नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: नानक कहता है परमात्मा जिंदगी देने वाला है (उसी की हजूरी में अरदास करनी चाहिए कि) हे प्रभू ! जहाँ आपकी रजा है वहाँ हमें रख (भाव। अपनी रज़ा में रख और सिमरन की दाति बख्श)। 5। 19।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (नाम की बरकति से विकारों से बचा हुआ) मानव शरीर ही (उच्च जाति का) ब्राहमण है। (पवित्र हुआ) मन (ब्राहमण की) धोती है। परमात्मा के साथ गहरी जान-पहचान जनेऊ है और प्रभू चरणों में जुड़ी हुई सुरति दूब का छल्ला। मैं तो (हे पांडे !) परमात्मा का नाम ही (दक्षिणा) मांगता हूँ। सिफत सालाह ही मांगता हूँ। ताकि गुरू की किरपा से (नाम सिमर के) परमात्मा में लीन रहूँ। 1। हे पांडे ! इसी तरह परमात्मा के गुणों की विचार कर – परमात्मा के नाम में ही स्वच्छता है। मैं तो परमातमा का नाम-सिमरन (रूपी वेद) पढ़ता हूँ। प्रभू के नाम में ही सारी धार्मिक रस्में आ जाती हैं। 1। रहाउ। (हे पांडे !) बाहरी जनेऊ तब तक ही है जब तक ज्योति शरीर में मौजूद है (फिर ये किस काम का।)। प्रभू का नाम दिल में संभाल- यही धोती है यही है टीका (तिलक)। ये नाम ही लोक-परलोक में साथ निभाता है। (हे पांडे !) नाम बिसार के धर्म के नाम पर और ही रस्में ना तलाशता फिर। 2। (नाम में जुड़ के) माया का मोह (अपने अंदर से) अच्छी तरह जला दे- यही है देव-पूजा। हर जगह एक परमात्मा को देख। (हे पांडे !) उसके बिना किसी और देवते को ना ढूँढता रह। जो मनुष्य हर जगह व्यापक परमात्मा को पहचान लेता है उसने मानों दसवें-द्वार में समाधि लगाई हुई है। जो मनुष्य प्रभू के नाम को सदा अपने मुँह में रखता है (उचारता है)। वह (वेद आदि पुस्तकों के) विचार पढ़ रहा है। 3। (हे पांडे ! प्रभू चरणों से) प्रीत (जोड़। ये) है (मूर्ति को) भोग। (इसकी बरकति से) मन की भटकना दूर हो जाती है। डर उतर जाता है। प्रभू-रक्षक के तेज से (अपने अंदर प्रकाश कर) कोई कामादिक चोर नजदीक नहीं फटकता। जो मनुष्य एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है। उसने मानो। माथे पर तिलक लगाया हुआ है। जो अपने अंदर बसते प्रभू को पहचानता है वह अच्छे-बुरे कर्म की परख सीख लेता है (यही है असल बिबेक)। 4। (हे पांडे !) परमात्मा निरी धार्मिक रस्मों से वश में नहीं किया जा सकता। वेद आदि पुस्तकों आदि के पाठ पढ़ने से भी उसकी समझ नहीं पड़ सकती। जिस परमात्मा का भेद अठारह पुराणों और चारों वेदों को नही मिला। हे नानक ! सतिगुरू ने (हमें) वह (अंदर-बाहर हर जगह) दिखा दिया है। 5। 20।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ वही मनुष्य (असल) सेवक है दास है भगत है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य ही परमात्मा का दास बनता है। (उसे सदा ये यकीन रहता है कि) जिस प्रभू ने ये सृष्टि रची है वही इसे दुबारा नाश करता है। उस जैसा और कोई दूसरा नहीं। 1। गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम विचार के गुरू के सन्मुख रहने वाले लोग सदा अटल प्रभू के दरबार में सुर्खरू होते हैं। 