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अंग 353

अंग
353
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर परसादी हरि रसु पाइआ नामु पदारथु नउ निधि पाई ॥1॥ रहाउ ॥
करम धरम सचु साचा नाउ ॥
ता कै सद बलिहारै जाउ ॥
जो हरि राते से जन परवाणु ॥
तिन की संगति परम निधानु ॥2॥
हरि वरु जिनि पाइआ धन नारी ॥
हरि सिउ राती सबदु वीचारी ॥
आपि तरै संगति कुल तारै ॥
सतिगुरु सेवि ततु वीचारै ॥3॥
हमरी जाति पति सचु नाउ ॥
करम धरम संजमु सत भाउ ॥
नानक बखसे पूछ न होइ ॥
दूजा मेटे एको सोइ ॥4॥14॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: गुरू की किरपा से वह आपके नाम का स्वाद चख लेता है; उसे आपका उत्तम नाम प्राप्त हैं जाता है (जो उसके लिए। जैसे) नौ-खजाने हैं (भाव। धरती का सारा ही धन-पदार्थ नाम के मुकाबले में उसे तुच्छ प्रतीत होता है)। 1। रहाउ। जो प्रभू के सदा स्थिर नाम को ही सब से श्रेष्ठ कर्म व धार्मिक फर्ज समझता है – मैं उस मनुष्य से सदके जाता हूँ प्रभू की हजूरी में वही मनुष्य कबूल हैं जो प्रभू के प्यार में रंगे रहते हैं। उनकी संगति करने से सबसे कीमती (नाम) खजाना मिलता है। 2। वह जीव-स्त्री भाग्यशाली है जिसने प्रभू-पति (को अपने दिल में) पा लिया है। जो प्रभू के प्यार में रंगी रहती है। जो प्रभू की सिफत सालाह की बाणी को (अपने मन में) विचारती है। वह जीव-स्त्री स्वयं (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाती है। और अपनी संगत में अपने कुल को पार लंघा लेती है। सतिगुरू के बताए हुए राह पर चल कर मानस जन्म का असल लाभ वह अपनी आँखों के सामने रखती है। 3। (दुनियां में किसी को उच्च जाति का गुमान है। किसी का ऊँचे कुल का धरवास है। हे प्रभू ! मेहर कर) आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम ही मेरे वास्ते ऊँची जाति और कुल हैं। आपका सच्चा प्यार ही मेरे लिए धार्मिक कर्म। धर्म और जीवन-जुगति हैं। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू अपने नाम की बख्शिश करता है (उसका जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का लेखा निपट जाता है) उससे (फिर) किए कर्मों का हिसाब नहीं लिया जाता। उसको (हर तरफ़) एक प्रभू ही दिखाई देता है। प्रभू के बिना किसी और के अस्तित्व का विचार ही उसके अंदर से मिट जाता है। 4। 14।
आसा महला 1 ॥
इकि आवहि इकि जावहि आई ॥
इकि हरि राते रहहि समाई ॥
इकि धरनि गगन महि ठउर न पावहि ॥
से करमहीण हरि नामु न धिआवहि ॥1॥
गुर पूरे ते गति मिति पाई ॥
इहु संसारु बिखु वत अति भउजलु गुर सबदी हरि पारि लंघाई ॥1॥ रहाउ ॥
जिन॑ कउ आपि लए प्रभु मेलि ॥
तिन कउ कालु न साकै पेलि ॥
गुरमुखि निरमल रहहि पिआरे ॥
जिउ जल अंभ ऊपरि कमल निरारे ॥2॥
बुरा भला कहु किस नो कहीऐ ॥
दीसै ब्रहमु गुरमुखि सचु लहीऐ ॥
अकथु कथउ गुरमति वीचारु ॥
मिलि गुर संगति पावउ पारु ॥3॥
सासत बेद सिंम्रिति बहु भेद ॥
अठसठि मजनु हरि रसु रेद ॥
गुरमुखि निरमलु मैलु न लागै ॥
नानक हिरदै नामु वडे धुरि भागै ॥4॥15॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ अनेकों जीव जगत में जन्म लेते हैं और (ऊँची आत्मिक अवस्था की प्राप्ति के बिना) सिर्फ पैदा ही होते हैं और (फिर यहां से) चले जाते हैं। पर। एक (सौभाग्यशाली ऐसे) हैं जो प्रभू के प्यार में रंगे रहते हैं और प्रभू की याद में रहते हैं। सारी सृष्टि में उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिलती वे अभागे हैं (उनके मन सदा भटकते रहते हैं) जो लोग प्रभू का नाम नहीं सिमरते । 1। ऊँचे आत्मिक जीवन की मर्यादा पूरे गुरू से ही मिलती है। ये संसार एक बहुत ही विषौला चक्रवात है। परमात्मा। गुरू के शबद में जोड़ के और (उच्च आत्मिक जीवन बख्श के) इसमें से पार लंघाता है। 1। रहाउ। जिन लोगों को प्रभू स्वयं अपनी याद में जोड़ता है। उन्हें मौत का डर डरा नहीं सकता। गुरू के सन्मुख रहके (माया में रहते हुए भी) वह प्यारे ऐसे पवित्र-आत्मा बने रहते हैं जैसे पानी में कमल-फूल निर्लिप रहते हैं। 