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अंग 357

अंग
357
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आस पिआसी सेजै आवा ॥
आगै सह भावा कि न भावा ॥2॥
किआ जाना किआ होइगा री माई ॥
हरि दरसन बिनु रहनु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
प्रेमु न चाखिआ मेरी तिस न बुझानी ॥
गइआ सु जोबनु धन पछुतानी ॥3॥
अजै सु जागउ आस पिआसी ॥
भईले उदासी रहउ निरासी ॥1॥ रहाउ ॥
हउमै खोइ करे सीगारु ॥
तउ कामणि सेजै रवै भतारु ॥4॥
तउ नानक कंतै मनि भावै ॥
छोडि वडाई अपणे खसम समावै ॥1॥ रहाउ ॥26॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: मैं सेज पर आती हूँ (मैं हृदय रूपी सेज की तरफ पलटती हूँ। पर अभी भी) दुनिया की आशाओं की प्यास से मैं व्याकुल हूँ। (ऐसी आत्मिक दशा से कैसे यकीन बने। कैसे पक्का हो कि) मैं पति-प्रभू को पसंद आऊँ। 2। हे माँ ! (सारी उम्र माया की नींद में सोए रहने के कारण) मुझे समझ नहीं आ रही कि मेरा क्या बनेगा (मुझे पति-प्रभू परवान करेगा कि नहीं। पर अब) प्रभू-पति के दर्शन के बिना मुझे ढाढस नहीं बंधता। 1। रहाउ। (हे माँ ! सारी उम्र) मैंने प्रभू-पति के प्रेमका स्वाद नहीं चखा; इस करके मेरी माया वाली तृष्णा (की आग) नहीं बुझ सकी। मेरी जवानी गुजर गई है अब मेरी जिंद पछतावा कर रही है। 3। (हे माँ ! जवानी तो गुजर गई है। पर अरदास कर) अभी भी मैं माया की आशाओं की प्यास से उपराम हो के माया की आशाएं त्याग के जीवन गुजारूँ (शायद मेहर कर ही दे)। 1। रहाउ। जब जीव-स्त्री अहंकार गवा देती है जब जिंद को सुंदर बनाने का ऐसा प्रयत्न करती है। तब उस जीव-स्त्री को पति-प्रभू उसकी हृदय-सेज पे आ के मिलता है। 4। हे नानक ! तब ही जीव-स्त्री पति-प्रभू के मन को भाती है। जब मान-वडिआई (घमण्ड वगैरा) छोड़ के अपने पति की रज़ा में लीन होती है। 1। रहाउ।
आसा महला 1 ॥
पेवकड़ै धन खरी इआणी ॥
तिसु सह की मै सार न जाणी ॥1॥
सहु मेरा एकु दूजा नही कोई ॥
नदरि करे मेलावा होई ॥1॥ रहाउ ॥
साहुरड़ै धन साचु पछाणिआ ॥
सहजि सुभाइ अपणा पिरु जाणिआ ॥2॥
गुर परसादी ऐसी मति आवै ॥
तां कामणि कंतै मनि भावै ॥3॥
कहतु नानकु भै भाव का करे सीगारु ॥
सद ही सेजै रवै भतारु ॥4॥27॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जगत के मोह में फंस के जीव-स्त्री बहुत मूर्ख रहती है। (इस मोह में फस के ही) मैं उस पति-प्रभू (के मेहर की नजर) की कद्र नहीं समझ सकी (और उसके चरणों से विछुड़ी रही)। 1। मेरा पति-प्रभू हर समय एक रस रहता है। उस जैसा और कोई नहीं। वह सदा मेहर की नजर करता है (उसकी मेहर की नजर से ही) मेरा उससे मिलाप हो सकता है। 1। रहाउ। पर। जो जीव-स्त्री जगत के मोह से निकल के प्रभू-चरणों में जुड़ती है वह (प्रभू की मेहर की नजर से) सदा उस स्थिर प्रभू (की कद्र) पहचान लेती है; अडोल अवस्था में टिक के प्रेम में जुड़ के वह अपने पति प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेती है। 2। जब गुरू की किरपा से (जीव-स्त्री को) ऐसी अक्ल आ जाती है (कि वह जगत का मोह छोड़ के प्रभू चरणों में जुड़ने का उद्यम करती है) । तब जीव-स्त्री कंत (पति) प्रभू के मन को भाने लगती है। 3 नानक कहता है जो जीव-स्त्री परमात्मा के डर का और प्रेम का श्रृंगार बनाती है। उसके हृदय-सेज पर प्रभू-पति सदा आ के टिका रहता है। 4। 27।
आसा महला 1 ॥
न किस का पूतु न किस की माई ॥
झूठै मोहि भरमि भुलाई ॥1॥
मेरे साहिब हउ कीता तेरा ॥
जां तूं देहि जपी नाउ तेरा ॥1॥ रहाउ ॥
बहुते अउगण कूकै कोई ॥
जा तिसु भावै बखसे सोई ॥2॥
गुर परसादी दुरमति खोई ॥
जह देखा तह एको सोई ॥3॥
कहत नानक ऐसी मति आवै ॥
