Lulla Family

अंग 354

अंग
354
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ऐसा गुरमति रमतु सरीरा ॥
हरि भजु मेरे मन गहिर गंभीरा ॥1॥ रहाउ ॥
अनत तरंग भगति हरि रंगा ॥
अनदिनु सूचे हरि गुण संगा ॥
मिथिआ जनमु साकत संसारा ॥
राम भगति जनु रहै निरारा ॥2॥
सूची काइआ हरि गुण गाइआ ॥
आतमु चीनि रहै लिव लाइआ ॥
आदि अपारु अपरंपरु हीरा ॥
लालि रता मेरा मनु धीरा ॥3॥
कथनी कहहि कहहि से मूए ॥
सो प्रभु दूरि नाही प्रभु तूं है ॥
सभु जगु देखिआ माइआ छाइआ ॥
नानक गुरमति नामु धिआइआ ॥4॥17॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: गुरू की मति पर चल के उस को जो सारे शरीरों में व्यापक है हे मेरे मन ! उस हरी का भजन कर जो अथाह और बड़े जिगरे वाला है । 1। रहाउ। उनके अंदर प्रभू के प्यार की प्रभू की भक्ति की अनेकों लहरें उठती रहती हैं। जो मनुष्य हर रोज (हर समय) परमात्मा की सिफत सालाह से साथ बनाते हैं उनका जीवन पवित्र होता है। माया में फंसे जीव का जीवन व्यर्थ चला जाता है। जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति करता है वह (माया के मोह से) निर्लिप रहता है। 2। जो मनुष्य हरी के गुण गाता है उसका शरीर (विकारों से बचा रह के) पवित्र रहता है। अपने आप को (अपने असल को) पहचान के वह सदा प्रभू चरणों में सुरति जोड़े रखता है। वह मनुष्य उस प्रभू का रूप हो जाता है जो सब का आदि है। जो बेअंत है। जो परे से परे है जो हीरे समान अमोलक है। उसका वह मन। जो पहले ममता का शिकार था। लाल रत्न के समान अमूल्य प्रभू के प्यार में रंगा जाता है और ठहराव वाले स्वभाव का हो जाता है। 3। जो मनुष्य (सिमरन से वंचित हैं और) निरी ज़बानी-ज़बानी ही ज्ञान की बाते करते हैं वे आत्मिक मौत मरे हुए हैं (उनके अंदर आत्मिक जीवन नहीं है)। उन्हें परमात्मा अपने बहुत नजदीक दिखाई देता है (वे मनुष्य जगत के पदार्थों से मोह नहीं बनाते। क्योंकि) उन्हें सारा जगत माया का पसारा दिखाई देता है। (पर) हे नानक ! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति का आसरा ले के प्रभू का नाम सिमरा है। 4। 17।
आसा महला 1 तितुका ॥
कोई भीखकु भीखिआ खाइ ॥
कोई राजा रहिआ समाइ ॥
किस ही मानु किसै अपमानु ॥
ढाहि उसारे धरे धिआनु ॥
तुझ ते वडा नाही कोइ ॥
किसु वेखाली चंगा होइ ॥1॥
मै तां नामु तेरा आधारु ॥
तूं दाता करणहारु करतारु ॥1॥ रहाउ ॥
वाट न पावउ वीगा जाउ ॥
दरगह बैसण नाही थाउ ॥
मन का अंधुला माइआ का बंधु ॥
खीन खराबु होवै नित कंधु ॥
खाण जीवण की बहुती आस ॥
लेखै तेरै सास गिरास ॥2॥
अहिनिसि अंधुले दीपकु देइ ॥
भउजल डूबत चिंत करेइ ॥
कहहि सुणहि जो मानहि नाउ ॥ हउ बलिहारै ता कै जाउ ॥
नानकु एक कहै अरदासि ॥
जीउ पिंडु सभु तेरै पासि ॥3॥
जां तूं देहि जपी तेरा नाउ ॥
दरगह बैसण होवै थाउ ॥
जां तुधु भावै ता दुरमति जाइ ॥
गिआन रतनु मनि वसै आइ ॥
नदरि करे ता सतिगुरु मिलै ॥
प्रणवति नानकु भवजलु तरै ॥4॥18॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 तितुका ॥ (आपका आसरा भुला के ही) कोई मंगता भिक्षा (मांग-मांग के) खाता है (और गरीबी में निढाल हैं रहा है। (आपको भुला के ही) कोई मनुष्य राजा बन के (राज में) मस्त हैं रहा है। किसी को आदर मिल रहा है (वह इस आदर में अहंकारी है)। किसी की निरादरी हो रही है (जिस कारण वह अपने मानस जन्म का कौडी मूल्य नहीं समझता) (कोई मनुष्य मन के लड्डू तोड़ रहा है। अपने मन में ही) कई सलाहें बनाता है और गिराता है। बस ! यही सोचें सोचता रहता है। पर। हे प्रभू ! तूझसे बड़ा कोई नहीं (जिसे भी आदर मिलता है। आपसे ही मिलता है)। मैं कोई भी ऐसा आदमी नहीं दिखा सकता जो (अपने आप ही) अच्छा बन गया हैं। 1। मेरे लिए सिर्फ आपका नाम ही आसरा है (क्योंकि) आप ही (सब दातें) देने वाला है। आप सब कुछ करने के समर्थ है। आप सारी सृष्टि को पैदा करने वाला है। