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अंग 371

अंग
371
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जजि काजि परथाइ सुहाई ॥1॥ रहाउ ॥
जिचरु वसी पिता कै साथि ॥
तिचरु कंतु बहु फिरै उदासि ॥
करि सेवा सत पुरखु मनाइआ ॥
गुरि आणी घर महि ता सरब सुख पाइआ ॥2॥
बतीह सुलखणी सचु संतति पूत ॥ आगिआकारी सुघड़ सरूप ॥
इछ पूरे मन कंत सुआमी ॥
सगल संतोखी देर जेठानी ॥3॥
सभ परवारै माहि सरेसट ॥
मती देवी देवर जेसट ॥
धंनु सु ग्रिहु जितु प्रगटी आइ ॥
जन नानक सुखे सुखि विहाइ ॥4॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जो विवाह-शादियों में हर जगह सुंदर लगती है। 1। रहाउ। (ये भगती रूप स्त्री) जब तक गुरू के पास ही रहती है तब तक जीव बहुत भटकता फिरता है। जब (गुरू के द्वारा जीव ने) सेवा करके परमात्मा को प्रसन्न किया। तब गुरू ने (इसके हृदय-) घर में ला के बैठाई और इसने सुख आनंद प्राप्त कर लिए। 2। (ये भगती रूपी स्त्री दया। निम्रता। लज्जा आदि) बक्तीस सुंदर लक्षणों वाली है। सदा स्थिर परमात्मा का नाम इस की संतान है। पुत्र हैं। (ये स्त्री) आज्ञा में चलने वाली है। सुचॅजी है। सुंदर रूप वाली है। जीव-कंत पति की (हरेक) इच्छा ये पूरी करती है। देवरानी जेठानी (आशा-तृष्णा) को ये हर तरह से संतोष देती है (शांत करती है)। 3। (मीठे बोल। विनम्रता। सेवा। दान। दया) सार (आत्मिक) परिवार में (भक्ति) सबसे उक्तम है। सारे देवरों-जेठों (ज्ञानेन्द्रियों) को मश्वरे देने वाली है (सही मार्ग-दर्शन करने के काबिल है)। हे दास नानक ! (कह) वह हृदय-घर भाग्यशाली है। जिस घर में (ये भगती रूपी स्त्री) आ के दर्शन देती है। (जिस मनुष्य के हृदय में प्रगट होती है उसकी उम्र) सुख आनंद में बीतती है। 4। 3।
आसा महला 5 ॥
मता करउ सो पकनि न देई ॥
सील संजम कै निकटि खलोई ॥
वेस करे बहु रूप दिखावै ॥
ग्रिहि बसनि न देई वखि वखि भरमावै ॥1॥
घर की नाइकि घर वासु न देवै ॥
जतन करउ उरझाइ परेवै ॥1॥ रहाउ ॥
धुर की भेजी आई आमरि ॥
नउ खंड जीते सभि थान थनंतर ॥
तटि तीरथि न छोडै जोग संनिआस ॥
पड़ि थाके सिंम्रिति बेद अभिआस ॥2॥
जह बैसउ तह नाले बैसै ॥
सगल भवन महि सबल प्रवेसै ॥
होछी सरणि पइआ रहणु न पाई ॥
कहु मीता हउ कै पहि जाई ॥3॥
सुणि उपदेसु सतिगुर पहि आइआ ॥
गुरि हरि हरि नामु मोहि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥
निज घरि वसिआ गुण गाइ अनंता ॥
प्रभु मिलिओ नानक भए अचिंता ॥4॥
घरु मेरा इह नाइकि हमारी ॥
इह आमरि हम गुरि कीए दरबारी ॥1॥ रहाउ दूजा ॥4॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ (आत्मिक अडोलता के लिए) मैं जो भी सलाह करता हूँ उसे (ये माया) सफल नहीं होने देती। मीठे स्वभाव और संजम के ये हर समय नजदीक (रखवाली बन के) खड़ी रहती है (इस वास्ते मैं ना शील हासिल कर सकता हूँ ना ही संजम)। (ये माया) अनेकों वेश धारण करती है। अनेकों रूप दिखाती है। हृदय घर में ये मुझे टिकने नहीं देती। कई तरीकों से मुझे भटकाती फिरती है। 1। (ये माया मेरे) हृदय घर की मलिका बन बैठी है। मुझे घर का बसेरा देती ही नहीं (मुझे आत्मिक अडोलता नहीं मिलने देती)। अगर मैं (आत्मिक अडोलता के लिए) यत्न करता हूँ। तो बल्कि ज्यादा उलझनें डाल देती है। 1। रहाउ। (ये माया) धुर दरगाह से तो सेविका बना के भेजी हुई (जगत में) आई है। (पर यहाँ आ के इसने) नौ खण्डों वाली सारी धरती जीत ली है। सारी ही जगहें अपने अधीन कर ली हैं। नदियों के तट पर हरेक तीर्थों पर बैठे योग-साधना करने वाले और सन्यास धारण करने वाले भी (इस माया ने) नहीं छोड़े। स्मृतियां पढ़-पढ़ के और वेदों के (पाठों के) अभ्यास कर-कर के पण्डित लोग भी (इसके सामने) हार गए हैं। 