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अंग 370

अंग
370
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राखु सरणि जगदीसुर पिआरे मोहि सरधा पूरि हरि गुसाई ॥
जन नानक कै मनि अनदु होत है हरि दरसनु निमख दिखाई ॥2॥39॥13॥15॥67॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे जगत के मालिक ! हे प्यारे ! हे हरी ! हे धरती के पति ! मुझे अपनी शरण में रख। मेरी ये तमन्ना पूरी कर। (जब आपका दर्शन होता है तब आपके) दास नानक के मन में चाव पैदा हैं जाता है । हे हरी ! (मुझ नानक को) आँख झपकने जितने समय के लिए ही अपना दर्शन दो। 2। 39। 13। 15। 67। नोट।
रागु आसा घरु 2 महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि लाई प्रीति सोई फिरि खाइआ ॥
जिनि सुखि बैठाली तिसु भउ बहुतु दिखाइआ ॥
भाई मीत कुटंब देखि बिबादे ॥
हम आई वसगति गुर परसादे ॥1॥
ऐसा देखि बिमोहित होए ॥
साधिक सिध सुरदेव मनुखा बिनु साधू सभि ध्रोहनि ध्रोहे ॥1॥ रहाउ ॥
इकि फिरहि उदासी तिन॑ कामि विआपै ॥
इकि संचहि गिरही तिन॑ होइ न आपै ॥
इकि सती कहावहि तिन॑ बहुतु कलपावै ॥
हम हरि राखे लगि सतिगुर पावै ॥2॥
तपु करते तपसी भूलाए ॥
पंडित मोहे लोभि सबाए ॥
त्रै गुण मोहे मोहिआ आकासु ॥
हम सतिगुर राखे दे करि हाथु ॥3॥
गिआनी की होइ वरती दासि ॥
कर जोड़े सेवा करे अरदासि ॥
जो तूं कहहि सु कार कमावा ॥
जन नानक गुरमुख नेड़ि न आवा ॥4॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा घरु 2 महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस मनुष्य ने (इस माया के साथ) प्यार डाला। वही पलट के खाया गया (माया ने उसी को ही खा लिया)। जिसने (इसका) आदर करके इसे अपने पास बैठाया उसे ही (माया ने) बहुत डराया। भाई-मित्र-परिवार (के जीव। सारे ही इस माया को) देख के (आपस में) लड़ पड़ते हैं। गुरू की कृपा से ये हमारे वश में आ गई है। 1। सभी (माया को) देख के बहुत मस्त हो जाते हैं- साधना करने वाले जोगी। साधना में पहुँचे हुए जोगी। देवते। मनुष्य- गुरू के बिना ये सारे ठगनी (माया) के हाथों ठगे जाते हैं। 1। रहाउ। अनेकों लोग त्यागी बन के घूमते फिरते हैं (पर) उन्हें (ये माया) काम-वासना के रूप में आ दबोचती है। कई गृहस्थ बन कर इसे इकट्ठी करते हैं, पर यह उनकी भी नहीं होती अनेकों लोग (अपने आप को) दानी कहलवाते हैं। उनको (भी) ये बहुत दुखी करती है। सतिगुरू के चरणों में लगने के कारण हमें परमात्मा ने (इस माया के पंजे से) बचा लिया है। 2। तप कर रहे तपस्वियों को (इस माया ने) भटका दिया। सारे विद्वान पंडित लोग लोभ में फस के (माया के हाथों) ठगे गए। सारे ही त्रै-गुणी जीव ठगे जा रहे हैं। हमें तो गुरू ने अपना हाथ दे के (इस तरफ से) बचा लिया है। 3। हे दास नानक ! (कह) जो मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है (ये माया) उसकी दासी बन के कार करती है। उसके आगे (दोनों) हाथ जोड़ती है उसकी सेवा करती है। उसके आगे विनती करती है (और कहती है) मैं वही काम करूँगी जो आप कहे। मैं उस मनुष्य के पास नहीं जाऊँगी (मैं उस मनुष्य पर अपना दबाव नहीं डालूँगी) जो गुरू की शरण पड़ता है। 4। 1।
आसा महला 5 ॥
ससू ते पिरि कीनी वाखि ॥
देर जिठाणी मुई दूखि संतापि ॥
घर के जिठेरे की चूकी काणि ॥
पिरि रखिआ कीनी सुघड़ सुजाणि ॥1॥
सुनहु लोका मै प्रेम रसु पाइआ ॥
