जन नानक कै मनि अनदु होत है हरि दरसनु निमख दिखाई ॥2॥39॥13॥15॥67॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जिनि लाई प्रीति सोई फिरि खाइआ ॥
जिनि सुखि बैठाली तिसु भउ बहुतु दिखाइआ ॥
भाई मीत कुटंब देखि बिबादे ॥
हम आई वसगति गुर परसादे ॥1॥
ऐसा देखि बिमोहित होए ॥
साधिक सिध सुरदेव मनुखा बिनु साधू सभि ध्रोहनि ध्रोहे ॥1॥ रहाउ ॥
इकि फिरहि उदासी तिन॑ कामि विआपै ॥
इकि संचहि गिरही तिन॑ होइ न आपै ॥
इकि सती कहावहि तिन॑ बहुतु कलपावै ॥
हम हरि राखे लगि सतिगुर पावै ॥2॥
तपु करते तपसी भूलाए ॥
पंडित मोहे लोभि सबाए ॥
त्रै गुण मोहे मोहिआ आकासु ॥
हम सतिगुर राखे दे करि हाथु ॥3॥
गिआनी की होइ वरती दासि ॥
कर जोड़े सेवा करे अरदासि ॥
जो तूं कहहि सु कार कमावा ॥
जन नानक गुरमुख नेड़ि न आवा ॥4॥1॥
ससू ते पिरि कीनी वाखि ॥
देर जिठाणी मुई दूखि संतापि ॥
घर के जिठेरे की चूकी काणि ॥
पिरि रखिआ कीनी सुघड़ सुजाणि ॥1॥
सुनहु लोका मै प्रेम रसु पाइआ ॥
दुरजन मारे वैरी संघारे सतिगुरि मो कउ हरि नामु दिवाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
प्रथमे तिआगी हउमै प्रीति ॥
दुतीआ तिआगी लोगा रीति ॥
त्रै गुण तिआगि दुरजन मीत समाने ॥
तुरीआ गुणु मिलि साध पछाने ॥2॥
सहज गुफा महि आसणु बाधिआ ॥
जोति सरूप अनाहदु वाजिआ ॥
महा अनंदु गुर सबदु वीचारि ॥
प्रिअ सिउ राती धन सोहागणि नारि ॥3॥
जन नानकु बोले ब्रहम बीचारु ॥
जो सुणे कमावै सु उतरै पारि ॥
जनमि न मरै न आवै न जाइ ॥
हरि सेती ओहु रहै समाइ ॥4॥2॥
निज भगती सीलवंती नारि ॥
रूपि अनूप पूरी आचारि ॥
जितु ग्रिहि वसै सो ग्रिहु सोभावंता ॥
गुरमुखि पाई किनै विरलै जंता ॥1॥
सुकरणी कामणि गुर मिलि हम पाई ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे जगत के मालिक ! हे प्यारे ! हे हरी ! हे धरती के पति ! मुझे अपनी शरण में रख।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।