु न जाने ॥2॥ पंच दूत मिलि पिरहु विछोड़ी ॥ भ्रमि भ्रमि रोवै हाथ पछोड़ी ॥3॥ जन नानक कउ हरि दरसु दिखाइआ ॥ आतमु चीनि॑ परम सुखु पाइआ ॥4॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (प्रभू-पति के मिलाप के बिना) मेरा मन धीरज नहीं धरता (मैं हर समय सोचती रहती हूँ कि) प्यारे को कैसे मिलूँ। 1। (दिन के) चार पहर (विछोड़े में मुझे) चार युगों के बराबर लगते हैं। जब रात आ पड़ती है फिर तो वह खत्म होने में ही नहीं आती। 2। (कामादिक) पाँचों वैरियों ने मिल के (जिस भी जीव-स्त्री को) प्रभू-पति से विछोड़ा है वह भटक-भटक के रोती है ओर पछताती है। 3। हे दास नानक ! (जिस जीव को) परमात्मा ने दर्शन दिया उसने अपने आत्मिक जीवन को पड़ताल के (आत्म-चिंतन करके) सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया। 4। 15।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मुंह से उचारना- ये परमात्मा की सेवा है। और परमात्मा की सेवा में सब से ऊँचा (आत्मिक जीवन का) खजाना (छुपा हुआ है)। 1। (हे भाई !) परमात्मा मेरा साथी है मित्र है। दुख के समय सुख के वक्त (जब भी) मैं उसको याद करता हूँ। वह वहाँ हाजिर होता है, सो विचारा जम (यम) मुझे कहाँ डरा सकता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा ही मेरी ओट है। मुझे परमात्मा का ही सहारा है। परमात्मा मेरा मित्र है। मुझे अपने मन में परमात्मा का ही आसरा है। 2। परमात्मा (का नाम ही) मेरी राशि-पूँजी है। परमात्मा (का नाम ही) मेरे वास्ते (आत्मिक जीवन का व्यापार करने के लिए) साख है (ऐतबार का वसीला है)। गुरू की शरण पड़ के मैं नाम-धन कमा रहा हूँ। परमात्मा ही मेरा शाह है (जो मुझे नाम-धन का सरमाया देता है)। 3। दास नानक (कहता है कि जिस मनुष्य को) गुरू की कृपा से इस व्यापार की समझ आ जाती है वह सदा परमात्मा की गोद में लीन रहता है। 4। 16।
आसा महला 5 ॥ प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥ सतिगुरु सेवि सभै फल पाई ॥1॥ मन किउ बैरागु करहिगा सतिगुरु मेरा पूरा ॥ मनसा का दाता सभ सुख निधानु अंम्रित सरि सद ही भरपूरा ॥1॥ रहाउ ॥ चरण कमल रिद अंतरि धारे ॥ प्रगटी जोति मिले राम पिआरे ॥2॥ पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ ॥ अनहद बाणी नादु वजाइआ ॥3॥ गुरु नानकु तुठा मिलिआ हरि राइ ॥ सुखि रैणि विहाणी सहजि सुभाइ ॥4॥17॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) यदि परमात्मा दयावान हो तो ही मैं ये मन (गुरू के चरणों में) जोड़ सकता हूँ। तब ही गुरू की (बताई) सेवा करके मन-इच्छित फल प्राप्त कर सकता हूँ। 1। हे मेरे मन ! आप क्यूँ घबराता है। (यकीन रख। आपके सिर पर वह) प्यारा सतिगुरू (रखवाला) है जो मन की जरूरतें पूरी करने वाला है जो सारे सुखों का खजाना है और जिस अमृत के सरोवर-गुरू में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नाको-नाक भरा हुआ है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने अपने हृदय में (गुरू के) सुंदर चरण टिका लिए हैं (उसके अंदर) परमात्माकी ज्योति जग पड़ी, उसे प्यारा प्रभू मिल गया। 2। उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों ने मिल के मंगल गीत गाए परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी का बाजा एक-रस बजाना शुरू कर दिया। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पे गुरू प्रसन्न हो गया उसे प्रभू पातशाह मिल गया। उसकी (जिंदगी की) रात सुख में आत्मिक अडोलता में बीतने लगी। 4। 17।
