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अंग ३५ · सिरी राग

अंग
35
सिरी राग
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  1. मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥3॥
  2. जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥
  3. आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥

मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥3॥

अंग ३४ से चला आ रहा अंश

मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥3॥
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥
गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥
सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥
नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥4॥21॥54॥

हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य का जीवन व्यर्थ बीत जाता है। वह यहां से जा के आगे क्या मुँह दिखाएगा? (भाव, प्रभु की हाजिरी में शर्मिन्दा ही होएगा)।3। (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सब कुछ करने के स्मर्थ है। (वैसे) अहम् में फसे हुए द्वारा (यह सच्चाई) नहीं बयान की जा सकती (भाव, अहंकार में फंसे जीव को यह समझ नहीं आती कि परमात्मा खुद ही सब कुछ करने योग्य है)। गुरू के शबद की बरकति से अपने अंदर अहंकार का दुख दूर करके ये समझ आती है। जो लोग अपने गुरू की सेवा करते हैं (भाव, गुरू के बताए राह पर चलते हैं), मैं उनके चरण छूता हूँ। हे नानक! (कह) मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ, जो सदा स्थिर प्रभु के दर पे सुर्खरू होते हैं।4।21।54।

जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥
इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥
मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥1॥
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥
साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥1॥ रहाउ ॥
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥
खेती जंमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥
गुर का सबदु अंम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥
इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥2॥
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥
बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥
हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥
तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥3॥
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥
पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥
नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥4॥22॥55॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ अगर (भक्ति करने के लिए) कोई खास बेला, खास वक्त नियत करना विचारते रहें, तो किसी वक्त भी भगती नहीं हो सकती। हर समय ही परमात्मा के नाम रंग में रंगे रह के सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाना है तभी सदा स्थिर रहने वाली शोभा मिलती है। वह कैसी भक्ति हुई अगर एक छिन भर भी प्यारा परमात्मा बिसर जाए? अगर एक श्वास भी परमात्मा की याद से खाली ना जाए तो सदा स्थिर प्रभु के साथ जुड़ा मन शांत हो जाता है, शरीर भी शांत हो जाता है।1। हे मेरे मन! परमात्मा का नाम सिमर। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की भक्ति तभी हो सकती है जब (सिमरन की बरकति से) परमात्मा मनुष्य के मन में आ बसे।1।रहाउ। अगर आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभु का सदा स्थिर नाम बीज बीज के (आत्मिक जीवन की) फसल बीजें; तो यह फसल बहुत उगती है। इस फसल को बीजने वाले मनुष्य का मन आत्मिक अडोलता व प्रेम में जुड़ के (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। सतिगुरू का शबद ऐसा अंमृत है (आत्मिक जीवन देने वाला जल है) जिसके पीने से (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। (नाम अंमृत पीने वाले मनुष्य का) यह मन अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभु में रंगा जाता है। और सदा स्थिर प्रभु की याद में ही लीन रहता है।2। जिन मनुष्यों का कहना, देखना और बोलना (प्रभु की सिफत सलाह वाले) शबद में ही लीन रहता है (भाव, जो लोग सदा सिफत सलाह में ही मगन रहते हैं) व हर तरफ परमात्मा को ही देखते हैं। सदा स्थिर प्रभु का नाम ही (औरों को) सुना सुना के उनकी शोभा (सारे संसार में) सदा के लिए कायम हो जाती है। इस वास्ते उनका अहम् समाप्त हो जाता है उनकी अपनॅत दूर हो जाती है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा उनको अपनी याद में जोड़े रखता है। जो लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में लिव लगा के रखते हैं, उनको प्रभु की हजूरी में जगह मिलती है।3। परमात्मा के मेहर की नजर से ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है। परमात्मा की मेहर के बिना वह मिल नहीं सकता। जिस मनुष्य की बड़िया किस्मत से साध-संगति मिल जाती है, जिस को गुरू आ के मिलता है (इसकी बरकति से) हर वक्त प्रभु के नाम (रंग) में रंगे रहने के कारण उस मनुष्य के अंदर माया (के मोह) का दुख दूर हो जाता है। हे नानक ! गुरू के शबद द्वारा (परमात्मा से) मिलाप होता है (जिस मनुष्य को गुरू का शबद प्राप्त हो जाता है वह) परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है।4।22।55।

आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥
सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥
दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥
सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥1॥
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥
हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥1॥ रहाउ ॥
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥
अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥
जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥2॥
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥
तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥
भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥
नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ उस परमात्मा ने अपना डर-अदब उन लोगों के हृदय में डाल दिया है, जिन्होंने गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाया है। वह लोग सदा स्थिर प्रभु के गुणों को (अपने हृदय में) सम्भाल के साध-संगति में मिल के रहते हैं। उस (परमात्मा) ने खुद उन लोगों की दुबिधा की मैल दूर कर कर दी है, वह लोग परमात्मा के नाम को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह की बाणी उनके मन में बसती है। सदा स्थिर प्रभु खुद उनके मन में बसता है, उन लोगों का सदा स्थिर प्रभु से प्यार हो जाता है।1। हे मेरे मन ! संसार समुंद्र में अहम् की मैल (प्रबल) है। परमात्मा (इस) मैल के बगैर है और (इस वास्ते) सदा सुंदर है। (वह निर्मल परमात्मा जीवों को गुरू के) शबद में जोड़ के सुंदर बनाने के समरथ है (हे मन ! आप भी गुरू के शबद में जुड़)।1।रहाउ। जिन मनुष्यों का मन सदा स्थिर प्रभु की सिफत सलाह के शबद में मस्त रहता है, उनको सदा स्थिर प्रभु ने स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लिया है। हर वक्त प्रभु के नाम में रंगे रहने के कारण उनकी जोति प्रभु की जोति में लीन रहती है। परमात्मा उस अंदरूनी ज्योति के द्वारा ही दिखाई देता है। पर गुरू के बिना उस ज्योति (प्रकाश) की समझ नहीं पड़ती और गुरू उन लोगों को आ के मिलता है जिनके भाग्य में धुर (प्रभु की दरगाह) से ही लेख लिखे हों।2। सारा ही संसार परमात्मा के नाम के बिना दुबिधा में फंसा रहता है, और माया के प्यार में (पड़ के सही जीवन राह से) वंचित रह जाता है। उस (प्रभु नाम) के बिनां एक घड़ी भर भी आत्मिक जीवन नहीं जी सकते, दुखों में ही जिंदगी की रात बीत जाती है। माया के मोह में अंधा हुआ जीव भटकनों में पड़ कर जीवन राह से भटक जाता है और बार बार पैदा होता रहता है। जब प्रभु मेहर की निगाह करता है, तब, खुद ही (उसको अपने चरणों में) जोड़ लेता है।3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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