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अंग 369

अंग
369
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु 8 के काफी महला 4 ॥
आइआ मरणु धुराहु हउमै रोईऐ ॥
गुरमुखि नामु धिआइ असथिरु होईऐ ॥1॥
गुर पूरे साबासि चलणु जाणिआ ॥
लाहा नामु सु सारु सबदि समाणिआ ॥1॥ रहाउ ॥
पूरबि लिखे डेह सि आए माइआ ॥
चलणु अजु कि कलि॑ धुरहु फुरमाइआ ॥2॥
बिरथा जनमु तिना जिन॑ी नामु विसारिआ ॥
जूऐ खेलणु जगि कि इहु मनु हारिआ ॥3॥
जीवणि मरणि सुखु होइ जिन॑ा गुरु पाइआ ॥
नानक सचे सचि सचि समाइआ ॥4॥12॥64॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा घरु 8 के काफी महला 4 ॥ (हे भाई !) धुर दरगाह से ही (हरेक जीव के वास्ते) मौत (का परवाना) आया हुआ है (धुर से ही ये रजा है कि जो पैदा हुआ है उसने मरना भी जरूर है) अहंकार के कारण ही (किसी के मरने पर) रोते हैं। गुरू के द्वारा परमात्मा का नाम सिमर के (मनुष्य) अडोल चित्त हो जाता है (मौत आने पर सहम से डावाँ-डोल नहीं होता)। 1। जिन मनुष्यों ने पूरे गुरू के द्वारा ये जान लिया कि जगत से आखिर चले जाना है उन्होंने शाबाशी कमाई। उन्होंने परमात्मा का नाम (-रूपी) श्रेष्ठ लाभ कमा लिया। वे गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा के नाम में) लीन हुए रहे। 1। रहाउ। हे माँ ! पूर्व जनम में (धुर से) लिखे अनुसार (जिन्हें जिंदगी के) दिन मिलते हैं वे जगत में आ जाते हैं (पैदा हो जाते हैं। इसी तरह ही) धुर से ही ये फुरमान भी है कि यहां से आज या कल चले भी जाना है। 2। (हे भाई !) जिन मनुष्यों ने (जगत में आ के) परमात्मा का नाम भुला दिया उनका मानस जन्म व्यर्थ चला गया। उन्होंने जगत में आ के जूए की खेल ही खेली (और इस खेल में) अपना मन (विकारों के हाथों) हार दिया। 3। जिन मनुष्यों को गुरू मिल पड़ा उन्होंने (सारे) जीवन में (भी) आत्मिक आनंद पाया। और मरने में भी (मरने के वक्त भी) सुख ही प्राप्त किया। (क्योंकि) हे नानक ! वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में सदा लीन रहे हैं और सदा स्थिर प्रभू का रूप बने रहे (सदा स्थिर प्रभू के साथ एक-मेक हुए रहे)। 4। 12। 64।
आसा महला 4 ॥
जनमु पदारथु पाइ नामु धिआइआ ॥
गुर परसादी बुझि सचि समाइआ ॥1॥
जिन॑ धुरि लिखिआ लेखु तिन॑ी नामु कमाइआ ॥
दरि सचै सचिआर महलि बुलाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
अंतरि नामु निधानु गुरमुखि पाईऐ ॥
अनदिनु नामु धिआइ हरि गुण गाईऐ ॥2॥
अंतरि वसतु अनेक मनमुखि नही पाईऐ ॥
हउमै गरबै गरबु आपि खुआईऐ ॥3॥
नानक आपे आपि आपि खुआईऐ ॥
गुरमति मनि परगासु सचा पाईऐ ॥4॥13॥65॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे भाई !) जिन मनुष्यों ने कीमती मानस जनम हासिल करके परमात्मा का नाम सिमरा। गुरू की कृपा से (वह मनुष्य जनम की कद्र) समझ के सदा स्थिर प्रभू में लीन हो गए। 1। (हे भाई !) उन मनुष्यों ने ही नाम सिमरन की कमाई की है जिनके माथे पे धुर दरगाह से ये कमाई करने का लेख लिखा हुआ है (जिनके अंदर सिमरन करने के संस्कार मौजूद हैं)। वह मनुष्य सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के दर पर सुर्खरू होते हैं उन्हें परमात्मा की हजूरी में बुलाया जाता है (आदर मिलता है)। 1। रहाउ। (हे भाई !) नाम-खजाना हरेक मनुष्य के अंदर मौजूद है। पर ये मिलता है गुरू की शरण पड़ने से। (इस वास्ते) हर रोज परमात्मा का नाम सिमर के (आएँ। गुरू के द्वारा) परमात्मा के गुण गाते रहें। 