आसा महला 5 ॥ करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥ मिलि सतिगुर धनु पूरा पाइआ ॥1॥ ऐसा हरि धनु संचीऐ भाई ॥ भाहि न जालै जलि नही डूबै संगु छोडि करि कतहु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥ तोटि न आवै निखुटि न जाइ ॥ खाइ खरचि मनु रहिआ अघाइ ॥2॥ सो सचु साहु जिसु घरि हरि धनु संचाणा ॥ इसु धन ते सभु जगु वरसाणा ॥3॥ तिनि हरि धनु पाइआ जिसु पुरब लिखे का लहणा ॥ जन नानक अंति वार नामु गहणा ॥4॥18॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (हे भाई !) परमात्मा कृपा करके उसके अंदर स्वयं आ के प्रत्यक्ष होता है- जिस मनुष्य ने सतिगुरू को मिल के कभी ना कम होने वाला नाम-धन हासिल कर लिया। 1। हे वीर ! ऐसा परमात्मा का नाम-धन एकत्र करना चाहिए जिसे आग जला नहीं सकती जो पानी में डूबता नहीं और जो साथ छोड़ के किसी भी और जगह नहीं जाता। 1। रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा का नाम ऐसा धन है जिस में) कभी घाटा नहीं पड़ता जो कभी नहीं खत्म होता। ये धन खुद बरत के औरों को बाँट के (मनुष्य का) मन (दुनिया की धन-लालसा की ओर से) संतुष्ट (तृप्त) रहता है। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय-घर में परमात्मा का नाम-धन जमा हो जाता है वही मनुष्य सदा के लिए शाहूकार बन जाता है। उसके इस धन से सारा जगत लाभ उठाता है। 3। (पर हे भाई !) उस मनुष्य ने ये हरि-धन हासिल किया है। जिसके भाग्यों में पूर्बले किए भले कर्मों के संस्कारों के अनुसार इसकी प्राप्ति लिखी होती है। हे दास नानक ! (कह) परमात्मा का नाम-धन (मनुष्य की जिंद के वास्ते) आखिरी वक्त का गहना है। 4। 18।
आसा महला 5 ॥ जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥ काची पाकी बाढि परानी ॥1॥ जो जनमै सो जानहु मूआ ॥ गोविंद भगतु असथिरु है थीआ ॥1॥ रहाउ ॥ दिन ते सरपर पउसी राति ॥ रैणि गई फिरि होइ परभाति ॥2॥ माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥ गुर प्रसादि को विरला जागे ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्राणी ! (जैसे) कोई किसान खेती बीजता है (और जब जी चाहे) उसे काट लेता है (चाहे वह) कच्ची (चाहे हो) पक्की (इसी प्रकार मनुष्य पर मौत किसी भी वक्त आ सकती है)। 1। (हे भाई !) यकीन जानो कि जो जीव पैदा होता है वह मरता भी (जरूर) है। परमात्मा का भगत (इस अटॅल नियम को जानता हुआ मौत के सहम से) अडोल-चित्त हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) दिन से अवश्य रात पड़ जाएगी। रात (भी) खत्म हो जाती है फिर दुबारा सवेर हो जाती है (इस तरह जगत में जनम और मरन का सिलसिला चला रहता है)। 2। (ये जानते हुए भी कि मौत जरूर आनी है) बद-नसीब लोग मायाके मोह में (फस के जीवन मनोरथ से) गाफिल हुए रहते हैं। कोई विरला मनुष्य ही गुरू की कृपा से (मोह की नींद) से जागता है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(प्रभू-पति के मिलाप के बिना) मेरा मन धीरज नहीं धरता (मैं हर समय सोचती रहती हूँ कि) प्यारे को कैसे मिलूँ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।