दुरजन मारे वैरी संघारे सतिगुरि मो कउ हरि नामु दिवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
प्रथमे तिआगी हउमै प्रीति ॥
दुतीआ तिआगी लोगा रीति ॥
त्रै गुण तिआगि दुरजन मीत समाने ॥
तुरीआ गुणु मिलि साध पछाने ॥2॥
सहज गुफा महि आसणु बाधिआ ॥
जोति सरूप अनाहदु वाजिआ ॥
महा अनंदु गुर सबदु वीचारि ॥
प्रिअ सिउ राती धन सोहागणि नारि ॥3॥
जन नानकु बोले ब्रहम बीचारु ॥
जो सुणे कमावै सु उतरै पारि ॥
जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥
हरि सेती ओहु रहै समाइ ॥4॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (गुरू की कृपा से मुझे प्रभू पति मिला) पति ने मुझे (आज्ञानता रूपी) सास से अलग कर लिया है। मेरी दिवरानी और जिठानी (आशा और तृष्णा इस) दुख-कलेश से मर गई हैं (कि मुझे पति मिल गया है)। (मेरे पर) जेठ (धर्मराज) की भी धौंस नहीं रही। सुचॅजे सियाने पति ने मुझे (इन सबसे) बचा लिया है। 1। हे लोगो ! सुनो। (गुरू की कृपा से) मैंने परमात्मा के प्यार का आनंद पाया है। गुरू ने मुझे परमात्मा के नाम की दाति दी है (उसकी बरकति से) मैंने बुरे भाव मार लिए हैं (कामादिक) वैरी समाप्त कर लिए हैं। 1। (जब गुरू की कृपा से मुझे प्रभू पति मिला। तो सब से) पहले मैं अहंकार को प्यार करना छोड़ दिया। फिर मैंने लोकाचारी रस्में छोड़ीं। फिर मैंने माया के तीनों गुण त्याग के वैरी और मित्र एक समान (मित्र ही) समझ लिए। गुरू को मिल के मैंने उस गुण से सांझडाल ली जो (माया के तीनों गुणों से ऊपर) चौथे आत्मिक दर्जे पर पहुँचाता है। 2। (जोगी गुफा में बैठ कर आसन लगाता है। जब प्रभू की कृपा से मुझे प्रभू-पति मिला तो मैं) आत्मिक अडोलता (की) गुफा में अपना आसन जमा लिया। मेरे अंदर निरे नूर ही नूर रूपी परमात्मा के मिलाप का एक-रस बाजा बजने लगा। गुरू के शबद विचार-विचार के मेरे अंदर बड़ा आत्मिक आनंद पैदा हो रहा है। (हे लोगो !) धन्य है वह (जीव-) स्त्री। भाग्यशाली है वह (जीव-) स्त्री जो (प्रभू) पति के प्यार-रंग से रंगी गयी है। 3। (हे भाई !) दास नानक परमात्मा के गुणों के विचार ही उचारता रहता है। जो भी मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह सुनता है और उसके अनुसार अपना जीवन ऊँचा उठाता है वह (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है। वह (बारंबार) ना पैदा होता है ना मरता है वह (वह जगत में बार-बार) ना आता है ना ही (यहां से बार-बार) जाता है। वह सदा परमात्मा की याद में लीन रहता है। 4। 2।
आसा महला 5 ॥
निज भगती सीलवंती नारि ॥
रूपि अनूप पूरी आचारि ॥
जितु ग्रिहि वसै सो ग्रिहु सोभावंता ॥
गुरमुखि पाई किनै विरलै जंता ॥1॥
सुकरणी कामणि गुर मिलि हम पाई ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ आत्मा के काम आने वाली (परमात्मा की) भक्ती (मानो) मीठे स्वभाव वाली एक स्त्री है (जो) रूप में बेमिसाल है (जो) आचरण में मुकम्मल है। जिस (हृदय) घर में (ये स्त्री) बसती है वह घर शोभा वाला बन जाता है। पर। किसी विरले जीव ने गुरू की शरण पड़ के (ये स्त्री) प्राप्त की है। 1। (हे भाई !) गुरू को मिल के मैंने श्रेष्ठ करणी- (रूप) स्त्री हासिल की है

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जगत के मालिक ! हे प्यारे ! हे हरी ! हे धरती के पति ! मुझे अपनी शरण में रख।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।