2। (हे भाई !) नाम-पदार्थ हरेक के अंदर है (परमात्मा वाले) अनेकों (गुण) हरेक के अंदर हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाले को कुछ नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपने अहंकार के कारण (अपनी सूझ-बूझ का ही) अहंकार करता रहता है। (और इस तरह) स्वयं ही (परमात्मा से) विछुड़ा रहता है। 3। हे नानक ! मनमुख मनुष्य सदा स्वयं ही (अपनी ही मूर्खता के कारण) परमात्मा से विछुड़ा रहता है। गुरू की मति पर चलने से मन रौशन हो जाता है। और सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। 4। 13। 65।
रागु आसावरी घरु 16 के 2 महला 4 सुधंग
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हउ अनदिनु हरि नामु कीरतनु करउ ॥
सतिगुरि मो कउ हरि नामु बताइआ हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ ॥1॥ रहाउ ॥
हमरै स्रवणु सिमरनु हरि कीरतनु हउ हरि बिनु रहि न सकउ हउ इकु खिनु ॥
जैसे हंसु सरवर बिनु रहि न सकै तैसे हरि जनु किउ रहै हरि सेवा बिनु ॥1॥
किनहूं प्रीति लाई दूजा भाउ रिद धारि किनहूं प्रीति लाई मोह अपमान ॥
हरि जन प्रीति लाई हरि निरबाण पद नानक सिमरत हरि हरि भगवान ॥2॥14॥66॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु आसावरी घरु 16 के 2 महला 4 सुधंग ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं हर वक्त परमात्मा का नाम जपता हूँ। मैं हर समय परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ। (हे भाई ! जब से) गुरू ने मुझे परमात्मा के नाम के बारे में बताया है (तब से) मैं परमात्मा के नाम के सिमरन के बिना एक घड़ी पल भी नहीं रह सकता। 1। रहाउ। (हे भाई !) मेरे पास परमात्मा की सिफत सालाह सुननी और परमात्मा का नाम जपना ही (राशि पूँजी) है। परमात्मा का नाम जपे बिना मैं एक पल भी नहीं रह सकता। जैसे हंस सरोवर के बिना नहीं रह सकता वैसे ही परमात्मा का भगत परमात्मा की सेवा भगती के बिना नहीं रह सकता। 1। (हे भाई !) किसी मनुष्य ने माया का प्यार दिल में टिका के माया से प्रीति जोड़ी हुई है। किसी ने मोह और अहंकार से प्रीति जोड़ी हुई है। पर हे नानक ! परमात्मा के भक्तों ने परमात्मा के साथ प्रीति लगाई हुई है। वह सदा वासना रहित अवस्था में रहते हैं। वे सदा हरी-भगवान को सिमरते रहते हैं। 2। 14। 66।
आसावरी महला 4 ॥
माई मोरो प्रीतमु रामु बतावहु री माई ॥
हउ हरि बिनु खिनु पलु रहि न सकउ जैसे करहलु बेलि रीझाई ॥1॥ रहाउ ॥
हमरा मनु बैराग बिरकतु भइओ हरि दरसन मीत कै ताई ॥
जैसे अलि कमला बिनु रहि न सकै तैसे मोहि हरि बिनु रहनु न जाई ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला 4 ॥ हे माँ ! मुझे बता प्यारा राम (कहां है। उसे देख के मेरा मन ऐसे खुश होता है !) जैसे ऊठ का बच्चा बेलों को देख-देख के प्रसन्न होता है। मैं उस हरी (के दर्शन) के बिना एक छिन भी। एक पल भी (सुखी) नहीं रह सकता। 1। रहाउ। (हे माँ !) मित्र प्रभू के दर्शन की खातिर मेरा मन उतावला हो रहा है। मेरा मन (दुनिया के तरफ से) उपराम हुआ पड़ा है। जैसे भौरा कमल के फूल के बिना नहीं रह सकता। वैसे ही मुझसे भी परमात्मा (के दर्शनों) के बिना रहा नहीं जा सकता। 1।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।