1। मैं जहाँ भी (जा के) बैठता हूँ (ये माया) मेरे साथ ही आ बैठती है। ये बड़े बल वाली है। सारे ही भवनों में जा पहुँचती है। किसी कमजोर की शरण पड़ने से ये मेरे से परे नहीं हटती। सो हे मित्र ! बता (इस माया से पीछा छुड़ाने के लिए) मैं किस के पास जाऊँ। 3। (सत्संगी मित्र से) उपदेश सुन के मैं गुरू के पास आया। गुरू ने परमात्मा का नाम-मंत्र मुझे (मेरे हृदय में) पक्का करके दे दिया। (उस नाम-मंत्र की बरकति से) बेअंत परमात्मा के गुण गा-गा के मैं अब अपने हृदय में आ बसा हूँ। हे नानक ! (कह, अब मुझे) परमात्मा मिल गया है। और मैं (माया के हमलों की ओर से) बेफिक्र हो गया हूँ। 4। (अब ये हृदय-घर) मेरा अपना घर बन गया है (ये माया) मलिका भी मेरी (दासी) बन गई है। गुरू ने इसको मेरी सेविका बना दिया है और मुझे प्रभू की हजूरी में रहने वाला बना दिया है। 1। रहाउ दूजा। 4। 4।
आसा महला 5 ॥
प्रथमे मता जि पत्री चलावउ ॥
दुतीए मता दुइ मानुख पहुचावउ ॥
त्रितीए मता किछु करउ उपाइआ ॥
मै सभु किछु छोडि प्रभ तुही धिआइआ ॥1॥
महा अनंद अचिंत सहजाइआ ॥
दुसमन दूत मुए सुखु पाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरि मो कउ दीआ उपदेसु ॥
जीउ पिंडु सभु हरि का देसु ॥
जो किछु करी सु तेरा ताणु ॥
तूं मेरी ओट तूंहै दीबाणु ॥2॥
तुधनो छोडि जाईऐ प्रभ कैं धरि ॥
आन न बीआ तेरी समसरि ॥
तेरे सेवक कउ किस की काणि ॥
साकतु भूला फिरै बेबाणि ॥3॥
तेरी वडिआई कही न जाइ ॥
जह कह राखि लैहि गलि लाइ ॥
नानक दास तेरी सरणाई ॥
प्रभि राखी पैज वजी वाधाई ॥4॥5॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ पहले मुझे सलाह दी गई कि (वैरी बन के आ रहे को) चिट्ठी लिख के भेजूँ। फिर सलाह मिली कि मैं (उसके पास) दो मनुष्य भेजूँ। तीसरी सलाह मिली कि मैं कोई ना कोई उपाय जरूर करूँ। पर हे प्रभू ! अन्य सभी यत्न छोड़ के मैंने सिर्फ आपको ही सिमरा। 1। (परमात्मा का आसरा लेने से) बड़ा आत्मिक आनंद मिलता है। निश्चिंतता हैं जाती है। आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। सारे वैरी दुश्मन समाप्त हो जाते हैं (कौई वैरी नहीं प्रतीत होता)। (इस तरह) अंतरात्मे सुख मिलता है। 1। रहाउ। सतिगुरू ने मुझे शिक्षा दी है कि ये जिंद और शरीर सब कुछ परमात्मा के रहने के लिए जगह है। (इस वास्ते) मैं जो कुछ भी करता हूँ आपका सहारा ले के करता हूँ। आप ही मेरी ओट है आप ही मेरा आसरा है। 2। हे प्रभू ! आपको छोड़ के और जाएं भी तो कहाँ। (क्योंकि) आपके बराबर का दूसरा कोई और है ही नहीं (जिसे निश्चय हैं उस) आपके सेवक को और किस की मुथाजी हैं सकती है। (पर। हे प्रभू !) आपसे टूटा हुआ मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ के (मानो) उजाड़ में भटकता फिरता है। 3। हे प्रभू ! आप कितना बड़ा है ये बात मुझसे बयान नहीं की जा सकती। आप हर जगह (मुझे अपने) गले से लगा के बचा लेता है। हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं आपकी ही शरण पड़ा रहता हूँ। (हे भाई !) प्रभू ने मेरी इज्जत रख ली है (मुसीबतों के वक्त भी उसकी मेहर से) मेरे अंदर चढ़दीकला (प्रगति का आत्म बल) प्रबल रहती है। 4। 5।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो विवाह-शादियों में हर जगह सुंदर लगती है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।