भए अनंद मिलि साधू संगि अब मेरा मनु कत ही न जाइ ॥1॥
तपति बुझी गुर सबदी माइ ॥
बिनसि गइओ ताप सभ सहसा गुरु सीतलु मिलिओ सहजि सुभाइ ॥1॥ रहाउ ॥
धावत रहे एकु इकु बूझिआ आइ बसे अब निहचलु थाइ ॥
जगतु उधारन संत तुमारे दरसनु पेखत रहे अघाइ ॥2॥
जनम दोख परे मेरे पाछै अब पकरे निहचलु साधू पाइ ॥
सहज धुनि गावै मंगल मनूआ
अब ता कउ फुनि कालु न खाइ ॥3॥
करन कारन समरथ हमारे सुखदाई मेरे हरि हरि राइ ॥
नामु तेरा जपि जीवै नानकु ओति पोति मेरै संगि सहाइ ॥4॥9॥
अरड़ावै बिललावै निंदकु ॥
पारब्रहमु परमेसरु बिसरिआ अपणा कीता पावै निंदकु ॥1॥ रहाउ ॥
जे कोई उस का संगी होवै नाले लए सिधावै ॥
अणहोदा अजगरु भारु उठाए निंदकु अगनी माहि जलावै ॥1॥
परमेसर कै दुआरै जि होइ बितीतै सु नानकु आखि सुणावै ॥
भगत जना कउ सदा अनंदु है हरि कीरतनु गाइ बिगसावै ॥2॥10॥
जउ मै कीओ सगल सीगारा ॥
तउ भी मेरा मनु न पतीआरा ॥
अनिक सुगंधत तन महि लावउ ॥
ओहु सुखु तिलु समानि नही पावउ ॥
मन महि चितवउ ऐसी आसाई ॥
प्रिअ देखत जीवउ मेरी माई ॥1॥
माई कहा करउ इहु मनु न धीरै ॥
प्रिअ प्रीतम बैरागु हिरै ॥1॥ रहाउ ॥
बसत्र बिभूखन सुख बहुत बिसेखै ॥
ओइ भी जानउ कितै न लेखै ॥
पति सोभा अरु मानु महतु ॥
आगिआकारी सगल जगतु ॥
ग्रिहु ऐसा है सुंदर लाल ॥
प्रभ भावा ता सदा निहाल ॥2॥
बिंजन भोजन अनिक परकार ॥
रंग तमासे बहुतु बिसथार ॥
राज मिलख अरु बहुतु फुरमाइसि ॥
मनु नही ध्रापै त्रिसना न जाइसि ॥
बिनु मिलबे इहु दिनु न बिहावै ॥
मिलै प्रभू ता सभ सुख पावै ॥3॥
खोजत खोजत सुनी इह सोइ ॥
साधसंगति बिनु तरिओ न कोइ ॥
जिसु मसतकि भागु तिनि सतिगुरु पाइआ ॥
पूरी आसा मनु त्रिपताइआ ॥
प्रभ मिलिआ ता चूकी डंझा ॥
नानक लधा मन तन मंझा ॥4॥11॥
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे माँ !) परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के मेरा मन पवित्र हो गया है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।