पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥
सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥4॥23॥56॥
बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥1॥
मन रे निज घरि वासा होइ ॥
राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥
सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥
सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥2॥
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥
बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥
बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥3॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥
गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥4॥24॥57॥
तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥
गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥
सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥
किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥1॥
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥
सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥
गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥
जिहवा रती सबदि सचै अंम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥
गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥2॥
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥
इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥
आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥
आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥3॥
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥
इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥
गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥4॥25॥58॥
गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥
गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हम जीव जो कुछ करते हैं अथवा बोलते, चितवते हैं) वह सब कुछ परमात्मा देखता सुनता है (इस वास्ते उसकी हजूरी में अपने किये व चितवे बुरे कर्मों से) मुकरा नहीं जा सकता।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।