आपु बीचारि मारि मनु देखिआ तुम सा मीतु न अवरु कोई ॥ जिउ तूं राखहि तिव ही रहणा दुखु सुखु देवहि करहि सोई ॥3॥ आसा मनसा दोऊ बिनासत त्रिहु गुण आस निरास भई ॥ तुरीआवसथा गुरमुखि पाईऐ संत सभा की ओट लही ॥4॥ गिआन धिआन सगले सभि जप तप जिसु हरि हिरदै अलख अभेवा ॥ नानक राम नामि मनु राता गुरमति पाए सहज सेवा ॥5॥22॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! (गुरू की किरपा से) जब मैंने अपने आप को सवार के अपना मन मार के देखा तो (मुझे दिखाई पड़ा कि) आपके जैसा मित्र और कोई नहीं। हम जीवों को आप जिस हालत में रखता है। उसी हालत में हम रह सकते हैं। दुख भी आप ही देता है। सुख भी आप ही देता है। जो कुछ आप करता है। वही होता है। 3। गुरू की शरण पड़ने से ही माया वाली आस और लालसा मिटती हैं। त्रिगुणी माया की आशाओं से निर्लिप रह सकते हैं। जब सत्संग का आसरा लें। जब गुरू के बताए हुए राह पर चलें। तभी वह आत्मिक अवस्था बनती है जहाँ माया छू ना सके। 4। जिस मनुष्य के हृदय में अलख व अभेव परमात्मा बस जाए। उसे मानो सारे जप-तप-ज्ञान-ध्यान प्राप्त हो गए। हे नानक ! गुरू की मति पर चलने से मन प्रभू के नाम में रंगा जाता है। मन अडोल अवस्था में रहके सिमरन करता है। 5। 22।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 पंचपदे ॥ (हे भाई !) मोह (मनुष्य के मन में) परिवार की ममता पैदा करता है। मोह (जगत की) सारी कार चला रहा है। (पर मोह ही) विकार पैदा करता है। (इस वास्ते) मोह त्याग। 1। हे भाई ! (दुनिया का) मोह छोड़ और मन की भटकना दूर कर। (मोह त्याग के ही) मनुष्य परमात्मा का अटल नाम हृदय में सिमर सकता है। 1। रहाउ। जब मनुष्य परमात्मा का सदा स्थिर नाम (-रूपी) नौ-निधि प्राप्त कर लेता है (तो उसका मन माया में खचित नहीं रहता। फिर) मन माया की खातिर रोता नहीं, कलपता नहीं। 2। इस मोह में सारा जगत डूबा पड़ा है। कोई विरला मनुष्य जो गुरू के बताए रास्ते पर चलता है (मोह के समुंद्र में से) पार लांघता है। 3। (हे भाई !) इस मोह में (फसा हुआ) आप बार-बार जूनियों में पड़ेगा। मोह में ही जकड़ा हुआ आप यमराज के देश में जाएगा। 4। जो लोग (रिवाज के तौर पे) गुरू की शिक्षा ले के जप-तप कमाते हैं। उनका मोह नहीं टूटता। (इन जपों-तपों से) वह (प्रभू की हजूरी में) कबूल नहीं होते। 5। हे नानक ! जिस मनुष्य पे प्रभू की नजर करता है। उसका ये मोह दूर होता है। वह सदा परमात्मा (की याद) में लीन रहता है। 6। 23।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (जो कुछ जगत में हो रहा है) सदा कायम रहने वाला अलख बेअंत परमात्मा (सब जीवों में व्यापक हो के) खुद कर रहा है। (हे प्रभू ! ये अॅटल नियम भुला के) मैं गुनाहगार हूँ (पर फिर भी आप) बख्शिश करने वाला है। 1। जगत में जो कुछ होता है सब कुछ वही होता है जो (हे प्रभू !) आपको अच्छा लगता है। (पर ये अटल सच्चाई भुला के) मनुष्य निरे अपने मन के हठ से (भाव। निरी अपनी अक्ल का आसरा ले के) काम करने पर आखिर दुखी होता है। 1। रहाउ। (निरे) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य की अक्ल माया के मोह में फंसी रहती है। (इस तरह) प्रभू के सिमरन से वंचित हो के (माया के लालच में किए) किसी बुरे कर्म के कारण दुखी होती है। 2। (हे भाई ! माया के मोह में फसी) दुर्मति त्याग के कुछ आत्मिक लाभ भी कमाओ। (ये यकीन लाओ कि) जो कुछ पैदा हुआ है। उस अलख और अभेव प्रभू से ही पैदा हुआ है (भाव। परमातमा सब कुछ करने के समर्थ है)। 3। (हम जीव बार-बार भूलते हैं और अपनी अक्ल पर मान करते हैं। पर) हमारा मित्र प्रभू सदा सहायता करने वाला है (उसकी मेहर से) जो मनुष्य गुरू से मिल जाता है गुरू उसे परमात्मा की भक्ति की ही ताकीद करता है। 4। (प्रभू का सिमरन भुला के) सारे दुनियावी सौदों में घाटा ही घाटा है (उम्र व्यर्थ गुजरती जाती है); हे नानक ! (उस मनुष्य को कोई कमी नहीं आती) जिसके मन में परमात्मा का नाम प्यारा लगता है। 5। 24।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 चउपदे ॥ (विद्या प्राप्त करके) जो मनुष्य दूसरों के साथ भलाई करने वाला हो गया है तो ही समझो कि वह विद्या पा के विचारवान बना है। तीर्थों पर निवास रखने वाला तभी सफल है। अगर उसने पाँचो कामादिक वश में कर लिए हैं। 1। अगर मेरा मन प्रभू चरणों में जुड़ना सीख गया है तभी (भक्तिया बन के) घुंघरू बजाने सफल हैं। फिर परलोक में यम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। 1। रहाउ। अगर सब मायावी-आशाओं से उपराम है तो समझो ये सन्यासी है। अगर (गृहस्थ में होते हुए) जोगी वाला जत (कायम) है तो उसे असल गृहस्थी जानो। 2। अगर (हृदय में) दया है। अगर शरीर को (विकारों की ओर से पवित्र रखने की) विचार वाला भी है। तो वह असल दिगंबर (नागा जैनी); जो मनुष्य खुद (विकारों की ओर से) मरा हुआ है वही है (असल अहिंसावादी) जो औरों को नहीं मारता। 3। (पर किसी को बुरा नहीं कहा जा सकता। हे प्रभू !) ये सारे आपके ही अनेको वेश है। हरेक वेश में आप खुद ही मौजूद है। नानक (बिचारा) आपके करिश्मे-तमाशे समझ नहीं सकता। 4। 25।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ मैं सिर्फ किसी अवगुण से लिबड़ी हुई नहीं हूँ कि अपने अंदर गुण पैदा करके एक अवगुण को धो सकूँ (मेरे अंदर तो बेअंत अवगुण हैं। क्योंकि) मैं तो सारी उम्र-रात ही (मोह की नींद में) सोई रही और मेरा पति-प्रभू जागता रहता है (उसके नजदीक मोह फटक ही नहीं सकता)। 1। ऐसी हालत में मैं पति-प्रभू को कैसे प्यारी लग सकती हूँ। पति जागता है और मैं सारी रात सोई रहती हूँ। 1। रहाउ।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! (गुरू की किरपा से) जब मैंने अपने आप को सवार के अपना मन मार के देखा तो (मुझे दिखाई पड़ा कि) आपके जैसा मित्र और कोई नहीं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।