Lulla Family

अंग 35

अंग
35
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥3॥
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥
सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥4॥21॥54॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य का जीवन व्यर्थ बीत जाता है। वह यहां से जा के आगे क्या मुँह दिखाएगा? (भाव, प्रभु की हाजिरी में शर्मिन्दा ही होएगा)।3। (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सब कुछ करने के स्मर्थ है। (वैसे) अहम् में फसे हुए द्वारा (यह सच्चाई) नहीं बयान की जा सकती (भाव, अहंकार में फंसे जीव को यह समझ नहीं आती कि परमात्मा खुद ही सब कुछ करने योग्य है)। गुरू के शबद की बरकति से अपने अंदर अहंकार का दुख दूर करके ये समझ आती है। जो लोग अपने गुरू की सेवा करते हैं (भाव, गुरू के बताए राह पर चलते हैं), मैं उनके चरण छूता हूँ। हे नानक! (कह) मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ, जो सदा स्थिर प्रभु के दर पे सुर्खरू होते हैं।4।21।54।
सिरीरागु महला 3 ॥
जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥
इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥
मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥1॥
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥
साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥1॥ रहाउ ॥
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥
खेती जंमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥
इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥2॥
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥
बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥
हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥
तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥3॥
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥4॥22॥55॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ अगर (भक्ति करने के लिए) कोई खास बेला, खास वक्त नियत करना विचारते रहें, तो किसी वक्त भी भगती नहीं हो सकती। हर समय ही परमात्मा के नाम रंग में रंगे रह के सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाना है तभी सदा स्थिर रहने वाली शोभा मिलती है। वह कैसी भक्ति हुई अगर एक छिन भर भी प्यारा परमात्मा बिसर जाए? अगर एक श्वास भी परमात्मा की याद से खाली ना जाए तो सदा स्थिर प्रभु के साथ जुड़ा मन शांत हो जाता है, शरीर भी शांत हो जाता है।1। हे मेरे मन! परमात्मा का नाम सिमर। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की भक्ति तभी हो सकती है जब (सिमरन की बरकति से) परमात्मा मनुष्य के मन में आ बसे।1।रहाउ। अगर आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभु का सदा स्थिर नाम बीज बीज के (आत्मिक जीवन की) फसल बीजें; तो यह फसल बहुत उगती है। इस फसल को बीजने वाले मनुष्य का मन आत्मिक अडोलता व प्रेम में जुड़ के (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। सतिगुरू का शबद ऐसा अंमृत है (आत्मिक जीवन देने वाला जल है) जिसके पीने से (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। (नाम अंमृत पीने वाले मनुष्य का) यह मन अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभु में रंगा जाता है। और सदा स्थिर प्रभु की याद में ही लीन रहता है।2। जिन मनुष्यों का कहना, देखना और बोलना (प्रभु की सिफत सलाह वाले) शबद में ही लीन रहता है (भाव, जो लोग सदा सिफत सलाह में ही मगन रहते हैं) व हर तरफ परमात्मा को ही देखते हैं। सदा स्थिर प्रभु का नाम ही (औरों को) सुना सुना के उनकी शोभा (सारे संसार में) सदा के लिए कायम हो जाती है। इस वास्ते उनका अहम् समाप्त हो जाता है उनकी अपनॅत दूर हो जाती है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा उनको अपनी याद में जोड़े रखता है। जो लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में लिव लगा के रखते हैं, उनको प्रभु की हजूरी में जगह मिलती है।3। परमात्मा के मेहर की नजर से ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। परमात्मा की मेहर के बिना वह मिल नहीं सकता। जिस मनुष्य की बड़िया किस्मत से साध-संगति मिल जाती है, जिस को गुरू आ के मिलता है (इसकी बरकति से) हर वक्त प्रभु के नाम (रंग) में रंगे रहने के कारण उस मनुष्य के अंदर माया (के मोह) का दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा से) मिलाप होता है (जिस मनुष्य को गुरू का शबद प्राप्त हो जाता है वह) परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है।4।22।55।
सिरीरागु महला 3 ॥
आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥
सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥
दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥
सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥1॥
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥
हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥1॥ रहाउ ॥
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥
जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥2॥
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥
तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥
भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥
नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥3॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ उस परमात्मा ने अपना डर-अदब उन लोगों के हृदय में डाल दिया है, जिन्होंने गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाया है। वह लोग सदा स्थिर प्रभु के गुणों को (अपने हृदय में) सम्भाल के साध-संगति में मिल के रहते हैं। उस (परमात्मा) ने खुद उन लोगों की दुबिधा की मैल दूर कर कर दी है, वह लोग परमात्मा के नाम को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी उनके मन में बसती है। सदा स्थिर प्रभु खुद उनके मन में बसता है, उन लोगों का सदा स्थिर प्रभु से प्यार हो जाता है।1। हे मेरे मन ! संसार समुंद्र में अहम् की मैल (प्रबल) है। परमात्मा (इस) मैल के बगैर है और (इस वास्ते) सदा सुंदर है। (वह निर्मल परमात्मा जीवों को गुरू के) शबद में जोड़ के सुंदर बनाने के समरथ है (हे मन ! आप भी गुरू के शबद में जुड़)।1।रहाउ। जिन मनुष्यों का मन सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह के शबद में मस्त रहता है, उनको सदा स्थिर प्रभु ने स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लिया है। हर वक्त प्रभु के नाम में रंगे रहने के कारण उनकी जोति प्रभु की जोति में लीन रहती है। परमात्मा उस अंदरूनी ज्योति के द्वारा ही दिखाई देता है। पर गुरू के बिना उस ज्योति (प्रकाश) की समझ नहीं पड़ती और गुरू उन लोगों को आ के मिलता है जिनके भाग्य में धुर (प्रभु की दरगाह) से ही लेख लिखे हों।2। सारा ही संसार परमात्मा के नाम के बिना दुबिधा में फंसा रहता है, और माया के प्यार में (पड़ के सही जीवन राह से) वंचित रह जाता है। उस (प्रभु नाम) के बिनां एक घड़ी भर भी आत्मिक जीवन नहीं जी सकते, दुखों में ही जिंदगी की रात बीत जाती है। माया के मोह में अंधा हुआ जीव भटकनों में पड़ कर जीवन राह से भटक जाता है और बार बार पैदा होता रहता है। जब प्रभु मेहर की निगाह करता है, तब, खुद ही (उसको अपने चरणों में) जोड़ लेता है।3।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य का जीवन व्यर्थ बीत जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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