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अंग 36

अंग
36
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सभु किछु सुणदा वेखदा किउ मुकरि पइआ जाइ ॥
पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥
सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥4॥23॥56॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (हम जीव जो कुछ करते हैं अथवा बोलते, चितवते हैं) वह सब कुछ परमात्मा देखता सुनता है (इस वास्ते उसकी हजूरी में अपने किये व चितवे बुरे कर्मों से) मुकरा नहीं जा सकता। (इसी लिए) जो लोग (सारी उम्र) पाप ही पाप कमाते रहते हैं, वह (सदा) पाप में जलते-भुनते रहते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को (यह) समझ नहीं पड़ती, उन को वह (सब कुछ देखने सुनने वाला) परमात्मा नजर नहीं आता। (पर, किसी जीव के भी क्या बस?) हे नानक ! जिस मनुष्य को परमात्मा अपना आप दिखाता है, वही (उस को) देख सकता है, उसी मनुष्य को गुरू की शरण पड़ कर ये समझ आती है ।4।23।56।
स्रीरागु महला 3 ॥
बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥
गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥
गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥1॥
मन रे निज घरि वासा होइ ॥
राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥
सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥
सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥2॥
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥
बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥
बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥3॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥
गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥4॥24॥57॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ गुरू (की शरण) के बगैर (जनम-मरन) का रोग दूर नहीं हो सकता, अहंकार की पीड़ा नहीं जाती। गुरू की कृपा से (जिस मनुष्य के) मन में (परमात्मा का नाम) बस जाता है वह नाम में ही टिका रहता है। गुरू के शबद में जुड़ने से ही परमात्मा मिलता है। गुरू के शबद के बिना मनुष्य भटक के (सही जीवन राह से) वंचित हो जाते हैं।1। हे (मेरे) मन! प्रभु चरणों में मेरा निवास बना रहेगा, परमात्मा के नाम की सिफत सलाह करता रह, दुबारा जन्म-मरन का चक्कर नहीं होंगे।1।रहाउ। सभ दातें देने वाला सिर्फ परमात्मा ही सारी स्मर्था वाला है, उस जैसा और कोई नहीं। अगर मैं गुरू के शबद से उसकी सिफत सलाह करूँ, तो वह मन में आ बसता है और सहज ही आत्मिक आनंद बन जाता है। वह दातार हरि सारी सृष्टि को अपनी मेहर की निगाह से देखता है। जिसको उसकी मर्जी हो उसे ही (यह आत्मिक आनंद) देता है।2। (जहां) अहम् है (वहां) चिंता है। चिंता को सुख नहीं हो सकता। (अहम् के अधीन रह कर आत्मिक मौत लाने वाले विकारों के) जहर वाले काम करने से जीव उस जहर में ही, मगन रहते है। परमात्मा के नाम के बिना वह शांति वाली जगह प्राप्त नहीं कर सकते, और जम के दर पर दु:ख सहते रहते हैं।3। ये जीवात्मा और ये शरीर सब कुछ उस परमात्मा का ही है तथा परमात्मा का ही (सभ जीवों को) आसरा, सहारा है। जब, गुरू की कृपा से ये बात समझ आ जाती है, तब जीव विकारों से निजात पाने का राह ढूंढ लेता है। हे नानक! उस परमात्मा के नाम की सिफत सलाह करता रह जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी स्मर्था का उरवार पार(और-छोर) भी नहीं ढूंढा जा सकता।4।24।57।
सिरीरागु महला 3 ॥
तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥
गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥
सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥
किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥1॥
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥
सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥
गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥
जिहवा रती सबदि सचै अंम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥
गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥2॥
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥
इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥
आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥
आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥3॥
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥
इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥
गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥4॥25॥58॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ परमात्मा का सदा स्थिर नाम जिन मनुष्यों (की जिंदगी) का आसरा बनता है, उनको सदा आनंद मिलता है, सदा सुख मिलता है। (क्योंकि) गुरू के शबद में जुड़ के उन्होंने वह सदा स्थिर परमात्मा पा लिया होता हैजो सारे दुख दूर करने की स्मर्था रखता है। वह मनुष्य सदा ही सदा स्थिर प्रभु के गुण गाते हैं, वह सदा स्थिर प्रभु के नाम से प्यार करते हैं। परमात्मा ने अपनी कृपा करके उन्हें अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है।1। हे (मेरे) मन! परमात्मा के गुण गाता रह, (गुण गाने से) सदा खुशी बनी रहती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की सिफत सलाह में जुड़ने से ही प्रभु मिलता है। (जो जीव सिफत सलाह करता है वह) परमात्मा की (याद में) लीन रहता है।1।रहाउ। सदा स्थिर प्रभु की भक्ति (के रंग) में जिस मनुष्य का रंग गाढ़ा रंगा जाता है, वह आत्मिक अडोलता में प्रभु प्रेम में मस्त रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के उस का मन (प्रभु चरणों में ऐसा) मस्त होता है कि उस (मस्ती) का बयान नहीं किया जा सकता। उसकी जीभ सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह में रंगी जाती हैं, प्रेम से प्रभु के गुण गा के वह आत्मिक जीवन देने वाला रस पीता है। पर ये रंग गुरू की शरण पड़ने से ही मिलता है (वही मनुष्य प्राप्त करता है) जिस पर प्रभु अपनी रजा मुताबिक मेहर करता है।2। जगत (का मोह) तौखले का मूल है। (मोह की नींद में) सोए हुए ही (जिंदगी रूपी) रात व्यतीत हो जाती है। कई (भाग्यशाली) जीवों को परमात्मा ने अपनी रजा में (जोड़ के इस मोह में से) निकाल लिया और खुद ही (अपने चरणों में) मिला लिया है। खुद ही (उनके अंदर से) माया का मोह दूर करके खुद ही उनके मन में आ बसा है। प्रभु ने खुद (ही) उनको इज्जत दी है। (भाग्यशाली लोगों को) परमात्मा गुरू की शरण में ला के (जीवन का सही राह) समझा देता है।3। परमात्मा ही सभ जीवों को दातें देने वाला है। जीवन राह से भटके हुओं को भी सूझ देता है। कई जीवों को उस प्रभु ने खुद ही अपने आप से दूर किया हुआ है और माया के मोह जाल में फंसा के रखा है। गुरू की मति पर चलने से परमात्मा मिलता है (गुरू की मति पर चलके जीव) अपनी सुरति को परमात्मा की ज्योति में मिलाता है, और हे नानक! हर वक्त नाम के रंग में रंगे रह कर नाम में ही लीन रहता है।4।25।58।
सिरीरागु महला 3 ॥
गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥
गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ (हृदय में) गुण धारण करने वाली जीव-सत्री ने तृष्णा आदि विकार छोड़ के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ढूंढ लिया है। उस का मन गुरू के शबद में रंगा गया है, उसकी जीभ प्रभु के प्रेम-प्यार में रंगी गई है।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हम जीव जो कुछ करते हैं अथवा बोलते, चितवते हैं) वह सब कुछ परमात्मा देखता सुनता है (इस वास्ते उसकी हजूरी में अपने किये व चितवे बुरे कर्मों से) मुकरा नहीं जा सकता।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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