तां को सचे सचि समावै ॥4॥28॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (माता-पिता-पुत्र आदि को ही अपना सदा साथी जान के जीव परमात्मा को बिसारे बैठा है) असल में ना माँ ना पुत्र कोई भी किसी का पक्का साथी नहीं। झूठे मोह के कारण दुनिया भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ी हुई है 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! मैं आपका पैदा किया हुआ हूँ (मेरी सारी शारीरिक व आत्मिक जरूरतें आप ही जानता है और पूरी करने के समर्थ है। मेरे आत्मिक जीवन की खातिर) जब आप मुझे अपना नाम देता है। तभी मैं जप सकता हूँ। 1। रहाउ। अनेकों ही पाप किए हुए हों फिर भी अगर कोई मनुष्य (परमात्मा के दर पर) अरजोई करता है (परमात्मा पैदा किए की लाज रखता है) जब उसे (उस अति विकारी की भी आरजू) पसंद आती है तो वह बख्शिश करता है (और उसके आत्मिक जीवन के वास्ते उसको अपने नाम की दाति देता है)। 2। गुरू की किरपा से हमारी खोटी मति नाश होती है मैं जिधर भी देखता हूँ उधर (सब जीवों को पैदा करने वाला) वह परमातमा ही व्यापक देखता हूँ । 3। नानक कहता है कि जब (प्रभू की अपनी मेहर से गुरू के द्वारा) जीव को ऐसी अक्ल आ जाए कि हर तरफ उसे परमात्मा ही दिखे। तो जीव सदा उस सदा-स्थिर परमात्मा की याद में लीन रहता है। 4। 28।
आसा महला 1 दुपदे ॥
तितु सरवरड़ै भईले निवासा पाणी पावकु तिनहि कीआ ॥
पंकजु मोह पगु नही चालै हम देखा तह डूबीअले ॥1॥
मन एकु न चेतसि मूड़ मना ॥
हरि बिसरत तेरे गुण गलिआ ॥1॥ रहाउ ॥
ना हउ जती सती नही पड़िआ मूरख मुगधा जनमु भइआ ॥
प्रणवति नानक तिन॑ की सरणा जिन॑ तूं नाही वीसरिआ ॥2॥29॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 दुपदे ॥ (हम जीवों का) उस भयानक सरोवर में बसेरा है जिसमें उस प्रभू ने खुद ही पानी की जगह (तृष्णा की) आग पैदा की है। (और उस सरोवर में) जो मोह का कीचड़ है (उसमें जीवों के) पैर चल नहीं सकते (भाव। जीव मोह के कीचड़ में फंसे हुए हैं)। हमारे सामने ही कई जीव (मोह के कीचड़ में फस के तृष्णा की आग के अथाह जल में) डूबते जा रहे हैं। 1। हे मन ! हे मूर्ख मन ! आप एक प्रभू को याद नहीं करता। आप ज्यों-ज्यों प्रभू को बिसारता है। आपके (अंदर से) गुण कम होते जाते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! ना मैं जती हूँ। ना मैं सती हूँ। ना ही मैं पढ़ा (-लिखा) हूँ। मेरा जीवन तो मूर्खों बेसमझों वाला बना हुआ है। (भाव। जत-सत और विद्या इस तृष्णा की आग और मोह के कीचड़ में गिरने से बचा नहीं सकते। अगर मनुष्य प्रभू को बिसार दे। तो जत-सत-विद्या के होते हुए भी मनुष्य की जिंदगी महा मूर्खों वाली ही होती है)। (सो) नानक बिनती करता है, (हे प्रभू ! मुझे) उन (गुरमुखों) की शरण में (रख) जिन्हें आप नहीं भूला (जिन्हें आपकी याद नहीं भूली)। 2। 29।
आसा महला 1 ॥
छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥
गुर गुरु एको वेस अनेक ॥1॥
जै घरि करते कीरति होइ ॥
सो घरु राखु वडाई तोहि ॥1॥ रहाउ ॥
विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु भइआ ॥ सूरजु एको रुति अनेक ॥
नानक करते के केते वेस ॥2॥30॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ छे शास्त्र हैं। छे ही (इन शास्त्रों के) चलाने वाले हैं। छे ही इनके सिद्धांत हैं। पर इन सभी का मूल-गुरू (परमातमा) एक ही है। (ये सारे सिद्धांत) उस एक प्रभू के ही अनेकों वेश हैं (प्रभू की हस्ती के प्रकाश के कई रूप हैं)। 1। जिस (सत्संग-) घर में अकाल पुरख की सिफत सालाह होती है। (हे भाई !) आप घर को संभाल के रख (उस सत्संग का आसरा ले इसी में) आपको वडिआई मिलेगी। 1। रहाउ। जैसे विसूए, चसे, घड़ियां, पहर, तिथिएं, वार, महीने (आदि) व अनेकों ऋतुएं हैं। पर सूरज एक ही है (जिसके ये सारें अलग-अलग स्वरूप हैं)। वैसे ही हे नानक ! करतार के (ये सारे जीव-जंतु) अनेको स्वरूपों में हैं। 2। 30।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “मैं सेज पर आती हूँ (मैं हृदय रूपी सेज की तरफ पलटती हूँ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।