1। रहाउ। गुरू के सन्मुख रहके की हुई विनती और अरदास ही असल (प्रार्थना) है। महल का मालिक पति-प्रभू उस अरदास को सुनता है और आदर देता है (शाबाश कहता है)। अपने सदा अटॅल तख़्त पर (बैठा हुआ प्रभू) उस सेवक को बुलाता है। और वह सब कुछ करने में समर्थ प्रभू उसे आदर-मान देता है। 2। (हे प्रभू !) गुरमुख को आपका ही ताण है (सहारा है) आपका ही आसरा है। गुरू का शबद ही उसके पास रहने वाला सदा चिर परवाना है। गुरमुखि परमात्मा की रज़ा को (सिर माथे। पूरी तरह से) मानता है। जगत में शोभा कमा के जाता है। गुरू-शबद की सच्ची राहदारी के कारण उसकी जिंदगी के रास्ते में कोई विकार रुकावट नहीं डाल सकता। 3। पण्डित लोग वेद पढ़ते हैं और औरों को व्याख्या करके सुनाते हैं। पर (निरे विद्या के मान में रहके) ये भेद नहीं जानते कि परमात्मा का नाम-पदार्थ अंदर ही मौजूद है। पर ये समझ गुरू की शरण पड़े बिना नहीं आती की सदा-स्थिर प्रभू हरेक के अंदर व्यापक हे। 4। हे चोजी प्रभू ! गुरू के सन्मुख रहने का मैं क्या ज़िक्र करूँ। क्या कह के सुनाऊँ। आप (इस भेद) को खुद ही जानता है। हे नानक ! गुरमुखि के लिए प्रभू का ही एक दरवाजा है आसरा है जहाँ गुरू के सन्मुख रहके सिमरन करना उसकी जिंदगी का सहारा बना रहता है। 5। 21।
आसा महला 1 ॥ काची गागरि देह दुहेली उपजै बिनसै दुखु पाई ॥ इहु जगु सागरु दुतरु किउ तरीऐ बिनु हरि गुर पारि न पाई ॥1॥ तुझ बिनु अवरु न कोई मेरे पिआरे तुझ बिनु अवरु न कोइ हरे ॥ सरबी रंगी रूपी तूंहै तिसु बखसे जिसु नदरि करे ॥1॥ रहाउ ॥ सासु बुरी घरि वासु न देवै पिर सिउ मिलण न देइ बुरी ॥ सखी साजनी के हउ चरन सरेवउ हरि गुर किरपा ते नदरि धरी ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (नित्य विकारों में खचित रहने के कारण) ये शरीर दुखों का घर बन गया है (विकारों के असर से ये नहीं निकलता) और कच्चे घड़े के समान है (जो तुरंत पानी में गल जाता है)। पैदा होता है। (सारी उम्र) दुख पाता है और फिर नाश हो जाता है (एक तरफ़ तो कच्चे घड़े जैसा ये शरीर है। दूसरी तरफ़) ये जगत एक ऐसा समुंद्र है जिससे पार लांघना बहुत मुश्किल है। (इस विकार भरे शरीर का आसरा ले के) इसमें से तैरा नहीं जा सकता। गुरू परमात्मा का आसरा लिए बिना पार नहीं किया जा सकता। 1। हे मेरे प्यारे हरी ! मेरा आपके बिना और कोई (आसरा) नहीं। आपके बिना मेरा कोई नहीं। आप सारे रंगों में। सारे रूपों में मौजूद है। (हे भाई !) जिस जीव पर (वह) मेहर की नजर करता है उसको बख्श लेता है। 1। रहाउ। (मेरा प्रभू-पति मेरे हृदय-घर में ही बसता है। पर) ये बुरी सास (माया) मुझे हृदय-घर में टिकने ही नहीं देती (मेरे मन को सदा बाहर मायावी पदार्थों के पीछे भगाए फिरती है) ये चंद्री मुझे पति से मिलने नहीं देती। (इस बुरी औरत से बचने के लिए) मैं सत्संगी सहेलियों की सेवा करती हूँ (सत्संग में गुरू मिलता है)। गुरू की किरपा से पति-प्रभू मेरे पर मेहर की नजर करता है। 2।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नानक कहता है परमात्मा जिंदगी देने वाला है (उसी की हजूरी में अरदास करनी चाहिए कि) हे प्रभू ! जहाँ आपकी रजा है वहाँ हमें रख (भाव।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।