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! आपकी ओट के बिना) मैं जीवन का सही रास्ता नहीं तलाश सकता। गलत रास्ते पर ही जाता हूँ। आपकी हजूरी में भी मुझे जगह नहीं मिल सकती। (जब तक मुझे आपके से ज्ञान का प्रकाश ना मिले) मैं माया के मोह में बंधा रहता हूँ। मन का अंधा ही रहता हूँ। मेरा शरीर (विकारों में) सदा खचित और ख्वार होता है। मैं सदा और-और खाने व जीवन की आशाएं बनाता रहता हूँ (मुझे ये याद ही नहीं रहता कि) मेरी एक-एक सांस और एक-एक ग्रास आपके हिसाब में है (आपकी मेहर से ही मिल रहे हैं)। 2। प्रभू (इतना दयालु है कि मेरे जैसे) अंधे को दिन-रात (ज्ञान का) दीपक बख्शता है। संसार समुंद्र में डूबते का फिक्र रखता है। जो प्रभू का नाम जपते हैं। सुनते हैं। उस में श्रद्धा रखते हैं। मैं उन लोगों से सदके जाता हूँ हे प्रभू ! नानक आपके दर पे यही अरदास करता है कि हमारी जिंद और हमारा शरीर सब कुछ आपके ही आसरे है। 3। हे प्रभू ! जब आप (अपने नाम की दाति मुझे) देता है। तभी मैं आपका नाम जप सकता हूँ और आपकी हजूरी में मुझे बैठने के लिए जगह मिल सकती है। जब आपकी रजा हैं तब ही मेरी बुरी मति दूर हैं सकती है। और आपका बख्शा हुआ श्रेष्ठ ज्ञान मेरे मन में आ के बस सकता है। नानक विनती करता है कि जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है उसे गुरू मिलता है। और वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। 4। 18।
आसा महला 1 पंचपदे ॥
दुध बिनु धेनु पंख बिनु पंखी जल बिनु उतभुज कामि नाही ॥
किआ सुलतानु सलाम विहूणा अंधी कोठी तेरा नामु नाही ॥1॥
की विसरहि दुखु बहुता लागै ॥
दुखु लागै तूं विसरु नाही ॥1॥ रहाउ ॥
अखी अंधु जीभ रसु नाही कंनी पवणु न वाजै ॥
चरणी चलै पजूता आगै विणु सेवा फल लागे ॥2॥
अखर बिरख बाग भुइ चोखी सिंचित भाउ करेही ॥
सभना फलु लागै नामु एको बिनु करमा कैसे लेही ॥3॥
जेते जीअ तेते सभि तेरे विणु सेवा फलु किसै नाही ॥
दुखु सुखु भाणा तेरा होवै विणु नावै जीउ रहै नाही ॥4॥
मति विचि मरणु जीवणु होरु कैसा जा जीवा तां जुगति नाही ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 पंचपदे ॥ जो गाय दूध ना दे वह गाय किस काम की। जिस पक्षी के पंख ही ना हो उसे और कोई सहारा नहीं। वनस्पति पानी के बिना हरी नहीं रह सकती। वह बादशाह ही कैसा। जिसे कोई सलाम ना करे। इसी तरह हे प्रभू ! जिस हृदय में आपका नाम ना हैं वह एक अंधेरी कोठी ही है। 1। हे प्रभू ! आप मुझे क्यों विसारता है। आपके बिसरने से मुझे बड़ा आत्मिक दुख होता है। हे प्रभू ! (मेहर कर। मेरे मन से) ना विसर। 1। रहाउ। आँखों के आगे अंधकार छाने लग पड़ता है। जीभ में खाने-पीने के स्वाद के आनंद लेने की ताकत नहीं रहती। कानों में (राग आदि) की आवाज सुनाई नहीं देती। पैरों से भी मनुष्य तभी चलता है जब कोई और आगे से उसकी डंगोरी पकड़े- (बुढ़ापे के कारण मनुष्य के शरीर की ये हालत बन जाती है। फिर भी) मनुष्य सिमरन से सूना ही रहता है। इसके जीवन-वृक्ष को और ही बेकार के फल लगते रहते हैं। 2। जो मनुष्य स्वच्छ हृदय की भूमि में गुरू-शबद-रूपी-बाग़ के वृक्ष लगाते हैं और प्रेम-रूपी पानी से सींचते हैं। उन सभी को अकाल-पुरख का नाम-फल लगता है। पर प्रभू की मेहर के बिना ये दाति नहीं मिलती। 3। हे प्रभू ! ये सारे ही जीव आपके ही पैदा किए हुए हैं। आपका सिमरन किए बिना मानव जीवन का लाभ किसी को नहीं मिल सकता। (जो भी पैदा हुआ है उसे) कभी दुख और कभी सुख मिलना -ये तो आपकी रजा है (पर दुख में जीव घबरा जाता है। सुखों में आपे से बाहर होता है) आपके नाम की टेक के बिना जिंद अडोल रह ही नहीं सकती। 4। गुरू की बताई हुई मति पर चल कर स्वै भाव का मर जाना- यही है सही जीवन। अगर मनुष्य का स्वार्थी जीवन नहीं खत्म हुआ तो वह जीवन व्यर्थ है। अगर मैं यह स्वार्थी जीवन जीता हूँ। तो इसे जीवन का सुचॅजा ढंग नहीं कहा जा सकता।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की मति पर चल के उस को जो सारे शरीरों में व्यापक है हे मेरे मन ! उस हरी का भजन कर जो अथाह और बड़े जिगरे वाला है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।