2। ना किसी को बुरा ना किसी को अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि हरेक में परमात्मा ही बसता दिखाई देता है। हाँ। वह सदा स्थिर प्रभू मिलता है गुरू के सन्मुख होने पर ही। परमात्मा का स्वरूप बयान से परे है। गुरू की मति ले के ही मैं उस के (कुछ) गुण कह सकता हूँ और विचार सकता हूँ। गुरू की संगति में रहके ही मैं (इस विषौले चक्रवात का) परला सिरा पा सकता हूँ। 3। (हे भाई !) परमात्मा के नाम का आनंद हृदय में महसूस करो- यही है वेद-शास्त्रों स्मृतियों के विभिन्न पहलुओं का विचार। यही है अढ़सठ तीर्थों का स्नान। गुरू के सन्मुख रहके (नाम का आनंद लेने से) जीवन पवित्र रहता है और विकारों की मैल नहीं लगती। हे नानक ! धुर से परमात्मा की द्वारा ही मेहर हो। तो नाम हृदय में बसता है। 4। 15।
आसा महला 1 ॥
निवि निवि पाइ लगउ गुर अपुने आतम रामु निहारिआ ॥
करत बीचारु हिरदै हरि रविआ हिरदै देखि बीचारिआ ॥1॥
बोलहु रामु करे निसतारा ॥
गुर परसादि रतनु हरि लाभै मिटै अगिआनु होइ उजीआरा ॥1॥ रहाउ ॥
रवनी रवै बंधन नही तूटहि विचि हउमै भरमु न जाई ॥
सतिगुरु मिलै त हउमै तूटै ता को लेखै पाई ॥2॥
हरि हरि नामु भगति प्रिअ प्रीतमु सुख सागरु उर धारे ॥
भगति वछलु जगजीवनु दाता मति गुरमति हरि निसतारे ॥3॥
मन सिउ जूझि मरै प्रभु पाए मनसा मनहि समाए ॥
नानक क्रिपा करे जगजीवनु सहज भाइ लिव लाए ॥4॥16॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ मैं बार-बार अपने गुरू के चरणों में नत्-मस्तक होता हूँ (गुरू की किरपा से) मैंने अपने अंदर बसता राम देख लिया है। (गुरू की सहायता से) परमात्मा के गुणों का विचार करके मैं उसे अपने हृदय में उसका दीदार कर रहा हूँ। उसकी सिफतों को विचार रहा हूँ। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरो। सिमरन (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। जब गुरू की किरपा से कीमती हरी-नाम मिल जाता है अंदर से अज्ञानता का अंधकार मिट जाता है। और ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। 1। रहाउ। (जो मनुष्य सिमरन तो नहीं करता। पर) सिर्फ ज़बानी-ज़बानी से (ब्रहमज्ञान की) बातें करता है। उसके (माया के) बंधन नहीं टूटते। वह अहंकार में ही फंसा रहता है (भाव। मैं बड़ा बन जाऊँ। मैं बड़ा बन जाऊँ- इसी चक्रवात में फंसा रहता है)। उसके मन की भटकना दूर नहीं होती। जब पूरा गुरू मिले तभी हउमें टूटती है। और तभी मनुष्य (प्रभू की हजूरी में) परवान होता है। 2। जो मनुष्य हरी नाम सिमरता है। प्यारे की भक्ति करता है। सुखों के समुंद्र प्रभू प्रीतम को अपने हृदय में बसाता है। उस मनुष्य को भक्ति को प्यार करने वाला प्रभू। जगत की जिंदगी का आसरा प्रभू। श्रेष्ठ मति देने वाला प्रभू। गुरू के उपदेश की बरकति से (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 3। जो जीव अपने मन से करारा मुकाबला करके अहंकार को मार लेता है। मन के फुरनों को मन के अंदर ही (प्रभू की याद में) लीन कर लेता है। हे नानक ! जगत का जीवन। प्रभू। जिस मनुष्य पर मेहर करता है। वह अडोल चित्त रहके (प्रभू चरणों में) जुड़ा रहता है। 4। 16।
आसा महला 1 ॥
किस कउ कहहि सुणावहि किस कउ किसु समझावहि समझि रहे ॥
किसै पड़ावहि पड़ि गुणि बूझे सतिगुर सबदि संतोखि रहे ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (‘गहिर-गंभीर’ प्रभू को सिमरने से। सिमरन करने वाला भी गंभीर स्वभाव वाला हो जाता है। उसके अंदर दिखावा और होछापन नहीं रहता)। जो मनुष्य (‘गहर गंभीर’ को सिमर के) ज्ञानवान हो जाते हैं। वे अपना आप ना किसी को बताते हैं ना सुनाते हैं ना समझाते हैं। जो मनुष्य (‘गहर गंभीर’ की सिफतें) पढ़ के विचार के (जीवन भेद को) समझ लेते हैं। वे अपनी विद्या का दिखावा नहीं करते। गुरू के शबद में जुड़ के (होछापन त्याग के) वह संतोख का जीवन व्यतीत करते हैं। 1।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की किरपा से वह आपके नाम का स्वाद चख लेता है; उसे आपका उत्तम नाम प्राप्त हैं जाता है (जो उसके लिए।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।